03/12/2015

गजब की नेतृत्व क्षमता है विपिन धूलिया में !

National Secretary IFWJ Vipin Dhuliya  
" सन 1982 मे दिल्ली से जनसत्ता शुरू होने के बाद उस के तेवरों ने बेशक पत्रकारिता को नए आयाम दिये ,मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे विपिन धूलिया पहले पत्रकार थे जिसने उससे भी आगे बढ़कर मौलिकता के साथ अखबार और खबरों के साथ पत्रकारों के हितों के मोर्चे पर एक साथ काम किया । इस सबसे अलग उन्होने कभी किसी पत्रकार के अनुचित व्यवहार या खबर को प्रश्रय नहीं दिया ।बल्कि पत्रकारों की नयी पीढ़ी को तैयार करने में उनकी हमेशा रूचि रही,जो अब IFWJ में भी  दिखाई देगी।  "

त्तर भारत के पत्रकारों मे विपिन धूलिया एक जाना पहचाना नाम है। करीब बीस साल बाद वह फिर अब चर्चा मे आए हैं, जब उन्हें हाल मे ही मथुरा मे हुये महासंघ के सम्मेलन मे  भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ (IFWJ )के राष्ट्रीय सचिव की कमान सौंपी गयी है ,इस दायित्व् के साथ उन्हें महासंघ के मुख्यालय का भी प्रभारी बनाया गया है । ट्रेड यूनियन और जनहित के मुद्दों पर उनके भीतर की खलबली को मैंने बड़े नजदीक से महसूस किया है ।अपने पेशे के साथ आम जन की हितों पर उनके भीतर की आग को उन्होने अपनी कलम की धार से न केवल आवाज़ दी बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे पत्रकारिता की दशा और दिशा को बदलने मे उनका बहुत बड़ा योगदान है । अपने साथियों के लिए वह हमेशा एक प्रेरणा स्रोत बने और सबसे आश्चर्य की बात यह कि उन्होने पत्रकारिता के पेशे मे आने की ललक रखने वाले किसी भी उम्र के उत्साही व्यक्ति को हतोत्साहित नहीं किया ।
हां बस गए वहीं रम गए ,यह उनका स्वभाव है।उन्होने अपनी पेशेगत जिम्मेदारियों को बखूबी  निभाया । शायद यही वजह रही कि बरेली अमर उजाला से सीधे राष्ट्रीय  न्यूज़ एजेंसी पीटीआई की हिन्दी सेवा ' भाषा ' जब शुरू हुयी तो पहले ही बैच मे उन्हें सीधे उपसंपादक बनाया गया। वहाँ के प्रथम संपादक और वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक की टीम के वह एक जिम्मेदार सदस्य बने और फिर पेशे मे ऐसे रमे कि ट्रेड यूनियन से जुड़े रहने के बावजूद उनकी सक्रियता पत्रकारिता मे ही ज्यादा रही ,वजह उन्हें नित नयी नयी ज़िम्मेदारी मिलती रही और इसके बाद कई टीवी चैनल लांच करने के साथ उन्हें सहारा टीवी मे भी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना पड़ा । पत्रकारिता और ट्रेड यूनियन दोनों मोर्चों पर उनकेव्यक्तित्व में आकर्षण के साथ एक बेबाकी और आक्रामकता उनकी ख़ास पहचान है।
स समय इलेक्ट्रानिक मीडिया मे कोई खबर आ जाना बहुत बड़ी बात थी , उन्होने इस क्षेत्र मे भी नया और क्रांतिकारी कदम उठाया । नीतियों मे परिवर्तन करके कस्बों और तहसीलों के पत्रकारों की बहुत बड़ी टीम बनाकर सहारा टीवी पर कस्बों और शहरों की हर छोटी-छोटी खबर को राष्ट्रीय बना दिया । उस समय ये खबरें टीवी की स्क्रीन पर नीचे एक स्ट्रिप के रूप मे चलती थी । यह एक ऐसा कदम था, जिसने इलेक्ट्रानिक मीडिया की दिशा बदल दी और इसके बाद लगभग सभी टीवी चैनलों को क्षेत्रीय पत्रकारिता की ओर रुख करना पड़ा।  जिसका नतीजा है कि आज छोटे छोटे कस्बों मे टीवी चैनलों के पत्रकार हैं । इससे भी ज्यादा  महत्वपूर्ण बात यह रही कि छोटे कस्बों के पत्रकारों को उनकी ही पहल पर आर्थिक संरक्षण मिला । प्रबंधन को मजबूरन उनकी बात माननी पड़ी । नतीजतन पेशेवर पत्रकारों की एक बहुत बड़ी टीम कहें या पीढ़ी तैयार हो गयी जो आज भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का आधार स्तम्भ है ।
