15/12/2013

इस कहानी को शीर्षक आप ही दें !



यह एक सच्ची कहानी है ,दो दिलों की  तो नहीं मगर दो सच्चे इंसानों कि जो जिंदगी से इस तरह प्यार करते हैं, मानो बस !इससे ज्या!दा  खूबसूरत कुछ है ही नहीं। इस दुनिया में ! अकेली औरत के दिल में समाज का डर और पैरों में परम्पराओं की बेड़ियां,हाथों में मेहंदी के बजाये रोजी-रोटी की जुगाड़ में पड़े कुछ निशान 
और दिल में फिर भी ज़िन्दगी को सजाने के ख्वाब,उस ज़िन्दगी को, जिसने बसाने से पहले ही उजाड़ने का इंतज़ाम कर दिया!और फिर से सजाने की ढेरों ख्वाहिशें, मगर फिर एक डर !
ऐसे मुश्किलों में भी जो दिल प्यार को इस कदर चाहत भरी नज़रों से देखे और उसको तलाश करने से रोके ,तो यह बेबसी आखिर किसका कुसूर है और किसका गुनाह! बस अचानक ही एक दिन उसकी फेसबुक वाल पर निगाह ठहर गयी
 I LOVE YOU पर ,आखिर किसने प्यार को अपने शब्दों में किस कदर तड़प के साथ बांधा है! कुछ शब्दों में हौसला, पूरी किताब लिखने का! अच्छे शब्दों की तारीफ  
और बस इसके बाद दूसरी तरफ से आये जवाब ने एक ऐसी कहानी बुन डाली। ,जिसको शीर्षक तो उसके पाठक ही दे सकते हैं,
क्योंकि यह भी तय होना है आखिर प्यार एक शब्द मात्र है या अहसास और जीवन का रंग ,जिन शब्दों पर निगाह ठहर गयी वह कुछ इस तरह थे। ……… \

