20/12/2015

वकीलों के हक मे बरेली से शुरू हुई बड़ी जंग मे पहली जीत !

प्रो वसीम बरेलवी की इस नज़्म को अमर भारती ने हकीकत मे बदल दिया है 
वरिष्ठ अधिवक्ता घनश्याम शर्मा 
"बार एसोसिएशन के मौजूदा सचिव अमर भारती की याचिका पर इलाहाबद हाईकोर्ट ने विगत दस दिसंबर को एक आदेश जारी किया है ,जिसमें उनकी दलीलों को फौरी तौर अपर अदालत ने स्वीकार करते हुये मामले की सुनवाई के लिए अब 12 जनवरी की तारीख तय कर दी है । इस मुद्दे पर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के उम्मीदद्वार एडवोकेट घनश्याम शर्मा की भी नाइत्तेफकी नहीं है । श्री शर्मा कहते हैं कि वकीलो के हितों के लिए चाहे किसी हद जाना पड़े हम पीछे नहीं हटने वाले नहीं हैं । आखिर आम आदमी को इंसाफ दिलाने के लिए जब वकील कोई कसर नहीं छोडते तो उनके खुद के लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी लड़ाई से पीछे हटने का सवाल ही नहीं । अमर भारती कहते हैं यह कहाँ की तुक है कि बार काउंसिल आफ यूपी का चुनाव पाँच साल और जिलों की एसोसिएशन का कार्यकाल एक साल का ?जिले मे अध्यक्ष 25 साल की स्टैंडिंग पर चुनाव लड़ेगा ,और मौजूदा बार काउंसिल के अध्यक्ष मात्र तीन-चार साल की प्रैक्टिस के बाद ही बन गए हैं।बस हमारी लड़ाई जिले और तहसीलों के वकीलों के हक मे है,जो उनके मान सम्मान और आर्थिक हितों के साथ उनके भविष्य के लिए भी । 
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर प्रो वसीम बरेलवी की यह नज़्म मौजूदा समय मे बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती  ने हकीकत मे चरितार्थ कर दी है । अमर भारती वकालत का पेशा विरासत मे मिला । उनके पिता श्री रवीद्र भारती एडवोकेट बरेली के एक नामी वकील रहे । उनके बेटे अमर भारती ने जब पहली बार ने सन 2000 से बरेली बार एसोसिएशन मे बतौर कनिष्ठ उपाध्यक्ष कदम रखा और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा । फिलहाल वह पिछले करीब दस सालों से बार एसोसिएशन के सचिव चुने जा रहे हैं । बार एसोसिएशन के सचिव की हैसियत अमर भारती एडवोकेट ने अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी के तहत एक बड़ी लड़ाई छेड़ दी है । यह लड़ाई सरकार से नहीं ,बल्कि अपनी ही उस संस्था से है, जो सदियों से वकीलों के लिए एक मात्र नियामक और नियंत्रक संस्था है ,यही वह संस्था है जो कानून की पढ़ाई करने के बाद वकील के रूप मे पंजीकरण करीत है और वकीलों की नकेल मे अपने हाथ मे रखती है । बार काउंसिल वकीलों के लिए एक बहुत बड़ा हौसला है मगर यह हौसला कितना खोखला है ,अमर भारती ने इसी गलत फहमी के खिलाफ जंग छेड़ दी है ।
भारतीय लोकतन्त्र का महत्वपूर्ण स्तम्भ न्यायपालिका का अभिन्न अंग कहे जाने वाले वकीलों की सबसे बड़ी नियंत्रक और नियामक संस्था बार काउंसिल आफ इंडिया के बाद राज्यों मे इसकी ज़िम्मेदारी बार काउंसिल की होती है ,जिसका गठन बाकयदा एक अधिनियम के तहत किया गया है।राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर यही संस्थाएं वकीलों के पंजीकरण से लेकर उनके हितों और अस्तित्व की रक्षा की लड़ाई लड़ती हैं । अधिवक्ता अधिनियम 1961 के बाद से आज यह पहला मौका है जब किसी वकील की तरफ से ही बार काउंसिल के किसी आदेश को चुनौती मिली है ।