08/07/2016

जातियाँ - अनुप्रिया 'कुर्मी' अजय टमटा 'दलित' और दीपक सिंघल 'भ्रष्ट' !

अनुप्रिया पटेल -केन्द्रीय राज्य मंत्र
ई दिनों से उलझन के चलते मन विचलित है । यही नहीं समझ पा रहा हूँ कि देश और प्रदेश का विकास कौन करता है ? राजनीतिक दलों का चुनावी एजेंडा ,इस देश की जातियाँ या फिर सरकार की नीतियाँ , सरकार मे बैठे विभिन्न योग्यताओं से लकधक मंत्री और अफसर ! या फिर कुछ जातियां ! ये जातियाँ अपना विकास करती हैं या देश का ? कुछ जातियाँ ऐसी भी जो इस देश को चूसे-खाये जा रही हैं आखिर अपना खोया हुआ गौरव वापस लाने के रास्ते पर चल पड़ा और एक बार फिर विश्वगुरु बनने पर आमादा भारत का आज के दौर मे बदले हुये माहौल मे क्या अब भी वही भविष्य है ,जिसे खोजते-खोजते हमने "आजादी के सात दशक ' बना लिए और आज भी बाकायदा खास अभियान चलाकर गाँव गलियों की सफाई के साथ भारत की सरकार अपने नागरिकों को यह बता रही  है कि उन्हें शौच कैसे करनी है ,कहाँ, करनी है ! यहाँ तक की महिलाओं का प्राकृतिक मासिक धर्म से शरीर की सुरक्षा का प्रचार भी आज भारत भर मे सरकारों  की एक योजना का हिस्सा है ।
देश को अपने अपने नजरिए से देखने के लिए तो सब स्वतंत्र हैं ,खासकर मीडिया । मगर क्या मीडिया भी खुद को उस सोच से बचाकर रख पाया है जिसके लिए वह खुद आए दिन राजनीतिक दलों और सत्ता के तमाम प्रतिष्ठानों को आड़े हाथों लिए रहता है । वह खुद रम गया है उसमे । रच बस गया है । बाहर निकलना ही नहीं चाहता । राजनीतिक दलों का संकीर्ण नजरिया ,मीडिया के व्यवहार मे ऐसे समा गया है ,मानो यही एक आचार संहिता है ।
हाल मे दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र और इस लोकतन्त्र के सबसे बड़े सूबे मे दो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुये । हमारे देश के मीडिया ने इसे अपनी चिर-परीचित विद्वता के साथ टीका-टिप्पणियों के साथ दोनों की कवरेज और विश्लेषण दिये । केंद्र की सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार और देश के उस प्रदेश के मुख्य सचिव की नियुक्ति ,जिसमें सभी दल चुनाव की तैयारी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाकर मैदान-ए-जंग मे कूद पड़े हैं ,मतलब उत्तर प्रदेश की सरकार ने अभी दो दिन पहले दीपक सिंघल जैसे बहुचर्चित आईएएस अधिकारी को नया मुख्य सचिव बनाया है ।
स बारे मे जो खबरें मीडिया मे आयीं, वो दो तरह की थीं । बक़ौल मीडिया -केंदीय मंत्रिमंडल मे शामिल किए गए नए मंत्रियों को लेकर मीडिया ने ज़्यादातर की जाति देखी ,खासकर जिन राज्यों मे चुनाव होने वाले हैं ,वहाँ प्रधानमंत्री ने जिस जाति के मंत्री को मंत्रिमंडल मे शामिल किया ,वहाँ तो उसकी जाति के वोटों को लुभाने के लिए  किया । मसलन उत्तर प्रदेश मे अपना दल की अनुप्रिया पटेल को कुर्मी वोटों की वजह से मंत्री बनाया गया । अनुप्रिया एक युवा और पढ़ी लिखी ,आधुनिक विचारों और जीवन शैली वाली ऐसी महिला है ,जिसे राजनीति विरासत मे मिली । उसके पिता सोने लाल पटेल ने अकेले ही बड़े-बड़े राजनीतिक सूरमाओं की हवा निकाल दी थी -अपनी जाति के मतदाताओं को एक जुट करके । तो यहाँ मीडिया ने अनुप्रिया को एक कुर्मी महिला का खिताब दिया । किसी ने भी यह नहीं लिखा कि एक सुशिक्षित युवा महिला को केंद्र सरकार मे ज़िम्मेदारी देकर भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को तरजीह दी, महिलाओं को तरजीह दी। दिल्ली के नामी लेडी श्रीराम कालेज से स्नातक और मनोविज्ञान की पढ़ाई करने के बाद प्रबंधन की डिग्री प्राप्त अनुप्रिया की ये सारी योग्यताएं एक जाति मे समाहित होकर वोट गंगा मे प्रवाहित हो गईं  ।
अजय टमटा-केंद्रीय मंत्री 
दूसरी तरफ उत्तरखंड मे एक लगभग युवा और कम पढे लिखे जाति से दलित और बिना बड़ी महत्वाकांक्षा के राजनीति मे एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे अजय टमटा की शिक्षा केवल 12वीं तक ही है ,बजाए इन सब बातों के अजय ट्म्टा मीडिया की नजर मे भाजपा के लिए दलित वोट का आधार स्तम्भ बने गए ,जबकि वह कपड़ा विभाग के राज्यमंत्री हैं, जिसकी बड़ी मंत्री एक अत्याधुनिक जीवन शैली वाली एक ऐसी महिला है जिसने टीवी और फिल्म कि दुनिया मे ही होश संभाला । यह भी कम विचित्र नहीं कि स्मृति ईरानी और अजय का तालमेल ,बन भी पाएगा या नहीं ,इससे अजय को तो तकलीफ नहीं होने वाली ,हां स्मृति ईरानी जरूर अक्सर माथे पर बल डाले दिखाई देंगी । उन्हें पहाड़ के दुर्गम इलाके का यह सीधा सादा नौजवान ,जिसने दिल्ली भी ठीक से सांसद बनने के बाद भी अभी देखी नहीं होगी ,व्यावहारिक रूप से स्मृति ईरानी के सामने या बराबर बैठने लायक खुद को बना भी पाएगा या नहीं ! यह एक सवाल अकसर सत्ता के गलियारों मे गूंजेगा ।
उत्तर प्रदेश के नए मुख्य सचिव दीपक सिंघल 
खिरी नाम है उत्तर प्रदेश के एक नामी आईएएस अधिकारी दीपक सिंघल का ,जिन्हें मुख्यमंत्री बेटे अखिलेश यादव ने पिता मुलायम सिंह और चाचा शिवपाल  सिंह यादव  के कहने पर इस ओहदे पर बैठाया । मीडिया ने इस खबर के साथ यह भी जोड़ा कि दीपक सिंघल एक "भ्रष्ट" अधिकारी हैं और टॉप टेन मे उनका नाम है । एक बनिए ,शुद्ध अग्रवाल बिरादरी के एक अफसर को तमाम जतियों और राजनीतिक समीकरणों को दर किनार करते हुये इस सबसे बड़ी कुर्सी पर बिठाया ,तो न तो किसी जाति की उपेक्षा हुयी ,न कोई वोट बैंक ढहा ,और न ही कोई वोट बैंक साधा गया ,बस एक भ्रष्ट अफसर को मुख्यमंत्री की असहमति के बाद भी सूबे का मुख्य सचिव बना दिया गया ,मीडिया की इन खबरों ने सत्ता के आगे नतमस्तक होकर न केवल अखिलेश को मसीहा बनाए रखने के साथ सवर्ण जाति के प्रति अपने एकतरफा नजरिए को ही उजागर नहीं किया,बल्कि अपना असली चेहरा दिखा दिया कि जातिवाद केवल सरकार और प्रशासन मे ही नहीं ,मीडिया मे उससे ज्यादा है । हाँ,यदि सिंघल की जगह कोई मुस्लिम या दलित या पिछड़ा वर्ग का अधिकारी होता तो यही मीडिया फौरन वोट बैंक साधता हुआ नजर आता । उसमें वोट दिखाई देते । पिछड़ा अधिकारी होता तो भाजपा की काट हो जाती और दलित होता तो मायावती पर अखिलेश का पहलवान पिता से विरासत मे मिला "राजनीति का पुट्ठी दांव" बन जाता । मगर बनिया और सवर्ण बिरदरी के अधिकारी के कच्चे और पक्के चिट्ठे और  ,बाकी सब का जनाधार मीडिया की लाइब्रेरियों मे रहते ही है ।
सहमति-असहमति के के बीच एक साथ-मुलायम,शिवपाल अखिलेश यादव !
दीपक सिंघल का बरेली से एक करीबी नाता रहा है । वह यहाँ डीएम भी रहे और कमिश्नर । एक अफसर की तरह कमरे मे बंद रहकर काम करना उन्हे पसंद नहीं है । वह शासन के प्रतिनिधि के तौर खुलकर और एक जिम्मेदार अधिकारी के तौर इस तरह काम करते हैं कि एक अफसर कम जननेता ज्यादा नजर आते हैं । उनके काम मे पारदर्शिता है । आम आदमी का दर्द है और सबसे बड़ी बात उन्हें नयी मिसाल कायम करने मे तनिक भी देर नहीं लगती । फैसले लेने मे वह एक बेहतर अधिकारी हैं । यही वजह है कि उनका तालमेल बढ़िया है ,जहा तक लोगों की बात हैं लोग तो कहेंगे ,उनका काम है कहना ! बाकी ईमान दार नेताओं और अफसरो की अगर सूची बन्ने के काम शुरू किया जाये तो एक पन्ना भी भरना मुश्किल हो जाएगा !
-आशीष अग्रवाल 