विपिन धूलिया के व्यक्तित्व मे एक गज़ब का आकर्षण और एक अद्भुत नेतृत्व क्षमता है । पत्रकारिता उनकी पहली प्राथमिकता तो ट्रेड यूनियन उनका सपना -दोनों मोर्चों पर उन्होने अपने शुरुआती दौर मे साथ साथ काम किया । उन्होने कभी किसी को किसी भी तरह के पूर्वाग्रह  से नहीं देखा । पत्रकारों के हितों के लिए संघर्ष मे युवावास्था से ही आगे बढ्ने की चाह  रखने वाले विपिन धूलिया ने सन 1984 में श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की सुप्त पड़ी बरेली इकाई को सक्रिय किया और बहुत कम समय मे ही बरेली मे एक यू पी इकाई का सम्मेलन कराने के बाद बहुत जल्दी ही नैनीताल मे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ की राष्ट्रीय कार्यपरिषद का सम्मेलन अपने दम पर आयोजित करने का भी प्रण किया और उसे पूरा भी किया। यह सम्मेलन श्रमजीवी पत्रकार महासंघ के लिए इस मायने मे यादगार बना कि उस दौरान उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र (कुमायूं और गढ़वाल मण्डल -वर्तमान उत्तराखंड प्रदेश ) के सभी जनपदों मे यूनियन की सक्रियता हुयी और बहुत सारे लोग उस समय पत्रकारों के इस सबसे बड़े संगठन से जुड़े । हालांकि यह कोई सामाजिक उपलब्धि नहीं कही जाएगी मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अब उत्तराखंड राज्य के पत्रकारों के लिए वह उस समय बहुत बड़ी उम्मीद की किरण बनकर उभरे । बात पत्रकारों के वेतनमान और आर्थिक हितों की हो या उनकी सुरक्षा की,धूलिया जी ने हमेशा आगे बढ़कर पत्रकारों को हिम्मत दी और उस दौरान इस सारे इलाके मे पत्रकारों  के भीतर आत्मसमान और सुरक्षा का एक ऐसा भाव आया,जिससे पत्रकारों के बीच नया नेतृत्व उभरा । उत्तराखंड और पश्चिमी  उत्तर प्रदेश  जिलों में  इकाइयां सक्रिय हुईं। इसका नतीजा यह हुआ कि पत्रकारों के दूसरे संगठन एनयूजे और उसकी उत्तर प्रदेश इकाई की सक्रियता भी और बढ़ी ।एक स्वस्थ प्रतियोगी माहौल ने पत्रकारों  की गरिमा बढ़ाई ।
मैं धूलिया जी को तब से जनता हूँ,जब वह बरेली अमर उजाला मे  आए थे जब मैं 1984 मे अपनी एलएलबी की पढ़ाई कर रहा था और छत्र और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ा हुआ था । वह उस समय अमर उजाला मे एक रिपोर्टर थे । अक्सर अपने आंदोलनो की खबर लेकर मैं अमरउजाला के दफ्तर जाता था -साथियों के साथ ! मेरी लिखी खबर को पढ़ने के बाद उन्होने मेरा परिचय मेरे भीतर के पत्रकार से करवाया । मैं हतप्रभ था । हमारे द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों पर उन्होने  एक पत्रकार की नजर से काम किया और लोगों को इंसाफ मिला । और उनकी सतत प्रेरणा से मैंने अपना एलएलबी का परिणाम आने के बाद बजाए वकालत के , 28 अक्तूबर 1985 को अमरउजाला में एक प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में काम शुरू किया । इतना ही नहीं उन्होने ही मुझे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ से जोड़ा और जिले से लेकर राष्ट्रीय परिषद तक के लिए सदस्य चुने जाने का अवसर भी मुझे मिला । कई बार उनके साथ कई राज्यों की यात्राएं आज भी मेरे जीवन के सुखद संस्मरण हैं । हालांकि दिल्ली जाने के बाद भी मेरा उनसे सतत संपर्क बना रहा । उनके संपर्क मे मैं अकेला नहीं था ,और भी बहुतेरे पत्रकार थे जिनसे उनके संबंध सदैव मधुर बने रहे ।
मुझे याद है कुछ निहित स्वार्थी संगठनों के हितों पर चोट होने की वजह से एक बार तो पूरे बरेली मे उनके खिलाफ  एक ऐसा माहौल बना कि  दीवारों पर उनके खिलाफ नारे लिखे गए ,मगर उस दौरान सच्चाई और पेशेगत ईमानदारी के चलते अमरउजाला प्रबंधन उनके साथ खड़ा था । अमर उजाला के तत्कालीन संपादक श्री अशोक अग्रवाल और स्व. अतुल माहेश्वरी जी के निर्देशन मे एक तरफ जहा उन्होने अपनी कलम को  धार दी वहीं अखबार ने भी करवट ली । उनकी खबरें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के लिए सबक बनी ,लिहाजा इस समूचे इलाके की पत्रकारों की भाषा ही बदल गयी । सन 1982 मे दिल्ली से जनसत्ता शुरू होने के बाद उस के तेवरों ने बेशक पत्रकारिता को नए आयाम दिये ,मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे विपिन धूलिया पहले पत्रकार थे,जिसने उससे भी आगे बढ़कर मौलिकता के साथ अखबार  और खबरों के साथ पत्रकारों के हितों के मोर्चे पर एक साथ काम किया । इस सबसे अलग उन्होने कभी किसी पत्रकार के अनुचित व्यवहार या खबर को प्रश्रय नहीं दिया । बल्कि पत्रकारों की नयी पीढ़ी को तैयार करने में उनकी हमेशा रूचि रही,जो अब IFWJ में भी  दिखाई देगी।
मरउजाला के उस समय  मात्र दो ही एडिशन थे -आगरा और बरेली । यही दोनों एडिशन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आवाज़  हुआ करते थे । संचार और तकनीक के सीमित युग मे उन्होने रिपोटिंग और अखबार को नए तेवर दिए  ,इसमे दो राय नहीं। नवीनतम तकनीक अपनाने मे अमर उजाला कभी देश के नामी और बड़े कहे जाने अखबारों से पीछे नहीं रहा ,उस दौर की पत्रकारिता को लोग आज भी याद करते हैं और विपिन धूलिया भी अपने उस कार्यकाल को कभी भूल नहीं पाएंगे,बरेली उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है । बीते 25 सालों पत्रकारिता मे ही रमे  विपिन धूलिया का जीवन के इस पड़ाव मे सबसे बड़ा दूसरा सपना पूरा होने  जा रहा है ,उनका सपना था भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ के शीर्ष नेतृत्व मे शामिल होकर संगठन को नयी दिशा देना, जिससे देश भर के पत्रकारों के हितों मे कुछ सार्थक काम किया जा सके ,वह घड़ी अब आ गयी है ,और विपिन धूलिया जीवन के दूसरे दौर मे फिर एक नए मोर्चे पर तैनात हैं ! निश्चित तौर पर भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ को नए बदलाव से नयी दिशा मिलेगी और संगठन फिर से अपना गौरव शैली इतिहास लिखने की और बढ़ेगा।
-आशीष अग्रवाल 

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