पहले भी बार काउंसिल ने कुछ और मुद्दों पर अपना कदम पीछे हटाया है मगर इस बार कि बरेली से मिली यह चुनौती ही देश भर के वकीलों की दशा और दिशा बदलने की दिशा मे मील का पत्थर साबित होगी । बात सिर्फ इतनी नहीं है ,बरेली की बार एसोसिएशन ने इन कुछ मुद्दों के साथ और भी सवाल उठाए हैं जिनसे यू पी बार काउंसिल को कम से कम आईना तो दिखता ही है । उन्होने इसीलिए अपनी बात काउंसिल से निराश हकार सीधे हाईकोर्ट के सामने रखी है । 
हालांकि मुद्दा केवल बरेली बार एसोसिएशन के चुनाव का था ,मगर इसी बहाने बात कुछ ऐसी बन गयी जिसने एक ऐसे मुद्दे का रूप ले लिया है जो आज नहीं तो कल राष्ट्रीय स्तर पर वकीलों की आने वाली पीढ़ी के साथ, उन सारे वकीलों के लिए बहुत बड़ी उम्मीद्द की किरण होगी जो दूसरों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ते लड़ते ,खुद से हार गए ! ऐसे मे वाकई बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती नयी पीढ़ी के वकीलों के लिए एक उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं ।
बार एसोसिएशन के चुनाव और कार्यकाल की एक जरा सी बात इतना बाद रूप लेगी इसका अंदाजा अमर भारती को  भी नहीं था ,मगर बात आगे बढ्ने पर किसी भी हालत मे पीछे न हटने का उनका संकल्प आने वाले वक्त मे बहुत बड़ा गुल खिलाने वाला है ,इसमें दो राय नहीं ।अमर भारती के मन मे बेहद गुस्सा है ,बार काउंसिल की नीतियों के खिलाफ -जो हर तरफ से जिले के वकीलों के प्रति भेदभाव और उपेक्षा और दोयम दर्जे के व्यवहार को साफ परिलक्षित करती हैं । 
"बार एसोसिएशन के मौजूदा सचिव अमर भारती की याचिका पर इलाहाबद हाईकोर्ट ने विगत दस दिसंबर को एक आदेश जारी किया है ,जिसमें उनकी दलीलों को फौरी तौर अपर अदालत ने स्वीकार करते हुये मामले की सुनवाई के लिए अब 12 जनवरी की तारीख तय कर दी है । इस मुद्दे पर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के उम्मीदद्वार एडवोकेट घनश्याम शर्मा की भी नाइत्तेफकी नहीं है । श्री शर्मा कहते हैं कि वकीलो के हितों के लिए चाहे किसी हद तक जाना पड़े। अमर भारती कहते हैं "यह कहाँ की तुक है कि बार काउंसिल आफ यूपी का चुनाव पाँच साल और जिलों की एसोसिएशन का चुनाव एक साल का ? जिले मे अध्यक्ष 25 साल की स्टैंडिंग पर चुनाव लड़ेगा ,और मौजूदा बार काउंसिल के अध्यक्ष मात्र तीन चार साल की प्रैक्टिस के बाद ही बन गए हैं । कोई छोटे से कागज पर किसी वकील के खिलाफ शिकायत बार काउंसिल को भेज दे और बस इसी पर बार काउंसिल उस वकील को किसी भी जिले मे अपनी होने वाली बैठक मे तलब कर लेती है और आखिरी क्षण मे वह बैठक रद्द हो जाती है ,ऐसे मे आर्थिक तंगी झेल रहे वकील पर क्या गुजरती होगी होगी जब उसे स्टेशन से ही वापस लौटना पड़ता है ! अजीब मज़ाक है !मान समान का तो प्रश्न ही अभी पैदा नहीं हुआ है -हम किसी के खिलाफ नहीं हैं,बस हमारी लड़ाई जिले और तहसीलों के वकीलों के हक मे है जो उनके मान समान और आर्थिक हितों के साथ उनके भविष्य के लिए भी है ।
जाना पड़े हम पीछे नहीं हटने वाले नहीं हैं । आखिर आम आदमी को इंसाफ दिलाने के लिए जब वकील कोई कसर नहीं छोडते तो उनके खुद के लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी लड़ाई से पीछे हटने का सवाल ही नहीं ।