26/01/2016

नए वकीलों को मानदेय देने की तैयारी मे यू पी बार काउंसिल !


बरेली बार व्सोसियव्श्न की नयी कार्यकरिणी ,अध्यक्ष घनश्याम शर्मा,सचिव अमर भारती की टीम ने 26 जन वारी 2016 को गंतत्र दिवस के मौके पर अपना कार्यभार ग्रहण किया । 
समारोह के मुख्य अतिथि इलाहाब्द हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कालीमुल्लाह का स्वागत करते जिला जज बरेली ,श्री ए के सिंह ,साथ मे बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट घनश्याम शर्मा । 
मुख्य अतिथि जस्टिस क्लीमुल्लाह का स्वागत करते बार एसोसिएशन के सचिव एडवोकेट अमरभारती । 
जस्टिस क्लीमुलाह का स्वागत करते हुये वारिस्थ पत्रकार व एडवोकेट आशीष अग्रवाल । 






जस्टिस क्लीमुल्लाह का स्वागत करते हुये एडवोकेट ममता गोयल ,साथ मे बार एसोसिएशन के अध्यक्ष घनश्याम शर्मा । 



समारोह मे पहुंचे पूर्व सांसद वीरपाल सिंह (सपा),व प्रवीण सिंह एरन (कांग्रेस ),बीच मे पत्रकार व एडवोकेट आशीष अग्रवाल । 
जस्टिस कलीमुल्लाह से भोजन के दौरान वार्ता करते हुये पत्रकार व एडवोकेट आशीष अग्रवाल । 