I LOVE YOU.......ka matlb hota hai  I LOVE YOU

I LOVE YOU.......ka matlb hota haikisi ke ho jaana ...kisi ko apna banalena.....jism nahi rooh se apnalena.......uske dard ko apna dardbana lene.....uski khushi ko apnasamjhna......aansu behne se pehle hi  unhe thaam lena....dil ki baat jo vokehna chahe ....zubaan par aane sepehle hi samjh lena......use har mumkin khushi dena......harbaat me uska saath dena...acha kaheto muskura dena .....bura kahe tonaraz ho jana..kabhi gussa hojaana....kabhi ruthna ....kabhimanana...zindagi ki raaho me kabhi saath nachorna....har mushkil me saathdena......uska intzaar karna.......I LOVE YOU kehne se pyar ni jatayajaata ....jis pyar ko shabdo kizarurat pade us pyar me kuch kamihoti hai.....kehne ko itna kuch hai ki ek kitab likhdu....magr abhi bas itna hi..waise aajkal pyar ka matlb sirfI LOVE YOU kehna hi reh gaya hai ...sirf 3shabd jo zindagi bhar shabd bankarhi reh jaate hai ......kabhi pyar kamatlb samjh hi nahi paate......pyarsirf 3 shabdo ka rishta nahi hai ....pyar to vo ehsaas hai jo shabdo kamohtaj nahi hai......Paar jindge bhar ka ahsas hai...........pal 2 pal ka nahe...............
 यह थी वो लाइनें जिनको बरबस ही पढ़कर उसका माउस बढ़ते कदमों की तरह ठिठक गया!इसके बाद जो बातों का सिलसिला शरू हुआ लगा ही नहीं कोई अंजाना है,ज़िन्दगी का सार कुछ ही शब्दों में बाहर आ गया और उसने उतने ही शब्दों में समझ लिया जितने शदों में अपनी बात कही थी! 
मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ ? कि तुम क्या सोच रही हो ,अब ,और गुरुवार  को क्या सोच थी, क्या कहा?और शुक्रवार को क्या सोचा।वो सच था या कल जो बोला वो सच था,दोनों सच भी हो सकते हैं,क्यूंकि एक सी  सोच और तलाश में ऐसा ही होता है ,और ऐसा भी नहीं है जो कह दिया!अब वही होना है,तुम्हारी और मेरी बातों से तुम्हे और मुझे एक पल को भी अपने पन का अहसास हुआ ,तो ठीक ही है,कई बार होता है। कुछ पल या हवा के झोंके जैसा कोई आनंद उतनी ही देर का होता है, तो इसमें कोई अपराधबोध भी नहीं होना चाहिए। और न ही किसी और तरह कि ऐसी सोच जो किसी को दोषी बनाये , मुझे ऐसा लगा रहा है कि तुम्हे  लगा कि कोई गलती कर दी तुमने ?और उसको खुद ही बहुत जल्दी ही सुधार लिया ,
गलती  तो मैंने भी की और दोनों अपराधबोध में सब कुछ भूल जाएँ, ये  शब्द और भावनाएं ही तो हैं, जो हमें जीवन ,आनंद ,हौसला,सुख दुःख संतुष्टि संयोग और वियोग का अहसास करवाते हैं।,कभी एक दम पॉज़िटिव और कभी एकदम नेगेटिव, और कभी भयभीत और ग्लानि मिश्रित अपराधबोध ! इस दुनिया में कुछ भी अपने  आप नहीं होता भगवान् की ही मर्ज़ी चलती है , अच्छा बताओ !
अगर मैंने पहली बार में ही सिर्फ बिना जाने और देखे केवाल कुछ पल कि नेट पर हुई बातों से जैसा अपनापन महसूस किया और मेरे भीतर जो आनंद मुझे मिला आपकी सोच और शब्दों से उसमे कोई बनावट, मेरी परीक्षा या मेरी हैसियत की जानकारी करने जैसा कुछ था ही नहीं ,हाँ बस दुःख और सुख बाँट  कर सुखद समय और हालत की एक अव्यक्त कल्पना थी, जिसने एक ही क्षण में दुखों के पहाड़ को अपनेपन के डायनमाइट से ध्वस्त कर दिया।
मेरा विश्वास है कि तुम्हारी  सोच नहीं बदली है ,दोनों बातें सच हैं,मगर इसमें खुद ,समाज और बेटी के भविष्य और उसके बाद कि हालत का चिंतन है बस ,
तो इसमें क्या गलत है?  इसके बिना तो कुछ भी नहीं है। बस मेरा सोच यही है  हम जो भी सोचें, इन सब के बाद,अगर बच्चे कहेंगे तो ठीक वरना कम से कम एक दूसरे के सच्चे दोस्त और शुभचिंतक जैसे तो रह ही सकते हैं ,डरिये नहीं संकोच नहीं ,ईश्वर साक्षी है मेरी निगाह में आप पूज्य हैं,हो सकता है कि आपको अपनी दस खराबियां मालूम हों,मगर आपकी सोच के आगे मेरे शब्दों की कोई हैसीयत नहीं है,क्योंकि पतयार ही तुम्हारी साँसे हैं आज ,जीवन है। 
कुछ ही शब्दों में तुमने  जीवन का अहसास करवाया है,जीने की इच्छा पैदा की है,-जीवन है.!यह बताया है,एक माँ ,पत्नी,इसके  अलावा क्या है ?तुमने  पूछा  कि सबके सामने लाओगे? क्या हर्ज है? किसका डर है? हम क्या चोरी कर रहे हैं? मेरी सोच तो आपके साथ है और इस सोच में जीवन ही तो है ,अवसाद तो नहीं। बाकी दोनों की  सोच समाज का नज़रिया बदल देती है. बस थोड़ा सा समय चाहिए होता है. खुद को व्यक्त करने के लिए। सोच हमारे पास है तुमने  मेरी सोच बदल दी ,और एक सोच से जीवन, घर, संसार चलता है।