रअसल बात अगर बार एसोसिएशन  और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के बीच होती तो तो भी ठीक था ,मगर उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने एक छोटी सी बात को हाईकोर्ट तक पहुंचा कर इसे नया मोड दे दिया । हालांकि इसकी वजह सिर्फ यही थी अपने हक मे वकीलों ने आज तक सिर्फ अपना अस्तित्व बार काउंसिल के हवाले करके अपना जीवन वाकई कानून के हवाले कर दिया और कानून ने कभी पलट कर नहीं देखा कि आखिर वकीलों की हालत क्या है ? अमर भारती का सवाल है -चार साल ही वकालत के पेशे मे आने पर बार काउंसिल का अध्यक्ष के चुनाव की हर्ता हो सकती है तो फिर प्रदेश भर की बार एसोसिएशन (जिले की ) मे यह 25 साल होना कहाँ तक न्याय संगत है ? यही नहीं 2012 मे एक ऐसा प्रस्ताव पारित कर दिया गया कि 2010 2के बाद एलएलबी की पढ़ाई करने करने वाले बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश मे एक वकील के तौर पर पंजीकृत तो हो जाएंगे मगर ,उन्हें अपने जिले की बार एसोसिएशन मे वोट देने का अधिकार भी नहीं होगा और न ही वह सीधे किसी अदालत मे प्रैक्टिस भी नहीं कर सकते ! बस इन्हीं बातों ने अमर भारती को इस कदर झकझोर दिया कि उन्होने अपने इससे पूर्व के कार्यकाल मे बरेली की बार एसोसिएशन को एक अलग सोसाइटी के रूप  मे पंजीकृत करके कम से कम बरेली के उन हजारों युवाओं का भविष्य पर छाया कुहासा छाँट दिया, जो एक वकील के रूप मे पंजीकृत होने के बाद भी उनका हौसला तोड़ देने वाला था । 
क बड़ा मुद्दा बार एसोसिएशन के चुनाव और निर्वाचित कार्यकारिणी के कार्यकाल का था । बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश का चुनाव उसकी स्थापना से पाँच साल के लिए होता है ,यही आज भी है ,मगर इसी बार काउंसिल ने जिलों की बार एसोसिएशनों के लिए यह कार्यकाल एक साल कर रखा है। तमाम वकीलों का यह एक बड़ा सवाल था एक साल के कार्यकाल मे कौन सी बार एसोसिएशन अपने वकीलों के हितों पर ध्यान दे सकती है ?आखिर यह भेदभाव पूर्ण व्यवस्था क्यों? इसी के खिलाफ उन्होने बरेली की बार एसोसिएशन को एक अलग पंजीकृत संस्था के रूप मे स्थापित करके अपणी अलग नियमावली बना ली । और जिसमे कार्यकाल दो साल कर निर्धारित कर लिया गया है । यह उनका सवाल है इस पर बार काउंसिल को आपत्ति क्यों? बार काउंसिल जिले स्तर या प्रदेश स्तर के वकीलो के हक मे कितना कुछ कर पायी है -इसके बार मे कुछ कहने के बजाए अमर भारती कहते हैं इसका जवाब प्रदेश भर के वकील ज्यादा बेहतर दे सकते हैं । अमर भारती बताते हैं कि हमने अपने फैसले की जानकारी बार काउंसिल कू पूर्ण सम्मान देते हुये बाकायदा प्रदान कि और उन्होने हमे उस पर अपनी तात्कालिक सहमति भी दी ,मगर हाल मे बरेली के जिला जज को एक सूचना भेज कर हमे चुनाव कराने से रोकने की कोशिश भी की गयी और ऊपर से तुर्रा यह कि पदाधिकारी रह चुके लोग चुनाव नहीं लड़ सकते !आखिर बार का अंदरूनी मामला बेंच को भेजने का क्या औचित्य है ? बार काउंसिल बार और वकीलों की है या बेंच की ?यह भी एक नया सवाल खड़ा कर दिया गया है । बार और बेंच रेल की पटरियाँ है ,जो जुड़ गईं तो गाड़ी नहीं चलेगी !