जस्टिस कालीमुलाह के साथ वार्ता करते हुये वरिष्ठ एडवोकेट और बरेली के पूर्व DGC (Criminal ) राजेश सिंह यादव । 


शपथ ग्रहण समारोह मे उपस्थित बरेली का अधिवक्ता समुदाय । 











ह एक खास बात है कि बरेली बार एसोसिएशन की नयी कार्यकारिणी उसी दिन शपथ लेती है जिस दिन देश को पूर्ण गणराज्य का दर्जा मिला । इस ऐतिहासिक दिन के संयोग पर मुख्य अतिथि जस्टिस कलीमुल्लाह ने भी सराहा । 
रेली बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी ,नए अध्यक्ष घनश्याम शर्मा और सचिव अमर भारती की टीम ने 26 जनवरी को गणतन्त्र दिवस के मौके पर अधिवक्ताओं और संगठन के हित मे काम करने की शपथ ले ली । बरेली के पूर्व जिला जज और इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस कालीमुल्लाह ने बरेली बार एसोसिएशन के सभी पदाधिकारियों को एक साथ शपथ दिलाई ।
स मौके पर आए बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा सदस्य एडवोकेट बलवंत सिंह ने कई खास ऐलान किए -जिसमें नए वकीलों को शुरुआती दौर मे कुछ वर्षों तक प्रशिक्षु भत्ता देने की बात खास है । इसके अलावा उन्होने नए वकीलों के लिए आल इंडिया बार काउंसिल द्वारा लगाई जा रही एक और परीसखा पास करने की बाध्यता के खिलाफ बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती की मुहिम से सहमति प्रकट करते हुये बताया कि बार काउंसिल आफ यू पी भी इस बारे मे सहमत नहीं है और यही प्रयास है तीन साल की विधि परीसखा पास करने के बाद किसी भी युवा को दोबारा परीक्षा न देनी पड़े ,आखिर ऐसी परीक्षाओं के बाद विश्वविद्यालयों की परीक्षा का क्या महत्व रह जाएगा ?
मारोह मे सचिव अमर भारती संक्षिप्त और सारगर्भित संचालन के दौरान ही प्रखर राजनेता की भूमिका मे नजर आए ,वहीं अपनी चिर परिचित शैली मे अध्यक्ष घनश्याम शर्मा ने चंद शब्दों मे ही अपनी बात करके भविष्य के इरादे का संकेत दे दिया कि बोलने से ज्यादा करके दिखया जाए ,यह सही है बरेली के विशाल अधिवक्ता समाज को उनसे बेहद उम्मीदें हैं । तमाम वक्ताओं के भाषों मे जहां शेरो शायरी की बहुतायत रही वहीं ,पूर्व डीजीसी क्रिमिनल Rajesh Singh Yadav एक मात्र ऐसे अधिवक्ता रहे जिनका भाषण पूरी तरह बार और बेंच के बीच की व्यावहारिक दिक्कतों और कानून पर केन्द्रित रहा । समारोह मे बार के निवर्तमान अध्यक्ष विनोद कुमार श्रीवास्तव की अनुपस्थिति कुछ खली जबकि बार काउंसिल आफ यू पी के सदस्य और अधिवक्ता Shirish Mehrotra झण्डा रोहण के बाद नहीं दिखाई दिये ! वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कवि,साहित्यकार स्व राम प्रकाश गोयल की पुत्री ममता गोयल एडवोकेट भी समारोह मे पहुंची !

-आशीष अग्रवाल 

20/12/2015

वकीलों के हक मे बरेली से शुरू हुई बड़ी जंग मे पहली जीत !