प्यार का पाठ पढ़वा दिया। मैंने कभी पढ़ा नहीं था ,सुना था प्यार होता है ,देखा नहीं था,किसी को दिया तो उसने बिखेर दिया ,और अब उस बिखरे हुए कणों को समेटे जी रहा हूँ ,कहीं फिर सजाने के लिए!  
मेरी सोच भी यही थी, मगर जो हौसला तुमने दिखाया, वो शायद किसी में नहीं है. ,यह मेरा सौभाग्य है कि मैंने उसको पढ़ा और समझा इसके बाद तुमने भी मेरी भावनाओं को समझ कर बस दो शब्दों में जवाब  दिया।
"हाँ यह सच है" ,तुमने  लिखा कि प्यार एक शब्द नहीं है। अहसास है. और इसे लिखने के लिए किताब लिखनी पड़ेगी। शब्दों का मतलब वही समझ सकता है. जिसके पास सोच और हृदय हो ,हृदयहीनता तो आज समाज में भरी पड़ी है तब ही हृदयहीन लोग कानून और परम्पराओं,मान्यताओं और समाज का सहारा लेते हैं क्यूंकि उनके पास सोच नहीं होती कि उनको क्या चाहिए,
समाज से,खुद से,और दूसरों से ,उनको यह भी नहीं पता होता कि जो है,उसमे गलत क्या है,ऐसे में खुद से डरते है और समाज का नाम लेते हैं।मैं जानता हूँ कम उम्र में ही पति का वियोग जीवन का अर्थ ही समाप्त कर देता है.
मगर तुम्हारे पास अपनी सोच का जो डायनामाइट है, उससे तो तुमने अपने भीतर समाज की वर्जनाएं ध्वस्त कर दी ,यह कम बड़ी बात है कि जीवन के इस मोड़ पर जब पता है की बेटी के हाथ पीले करने हैं ,फिर से जब अकेला पन दस्तक दे रहा है तो किसी अहसास के साथ कब तक जिया जा सकता है?और एक एक अहसास मौत से भी भयानक दहशत पैदा कर रहा है।
जिसने अहसास को अपनी सोच के साथ जीवन दिया हो, उसे जीवन से ही तो प्यार होगा ,खुद के जीने से भी और किसी को जीवन देने की भी तमन्ना भी ,इन सबके बीच में अपराध बोध कहाँ से आ गया?किसी समाज में जीवन देने और जीवन बचाने का हौसला रखने की सोच अपराध है ,तो उस समाज की परवाह क्यूँ की जाए और कौन करेगा?आखिर वर्जनाएं टूटी है, तो ही परम्पराएं बनती हैं. और कानून भी ऐसे ही बनता है।
प्यार और सुख देने की सोच ही किसी कि तलाश की और ले जाती है न मैंने न. तुमने किसी की तलाश की  थी, अचानक कुछ क्लिक हुआ उसके बाद तो केवल विचार ही पढ़े और देखे और वो एक ही पल में इतने भीतर तक प्रवेश कर गए कि प्रतिक्रिया में क्या लिखा न अब याद है और कुछ  ध्यान सा आता है।  केवल तुम्हारे  जवाब से
"हाँ यह सच है"---इसके बाद किसी को भी जानने और पहचानने की गुंजाइश ही कहाँ बचती है? वैधव्य के प्रतिबन्ध और समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप आचरण की बाध्यताओं के बीच मध्य वर्ग कि कोई लड़की प्यार की व्याख्या करे और बेबाकी से उसे समाज के बीच ले जाने  का कोई रास्ता न होते हुए सिर्फ सहेजने के लिए रख ले और कहते हैं शब्द ब्रह्म होता है, प्यार जीवन होता है,
ब्रह्म और जीवन को कोई बाँध या रोक सका है?
तुम्हारी क्या बिसात थी?
तुमने तो समाज को और उन लाखों करोड़ों लड़कियों को एक सबक दिया है!हौसला दिया है, ज़िन्दगी का !अपने झूठे अपराधबोध को खुद न पर लादकर मुझे भी अनजाने अपराध का अहसास करवा रही हो??आखिर तुम्हे जानकर और समझ कर मैंने कौन सा अपराध कर कर दिया?जो तुम अपने सारे शब्दों से ही पलट गयीं?क्या प्यार की  झूठी परिभाषा लिख डाली?लिख भी ली तो उसे मुझे क्यूं पढ़वाया?मैंने पढ़ा और प्रतिक्रया दी ,तभी कह देती यह झूठ है?अगली ही बात में तुमने  जीवन का सार थोड़े से ही शब्दों में उड़ेलकर मेरी ज़िदगी का सारा मवाद एक झटके में यह कहकर निकलवा दिया कि " अब तुम दुखी मत होना !"
क्या था इसका अर्थ? किससे  कहा था? 
कौन था वो तुम्हारा?
क्यों दी थी दिलासा? किसी और के  भरोसे? वो कोई और थी? यो खुद को दिलासा दी थी? फिर बात हुई नहीं कि बेहद अपनेपन के शब्द ! "तुम" का सम्बोधन
वह भी तब जब मैंने आप कहकर बात की तब तभी तुम्हारे भीतर का "तुम" तुम्हे रोक नहीं पाया? वो तुम ही तो थी ! या तुम ही तो हो? या "तुम" मैं था!

2 टिप्‍पणियां:

Sanjeev Kumar ने कहा…

Kaafi jyada litrary hai shayad.Logon ko Samajh nahi aayegi.

Asheesh Agarwal ने कहा…

धन्यवाद ,संजीव जी इसकी अगली कड़ी आपको पसंद आएगी!