ह भी कम हैरत की बात नहीं है कि बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी वैसे तो पूरे प्रदेश के वकीलों के हितों के संरक्षण और संवर्धन की है ,मगर आज तक प्रदेश के वकील काउंसिल से नाउम्मीद ही हुये हैं ,और यही वजह रही कि बरसों से वकीलों के भीतर घुमड़ रही चिंगारी की तपिश को अमर भारती ने बड़ी शिद्दत के साथ महसूस किया और उसे हवा देकर एक ऐसी चिंगारी बना दिया है जो आने वाले दौर मे न केवल उत्तर प्रदेश के, वरन देश भर के वकीलों को अपने हितों को किसी और के हाथों गिरवी रखने का मौका नहीं देगी । 
रअसल हुआ यह कि बार काउंसिल आफ इंडिया ने एक फैसला लिया  कि 2010 के बाद से एलएलबी की डिग्री हासिल करने वाले एक वकील के तौर पर अपना पंजीकरण तो करा लेंगे ,मगर वकालत करने के लिए उन्हें आल इंडिया बार काउंसिल का एक इम्तिहान और पास करना होगा ।इसके साथ ही पंजीकरण शुल्क भी बढ़ा कर 12-13 हजार कर दिया गया । यही नहीं इसके पहले भी कानून की डिग्री ले चुके लोग बढ़ती उम्र मे अपना वकील के रूप मे पंजीकरण कराएं तो उन्हें भी इसका अधिक शुल्क देना पड़ेगा । यह फैसले लागू भी हो गए । यहाँ तक तो सब ठीक था ,मगर जिलों मे बार एसोसिएशन को संबद्धता प्रदान कने वाली यू पी बार काउंसिल ने खुद के लिए अलग और जिलों के लिए अलग नियम बना रखे हैं,बस यही बात एक आग के रूप मे अमर भारती को कचोट रही थ जिसके खिलाफ उन्होने बहुत धीरे से जंग का अघोषित ऐलान 2012 मे बार एसोसिएशन के सचिव चुने जाने के बाद कर दिया । जिलों की बार एसोसिएशन का कार्यकाल एक साल का चला आ रहा है ,मगर अमर भारती ने बरेली की बार एसोसिएशन को अपनी एक अलग संस्था के रूप मे पंजीकृत करा के अपना संविधान बना लिया और संबद्धता जरूर यू पी बार काउंसिल से रखी । उसके बाद उन्होने सालाना चुनाव नहीं कराये और बार एसोसिएशन का कार्यकाल दो साल का कर लिए। जिसे बड़ी संख्या मे वकीलों का समर्थन भी मिला । बार काउंसिल भी इस मुद्दे पर चुप रही । उसने कोई दखल नहीं किया । इसके ठीक विपरीत यू पी बार काउंसिल का चुनाव पहले से ही पाँच साल के लिए है । 
देश भर मे वकीलों की नियामक संस्था बार काउंसिल आफ इंडिया है । बार काउंसिल आफ इंडिया ही राज्यों मे बार काउंसिल को संबद्धता प्रदान करने के साथ कानून की पढ़ाई करके वकालत करने वालों का पंजीकरण करके उन्हेन्बाक्यड़ा विधि  व्यवसाय करने की अनुमति प्रदान करती है । यहाँ कहने मे कोई संकोच नहीं है बार काउंसिल मात्र यही एक काम करके वकीलों को शेष जीवन के लिए अपने हकों की लड़ाई लड़ने का हक एक तरह से गिरवी रख लेती है । एक वकील की तो क्या कहें देश भर मे राज्यों और जिलों की बार एसोसिएशन की आज तक हिम्मत नहीं हयी कि वह बार काउंसिल से एक वकील के हक मे कुछ आवाज़ उठाने को सुझाव भी दें ! यह भी कम हैरत की बात नहीं है कि बार काउंसिल एक वकील के खिलाफ जरा सी भी शिकायत सुनने के लिए आतुर रहती हैं और इस शिकायत के नाम पर वकीलों को यदा कदा लंबी और निरर्थक और लंबी  यात्राएं भी करनी पड़ जाती हैं । दूसरों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले और कभी कभी जनहित याचिकाओं के जरिये समूचे समाज के खुद के किसी स्वार्थ के बिना कानून से लड़ जाने वाले खुद कितने कमजोर हैं ,बस इसी दर्द के एहसास ने बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती को न केवल झकझोर दिया बल्कि हालत बदलने की पहल का रास्ता खोजने को मजबूर  भी कर दिया ,जिसके पहले पड़ाव मे उन्हें आगे का रास्ता लंबा मगर साफ दिखाई दे रहा है । 
मर भारती ने जिस तरह से धीरे धीरे कदम बढ़ाकर जो एक बड़ी जंग छेड़ी है उससे न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश के अन्य राज्यों और इलोन की बार एसोसिएशनों को भी आज नहीं तो कल अँग्रेजी सोच पर आधारित अपने उन कड़े कानूनों ओ बदलना पड़ेगा जो एक वकील के हौसले और आत्मसम्मान के लिए बहुत जरूरी है । ऐसे मे युवा पीढ़ी को इस बेहद सम्मानजनक और न्याय व्यवस्था के आधार स्तम्भ पेशे की गरिमा को बनाए रखने मे भी सहूलियत होगी ।
                                                                                                      -आशीष अग्रवाल 
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HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD 

Court No. - 39 
Case :- WRIT - C No. - 65946 of 2015 