प्रो वसीम बरेलवी की इस नज़्म को अमर भारती ने हकीकत मे बदल दिया है 
वरिष्ठ अधिवक्ता घनश्याम शर्मा 
"बार एसोसिएशन के मौजूदा सचिव अमर भारती की याचिका पर इलाहाबद हाईकोर्ट ने विगत दस दिसंबर को एक आदेश जारी किया है ,जिसमें उनकी दलीलों को फौरी तौर अपर अदालत ने स्वीकार करते हुये मामले की सुनवाई के लिए अब 12 जनवरी की तारीख तय कर दी है । इस मुद्दे पर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के उम्मीदद्वार एडवोकेट घनश्याम शर्मा की भी नाइत्तेफकी नहीं है । श्री शर्मा कहते हैं कि वकीलो के हितों के लिए चाहे किसी हद जाना पड़े हम पीछे नहीं हटने वाले नहीं हैं । आखिर आम आदमी को इंसाफ दिलाने के लिए जब वकील कोई कसर नहीं छोडते तो उनके खुद के लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी लड़ाई से पीछे हटने का सवाल ही नहीं । अमर भारती कहते हैं यह कहाँ की तुक है कि बार काउंसिल आफ यूपी का चुनाव पाँच साल और जिलों की एसोसिएशन का कार्यकाल एक साल का ?जिले मे अध्यक्ष 25 साल की स्टैंडिंग पर चुनाव लड़ेगा ,और मौजूदा बार काउंसिल के अध्यक्ष मात्र तीन-चार साल की प्रैक्टिस के बाद ही बन गए हैं।बस हमारी लड़ाई जिले और तहसीलों के वकीलों के हक मे है,जो उनके मान सम्मान और आर्थिक हितों के साथ उनके भविष्य के लिए भी । 
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर प्रो वसीम बरेलवी की यह नज़्म मौजूदा समय मे बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती  ने हकीकत मे चरितार्थ कर दी है । अमर भारती वकालत का पेशा विरासत मे मिला । उनके पिता श्री रवीद्र भारती एडवोकेट बरेली के एक नामी वकील रहे । उनके बेटे अमर भारती ने जब पहली बार ने सन 2000 से बरेली बार एसोसिएशन मे बतौर कनिष्ठ उपाध्यक्ष कदम रखा और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा । फिलहाल वह पिछले करीब दस सालों से बार एसोसिएशन के सचिव चुने जा रहे हैं । बार एसोसिएशन के सचिव की हैसियत अमर भारती एडवोकेट ने अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी के तहत एक बड़ी लड़ाई छेड़ दी है । यह लड़ाई सरकार से नहीं ,बल्कि अपनी ही उस संस्था से है, जो सदियों से वकीलों के लिए एक मात्र नियामक और नियंत्रक संस्था है ,यही वह संस्था है जो कानून की पढ़ाई करने के बाद वकील के रूप मे पंजीकरण करीत है और वकीलों की नकेल मे अपने हाथ मे रखती है । बार काउंसिल वकीलों के लिए एक बहुत बड़ा हौसला है मगर यह हौसला कितना खोखला है ,अमर भारती ने इसी गलत फहमी के खिलाफ जंग छेड़ दी है ।
भारतीय लोकतन्त्र का महत्वपूर्ण स्तम्भ न्यायपालिका का अभिन्न अंग कहे जाने वाले वकीलों की सबसे बड़ी नियंत्रक और नियामक संस्था बार काउंसिल आफ इंडिया के बाद राज्यों मे इसकी ज़िम्मेदारी बार काउंसिल की होती है ,जिसका गठन बाकयदा एक अधिनियम के तहत किया गया है।राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर यही संस्थाएं वकीलों के पंजीकरण से लेकर उनके हितों और अस्तित्व की रक्षा की लड़ाई लड़ती हैं । अधिवक्ता अधिनियम 1961 के बाद से आज यह पहला मौका है जब किसी वकील की तरफ से ही बार काउंसिल के किसी आदेश को चुनौती मिली है ।पहले भी बार काउंसिल ने कुछ और मुद्दों पर अपना कदम पीछे हटाया है मगर इस बार कि बरेली से मिली यह चुनौती ही देश भर के वकीलों की दशा और दिशा बदलने की दिशा मे मील का पत्थर साबित होगी । बात सिर्फ इतनी नहीं है ,बरेली की बार एसोसिएशन ने इन कुछ मुद्दों के साथ और भी सवाल उठाए हैं जिनसे यू पी बार काउंसिल को कम से कम आईना तो दिखता ही है । उन्होने इसीलिए अपनी बात काउंसिल से निराश हकार सीधे हाईकोर्ट के सामने रखी है । 
हालांकि मुद्दा केवल बरेली बार एसोसिएशन के चुनाव का था ,मगर इसी बहाने बात कुछ ऐसी बन गयी जिसने एक ऐसे मुद्दे का रूप ले लिया है जो आज नहीं तो कल राष्ट्रीय स्तर पर वकीलों की आने वाली पीढ़ी के साथ, उन सारे वकीलों के लिए बहुत बड़ी उम्मीद्द की किरण होगी जो दूसरों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ते लड़ते ,खुद से हार गए ! ऐसे मे वाकई बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती नयी पीढ़ी के वकीलों के लिए एक उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं ।
बार एसोसिएशन के चुनाव और कार्यकाल की एक जरा सी बात इतना बाद रूप लेगी इसका अंदाजा अमर भारती को  भी नहीं था ,मगर बात आगे बढ्ने पर किसी भी हालत मे पीछे न हटने का उनका संकल्प आने वाले वक्त मे बहुत बड़ा गुल खिलाने वाला है ,इसमें दो राय नहीं ।अमर भारती के मन मे बेहद गुस्सा है ,बार काउंसिल की नीतियों के खिलाफ -जो हर तरफ से जिले के वकीलों के प्रति भेदभाव और उपेक्षा और दोयम दर्जे के व्यवहार को साफ परिलक्षित करती हैं । 
"बार एसोसिएशन के मौजूदा सचिव अमर भारती की याचिका पर इलाहाबद हाईकोर्ट ने विगत दस दिसंबर को एक आदेश जारी किया है ,जिसमें उनकी दलीलों को फौरी तौर अपर अदालत ने स्वीकार करते हुये मामले की सुनवाई के लिए अब 12 जनवरी की तारीख तय कर दी है । इस मुद्दे पर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के उम्मीदद्वार एडवोकेट घनश्याम शर्मा की भी नाइत्तेफकी नहीं है । श्री शर्मा कहते हैं कि वकीलो के हितों के लिए चाहे किसी हद तक जाना पड़े। अमर भारती कहते हैं "यह कहाँ की तुक है कि बार काउंसिल आफ यूपी का चुनाव पाँच साल और जिलों की एसोसिएशन का चुनाव एक साल का ? जिले मे अध्यक्ष 25 साल की स्टैंडिंग पर चुनाव लड़ेगा ,और मौजूदा बार काउंसिल के अध्यक्ष मात्र तीन चार साल की प्रैक्टिस के बाद ही बन गए हैं । कोई छोटे से कागज पर किसी वकील के खिलाफ शिकायत बार काउंसिल को भेज दे और बस इसी पर बार काउंसिल उस वकील को किसी भी जिले मे अपनी होने वाली बैठक मे तलब कर लेती है और आखिरी क्षण मे वह बैठक रद्द हो जाती है ,ऐसे मे आर्थिक तंगी झेल रहे वकील पर क्या गुजरती होगी होगी जब उसे स्टेशन से ही वापस लौटना पड़ता है ! अजीब मज़ाक है !मान समान का तो प्रश्न ही अभी पैदा नहीं हुआ है -हम किसी के खिलाफ नहीं हैं,बस हमारी लड़ाई जिले और तहसीलों के वकीलों के हक मे है जो उनके मान समान और आर्थिक हितों के साथ उनके भविष्य के लिए भी है ।
जाना पड़े हम पीछे नहीं हटने वाले नहीं हैं । आखिर आम आदमी को इंसाफ दिलाने के लिए जब वकील कोई कसर नहीं छोडते तो उनके खुद के लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी लड़ाई से पीछे हटने का सवाल ही नहीं ।
रअसल बात अगर बार एसोसिएशन  और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के बीच होती तो तो भी ठीक था ,मगर उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने एक छोटी सी बात को हाईकोर्ट तक पहुंचा कर इसे नया मोड दे दिया । हालांकि इसकी वजह सिर्फ यही थी अपने हक मे वकीलों ने आज तक सिर्फ अपना अस्तित्व बार काउंसिल के हवाले करके अपना जीवन वाकई कानून के हवाले कर दिया और कानून ने कभी पलट कर नहीं देखा कि आखिर वकीलों की हालत क्या है ? अमर भारती का सवाल है -चार साल ही वकालत के पेशे मे आने पर बार काउंसिल का अध्यक्ष के चुनाव की हर्ता हो सकती है तो फिर प्रदेश भर की बार एसोसिएशन (जिले की ) मे यह 25 साल होना कहाँ तक न्याय संगत है ? यही नहीं 2012 मे एक ऐसा प्रस्ताव पारित कर दिया गया कि 2010 2के बाद एलएलबी की पढ़ाई करने करने वाले बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश मे एक वकील के तौर पर पंजीकृत तो हो जाएंगे मगर ,उन्हें अपने जिले की बार एसोसिएशन मे वोट देने का अधिकार भी नहीं होगा और न ही वह सीधे किसी अदालत मे प्रैक्टिस भी नहीं कर सकते ! बस इन्हीं बातों ने अमर भारती को इस कदर झकझोर दिया कि उन्होने अपने इससे पूर्व के कार्यकाल मे बरेली की बार एसोसिएशन को एक अलग सोसाइटी के रूप  मे पंजीकृत करके कम से कम बरेली के उन हजारों युवाओं का भविष्य पर छाया कुहासा छाँट दिया, जो एक वकील के रूप मे पंजीकृत होने के बाद भी उनका हौसला तोड़ देने वाला था । 
क बड़ा मुद्दा बार एसोसिएशन के चुनाव और निर्वाचित कार्यकारिणी के कार्यकाल का था । बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश का चुनाव उसकी स्थापना से पाँच साल के लिए होता है ,यही आज भी है ,मगर इसी बार काउंसिल ने जिलों की बार एसोसिएशनों के लिए यह कार्यकाल एक साल कर रखा है। तमाम वकीलों का यह एक बड़ा सवाल था एक साल के कार्यकाल मे कौन सी बार एसोसिएशन अपने वकीलों के हितों पर ध्यान दे सकती है ?आखिर यह भेदभाव पूर्ण व्यवस्था क्यों? इसी के खिलाफ उन्होने बरेली की बार एसोसिएशन को एक अलग पंजीकृत संस्था के रूप मे स्थापित करके अपणी अलग नियमावली बना ली । और जिसमे कार्यकाल दो साल कर निर्धारित कर लिया गया है । यह उनका सवाल है इस पर बार काउंसिल को आपत्ति क्यों? बार काउंसिल जिले स्तर या प्रदेश स्तर के वकीलो के हक मे कितना कुछ कर पायी है -इसके बार मे कुछ कहने के बजाए अमर भारती कहते हैं इसका जवाब प्रदेश भर के वकील ज्यादा बेहतर दे सकते हैं । अमर भारती बताते हैं कि हमने अपने फैसले की जानकारी बार काउंसिल कू पूर्ण सम्मान देते हुये बाकायदा प्रदान कि और उन्होने हमे उस पर अपनी तात्कालिक सहमति भी दी ,मगर हाल मे बरेली के जिला जज को एक सूचना भेज कर हमे चुनाव कराने से रोकने की कोशिश भी की गयी और ऊपर से तुर्रा यह कि पदाधिकारी रह चुके लोग चुनाव नहीं लड़ सकते !आखिर बार का अंदरूनी मामला बेंच को भेजने का क्या औचित्य है ? बार काउंसिल बार और वकीलों की है या बेंच की ?यह भी एक नया सवाल खड़ा कर दिया गया है । बार और बेंच रेल की पटरियाँ है ,जो जुड़ गईं तो गाड़ी नहीं चलेगी !