Petitioner :- Bareilly Bar Association & Another 
Respondent :- Bar Council Of U.P. & 2 Others 
Counsel for Petitioner :- Subodh Kumar,Udit Chandra 
Counsel for Respondent :- Ashutosh Dwivedi 

Hon'ble Dilip Gupta,J. 
Hon'ble Mukhtar Ahmad,J. 
This petition seeks the quashing of the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman, Bar Council of Uttar Pradesh by which the amendments made in the bye-laws of the Bareilly Bar Association have been declared void ab initio and rejected. The petitioners have also sought the quashing of the communication dated 28 November 2015 sent by the Secretary of the Bar Council of Uttar Pradesh to the District Judge, Bareilly for implementation of the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman of the Bar Council of Uttar Pradesh. 
It is the submission of the learned counsel for the petitioners that the amendments were carried out in the Constitution of the Bareilly Bar Association in accordance with the procedure prescribed and were dully approved by the Assistant Registrar, Firms, Societies and Chit Funds, Bareilly. Learned counsel has also pointed out that in terms of the Constitution of the Bareilly Bar Association there was no necessity at all of seeking approval of the Bar Council of Uttar Pradesh before making any amendments in the Constitution. In support of his contention learned counsel has placed reliance upon a Division Bench judgment of this Court passed in Writ C-No. 42417 of 20151 . 
Learned counsel appearing for the Bar Council of Uttar Pradesh, however, has placed reliance upon the provisions of clause- 53 of the bye laws and has submitted that the Executive Committee could, from time to time, frame bye-laws but the said bye-laws framed would not be effective till they were approved by the Bar Council. It is, therefore, his contention that if any amendment is made in the bye-laws it cannot be effective until it is approved by the Bar Council. The submission, therefore, is that the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman of the Bar Council does not suffer from any illegality. 
Shri Ashutosh Dwivedi has put in appearance on behalf of respondent nos. 1 and 2. 
Learned counsel for the petitioners has, however, pointed out that the clause on which learned counsel for the respondents have placed reliance, was amended subsequently and the amended clause-53 provides that the Executive Committee may, from time to time, frame bye-laws for the purpose of carrying of the objects of regulating the activities of the Association. 
We are of the prima facie opinion that the Chairman of the Bar Council of Uttar Pradesh had no jurisdiction to annul the amendments that had been made in the Constitution of Bareilly Bar Association, particularly when the Assistant Registrar, Firms, Societies and Chit Funds, Bareilly had approved the amendments made in the bye-laws on 18 December 2014. Accordingly, the operation of the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman, Bar Council of Uttar Pradesh shall remain stayed and the implementation of the consequential communication dated 28 November 2015 sent by the Secretary of the Bar Council of Uttar Pradesh to the District Judge, Bareilly shall also remain stayed. 
Issue notice to respondent no.3 by registered post. Steps be taken within a week. 
Respondents may file their counter affidavits within two weeks. Rejoinder affidavit, if any, may be filed within a week thereafter. 
List this petition for admission/ hearing on 12 January 2016. 
Order Date :- 10.12.2015 
Fhd. 
(Dilip Gupta, J.) 
(Mukhtar Ahmad, J.) 

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