ह भी कम हैरत की बात नहीं है कि बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी वैसे तो पूरे प्रदेश के वकीलों के हितों के संरक्षण और संवर्धन की है ,मगर आज तक प्रदेश के वकील काउंसिल से नाउम्मीद ही हुये हैं ,और यही वजह रही कि बरसों से वकीलों के भीतर घुमड़ रही चिंगारी की तपिश को अमर भारती ने बड़ी शिद्दत के साथ महसूस किया और उसे हवा देकर एक ऐसी चिंगारी बना दिया है जो आने वाले दौर मे न केवल उत्तर प्रदेश के, वरन देश भर के वकीलों को अपने हितों को किसी और के हाथों गिरवी रखने का मौका नहीं देगी । 
रअसल हुआ यह कि बार काउंसिल आफ इंडिया ने एक फैसला लिया  कि 2010 के बाद से एलएलबी की डिग्री हासिल करने वाले एक वकील के तौर पर अपना पंजीकरण तो करा लेंगे ,मगर वकालत करने के लिए उन्हें आल इंडिया बार काउंसिल का एक इम्तिहान और पास करना होगा ।इसके साथ ही पंजीकरण शुल्क भी बढ़ा कर 12-13 हजार कर दिया गया । यही नहीं इसके पहले भी कानून की डिग्री ले चुके लोग बढ़ती उम्र मे अपना वकील के रूप मे पंजीकरण कराएं तो उन्हें भी इसका अधिक शुल्क देना पड़ेगा । यह फैसले लागू भी हो गए । यहाँ तक तो सब ठीक था ,मगर जिलों मे बार एसोसिएशन को संबद्धता प्रदान कने वाली यू पी बार काउंसिल ने खुद के लिए अलग और जिलों के लिए अलग नियम बना रखे हैं,बस यही बात एक आग के रूप मे अमर भारती को कचोट रही थ जिसके खिलाफ उन्होने बहुत धीरे से जंग का अघोषित ऐलान 2012 मे बार एसोसिएशन के सचिव चुने जाने के बाद कर दिया । जिलों की बार एसोसिएशन का कार्यकाल एक साल का चला आ रहा है ,मगर अमर भारती ने बरेली की बार एसोसिएशन को अपनी एक अलग संस्था के रूप मे पंजीकृत करा के अपना संविधान बना लिया और संबद्धता जरूर यू पी बार काउंसिल से रखी । उसके बाद उन्होने सालाना चुनाव नहीं कराये और बार एसोसिएशन का कार्यकाल दो साल का कर लिए। जिसे बड़ी संख्या मे वकीलों का समर्थन भी मिला । बार काउंसिल भी इस मुद्दे पर चुप रही । उसने कोई दखल नहीं किया । इसके ठीक विपरीत यू पी बार काउंसिल का चुनाव पहले से ही पाँच साल के लिए है । 
देश भर मे वकीलों की नियामक संस्था बार काउंसिल आफ इंडिया है । बार काउंसिल आफ इंडिया ही राज्यों मे बार काउंसिल को संबद्धता प्रदान करने के साथ कानून की पढ़ाई करके वकालत करने वालों का पंजीकरण करके उन्हेन्बाक्यड़ा विधि  व्यवसाय करने की अनुमति प्रदान करती है । यहाँ कहने मे कोई संकोच नहीं है बार काउंसिल मात्र यही एक काम करके वकीलों को शेष जीवन के लिए अपने हकों की लड़ाई लड़ने का हक एक तरह से गिरवी रख लेती है । एक वकील की तो क्या कहें देश भर मे राज्यों और जिलों की बार एसोसिएशन की आज तक हिम्मत नहीं हयी कि वह बार काउंसिल से एक वकील के हक मे कुछ आवाज़ उठाने को सुझाव भी दें ! यह भी कम हैरत की बात नहीं है कि बार काउंसिल एक वकील के खिलाफ जरा सी भी शिकायत सुनने के लिए आतुर रहती हैं और इस शिकायत के नाम पर वकीलों को यदा कदा लंबी और निरर्थक और लंबी  यात्राएं भी करनी पड़ जाती हैं । दूसरों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले और कभी कभी जनहित याचिकाओं के जरिये समूचे समाज के खुद के किसी स्वार्थ के बिना कानून से लड़ जाने वाले खुद कितने कमजोर हैं ,बस इसी दर्द के एहसास ने बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती को न केवल झकझोर दिया बल्कि हालत बदलने की पहल का रास्ता खोजने को मजबूर  भी कर दिया ,जिसके पहले पड़ाव मे उन्हें आगे का रास्ता लंबा मगर साफ दिखाई दे रहा है । 
मर भारती ने जिस तरह से धीरे धीरे कदम बढ़ाकर जो एक बड़ी जंग छेड़ी है उससे न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश के अन्य राज्यों और इलोन की बार एसोसिएशनों को भी आज नहीं तो कल अँग्रेजी सोच पर आधारित अपने उन कड़े कानूनों ओ बदलना पड़ेगा जो एक वकील के हौसले और आत्मसम्मान के लिए बहुत जरूरी है । ऐसे मे युवा पीढ़ी को इस बेहद सम्मानजनक और न्याय व्यवस्था के आधार स्तम्भ पेशे की गरिमा को बनाए रखने मे भी सहूलियत होगी ।
                                                                                                      -आशीष अग्रवाल 
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HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD 

Court No. - 39 
Case :- WRIT - C No. - 65946 of 2015 
Petitioner :- Bareilly Bar Association & Another 
Respondent :- Bar Council Of U.P. & 2 Others 
Counsel for Petitioner :- Subodh Kumar,Udit Chandra 
Counsel for Respondent :- Ashutosh Dwivedi 

Hon'ble Dilip Gupta,J. 
Hon'ble Mukhtar Ahmad,J. 
This petition seeks the quashing of the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman, Bar Council of Uttar Pradesh by which the amendments made in the bye-laws of the Bareilly Bar Association have been declared void ab initio and rejected. The petitioners have also sought the quashing of the communication dated 28 November 2015 sent by the Secretary of the Bar Council of Uttar Pradesh to the District Judge, Bareilly for implementation of the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman of the Bar Council of Uttar Pradesh. 
It is the submission of the learned counsel for the petitioners that the amendments were carried out in the Constitution of the Bareilly Bar Association in accordance with the procedure prescribed and were dully approved by the Assistant Registrar, Firms, Societies and Chit Funds, Bareilly. Learned counsel has also pointed out that in terms of the Constitution of the Bareilly Bar Association there was no necessity at all of seeking approval of the Bar Council of Uttar Pradesh before making any amendments in the Constitution. In support of his contention learned counsel has placed reliance upon a Division Bench judgment of this Court passed in Writ C-No. 42417 of 20151 . 
Learned counsel appearing for the Bar Council of Uttar Pradesh, however, has placed reliance upon the provisions of clause- 53 of the bye laws and has submitted that the Executive Committee could, from time to time, frame bye-laws but the said bye-laws framed would not be effective till they were approved by the Bar Council. It is, therefore, his contention that if any amendment is made in the bye-laws it cannot be effective until it is approved by the Bar Council. The submission, therefore, is that the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman of the Bar Council does not suffer from any illegality. 
Shri Ashutosh Dwivedi has put in appearance on behalf of respondent nos. 1 and 2. 
Learned counsel for the petitioners has, however, pointed out that the clause on which learned counsel for the respondents have placed reliance, was amended subsequently and the amended clause-53 provides that the Executive Committee may, from time to time, frame bye-laws for the purpose of carrying of the objects of regulating the activities of the Association. 
We are of the prima facie opinion that the Chairman of the Bar Council of Uttar Pradesh had no jurisdiction to annul the amendments that had been made in the Constitution of Bareilly Bar Association, particularly when the Assistant Registrar, Firms, Societies and Chit Funds, Bareilly had approved the amendments made in the bye-laws on 18 December 2014. Accordingly, the operation of the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman, Bar Council of Uttar Pradesh shall remain stayed and the implementation of the consequential communication dated 28 November 2015 sent by the Secretary of the Bar Council of Uttar Pradesh to the District Judge, Bareilly shall also remain stayed. 
Issue notice to respondent no.3 by registered post. Steps be taken within a week. 
Respondents may file their counter affidavits within two weeks. Rejoinder affidavit, if any, may be filed within a week thereafter. 
List this petition for admission/ hearing on 12 January 2016. 
Order Date :- 10.12.2015 
Fhd. 
(Dilip Gupta, J.) 
(Mukhtar Ahmad, J.) 

03/12/2015

गजब की नेतृत्व क्षमता है विपिन धूलिया में !

National Secretary IFWJ Vipin Dhuliya  
" सन 1982 मे दिल्ली से जनसत्ता शुरू होने के बाद उस के तेवरों ने बेशक पत्रकारिता को नए आयाम दिये ,मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे विपिन धूलिया पहले पत्रकार थे जिसने उससे भी आगे बढ़कर मौलिकता के साथ अखबार और खबरों के साथ पत्रकारों के हितों के मोर्चे पर एक साथ काम किया । इस सबसे अलग उन्होने कभी किसी पत्रकार के अनुचित व्यवहार या खबर को प्रश्रय नहीं दिया ।बल्कि पत्रकारों की नयी पीढ़ी को तैयार करने में उनकी हमेशा रूचि रही,जो अब IFWJ में भी  दिखाई देगी।  "

त्तर भारत के पत्रकारों मे विपिन धूलिया एक जाना पहचाना नाम है। करीब बीस साल बाद वह फिर अब चर्चा मे आए हैं, जब उन्हें हाल मे ही मथुरा मे हुये महासंघ के सम्मेलन मे  भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ (IFWJ )के राष्ट्रीय सचिव की कमान सौंपी गयी है ,इस दायित्व् के साथ उन्हें महासंघ के मुख्यालय का भी प्रभारी बनाया गया है । ट्रेड यूनियन और जनहित के मुद्दों पर उनके भीतर की खलबली को मैंने बड़े नजदीक से महसूस किया है ।अपने पेशे के साथ आम जन की हितों पर उनके भीतर की आग को उन्होने अपनी कलम की धार से न केवल आवाज़ दी बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे पत्रकारिता की दशा और दिशा को बदलने मे उनका बहुत बड़ा योगदान है । अपने साथियों के लिए वह हमेशा एक प्रेरणा स्रोत बने और सबसे आश्चर्य की बात यह कि उन्होने पत्रकारिता के पेशे मे आने की ललक रखने वाले किसी भी उम्र के उत्साही व्यक्ति को हतोत्साहित नहीं किया ।
हां बस गए वहीं रम गए ,यह उनका स्वभाव है।उन्होने अपनी पेशेगत जिम्मेदारियों को बखूबी  निभाया । शायद यही वजह रही कि बरेली अमर उजाला से सीधे राष्ट्रीय  न्यूज़ एजेंसी पीटीआई की हिन्दी सेवा ' भाषा ' जब शुरू हुयी तो पहले ही बैच मे उन्हें सीधे उपसंपादक बनाया गया। वहाँ के प्रथम संपादक और वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक की टीम के वह एक जिम्मेदार सदस्य बने और फिर पेशे मे ऐसे रमे कि ट्रेड यूनियन से जुड़े रहने के बावजूद उनकी सक्रियता पत्रकारिता मे ही ज्यादा रही ,वजह उन्हें नित नयी नयी ज़िम्मेदारी मिलती रही और इसके बाद कई टीवी चैनल लांच करने के साथ उन्हें सहारा टीवी मे भी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना पड़ा । पत्रकारिता और ट्रेड यूनियन दोनों मोर्चों पर उनकेव्यक्तित्व में आकर्षण के साथ एक बेबाकी और आक्रामकता उनकी ख़ास पहचान है।
स समय इलेक्ट्रानिक मीडिया मे कोई खबर आ जाना बहुत बड़ी बात थी , उन्होने इस क्षेत्र मे भी नया और क्रांतिकारी कदम उठाया । नीतियों मे परिवर्तन करके कस्बों और तहसीलों के पत्रकारों की बहुत बड़ी टीम बनाकर सहारा टीवी पर कस्बों और शहरों की हर छोटी-छोटी खबर को राष्ट्रीय बना दिया । उस समय ये खबरें टीवी की स्क्रीन पर नीचे एक स्ट्रिप के रूप मे चलती थी । यह एक ऐसा कदम था, जिसने इलेक्ट्रानिक मीडिया की दिशा बदल दी और इसके बाद लगभग सभी टीवी चैनलों को क्षेत्रीय पत्रकारिता की ओर रुख करना पड़ा।  जिसका नतीजा है कि आज छोटे छोटे कस्बों मे टीवी चैनलों के पत्रकार हैं । इससे भी ज्यादा  महत्वपूर्ण बात यह रही कि छोटे कस्बों के पत्रकारों को उनकी ही पहल पर आर्थिक संरक्षण मिला । प्रबंधन को मजबूरन उनकी बात माननी पड़ी । नतीजतन पेशेवर पत्रकारों की एक बहुत बड़ी टीम कहें या पीढ़ी तैयार हो गयी जो आज भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का आधार स्तम्भ है ।
विपिन धूलिया के व्यक्तित्व मे एक गज़ब का आकर्षण और एक अद्भुत नेतृत्व क्षमता है । पत्रकारिता उनकी पहली प्राथमिकता तो ट्रेड यूनियन उनका सपना -दोनों मोर्चों पर उन्होने अपने शुरुआती दौर मे साथ साथ काम किया । उन्होने कभी किसी को किसी भी तरह के पूर्वाग्रह  से नहीं देखा । पत्रकारों के हितों के लिए संघर्ष मे युवावास्था से ही आगे बढ्ने की चाह  रखने वाले विपिन धूलिया ने सन 1984 में श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की सुप्त पड़ी बरेली इकाई को सक्रिय किया और बहुत कम समय मे ही बरेली मे एक यू पी इकाई का सम्मेलन कराने के बाद बहुत जल्दी ही नैनीताल मे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ की राष्ट्रीय कार्यपरिषद का सम्मेलन अपने दम पर आयोजित करने का भी प्रण किया और उसे पूरा भी किया। यह सम्मेलन श्रमजीवी पत्रकार महासंघ के लिए इस मायने मे यादगार बना कि उस दौरान उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र (कुमायूं और गढ़वाल मण्डल -वर्तमान उत्तराखंड प्रदेश ) के सभी जनपदों मे यूनियन की सक्रियता हुयी और बहुत सारे लोग उस समय पत्रकारों के इस सबसे बड़े संगठन से जुड़े । हालांकि यह कोई सामाजिक उपलब्धि नहीं कही जाएगी मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अब उत्तराखंड राज्य के पत्रकारों के लिए वह उस समय बहुत बड़ी उम्मीद की किरण बनकर उभरे । बात पत्रकारों के वेतनमान और आर्थिक हितों की हो या उनकी सुरक्षा की,धूलिया जी ने हमेशा आगे बढ़कर पत्रकारों को हिम्मत दी और उस दौरान इस सारे इलाके मे पत्रकारों  के भीतर आत्मसमान और सुरक्षा का एक ऐसा भाव आया,जिससे पत्रकारों के बीच नया नेतृत्व उभरा । उत्तराखंड और पश्चिमी  उत्तर प्रदेश  जिलों में  इकाइयां सक्रिय हुईं। इसका नतीजा यह हुआ कि पत्रकारों के दूसरे संगठन एनयूजे और उसकी उत्तर प्रदेश इकाई की सक्रियता भी और बढ़ी ।एक स्वस्थ प्रतियोगी माहौल ने पत्रकारों  की गरिमा बढ़ाई ।
मैं धूलिया जी को तब से जनता हूँ,जब वह बरेली अमर उजाला मे  आए थे जब मैं 1984 मे अपनी एलएलबी की पढ़ाई कर रहा था और छत्र और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ा हुआ था । वह उस समय अमर उजाला मे एक रिपोर्टर थे । अक्सर अपने आंदोलनो की खबर लेकर मैं अमरउजाला के दफ्तर जाता था -साथियों के साथ ! मेरी लिखी खबर को पढ़ने के बाद उन्होने मेरा परिचय मेरे भीतर के पत्रकार से करवाया । मैं हतप्रभ था । हमारे द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों पर उन्होने  एक पत्रकार की नजर से काम किया और लोगों को इंसाफ मिला । और उनकी सतत प्रेरणा से मैंने अपना एलएलबी का परिणाम आने के बाद बजाए वकालत के , 28 अक्तूबर 1985 को अमरउजाला में एक प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में काम शुरू किया । इतना ही नहीं उन्होने ही मुझे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ से जोड़ा और जिले से लेकर राष्ट्रीय परिषद तक के लिए सदस्य चुने जाने का अवसर भी मुझे मिला । कई बार उनके साथ कई राज्यों की यात्राएं आज भी मेरे जीवन के सुखद संस्मरण हैं । हालांकि दिल्ली जाने के बाद भी मेरा उनसे सतत संपर्क बना रहा । उनके संपर्क मे मैं अकेला नहीं था ,और भी बहुतेरे पत्रकार थे जिनसे उनके संबंध सदैव मधुर बने रहे ।
मुझे याद है कुछ निहित स्वार्थी संगठनों के हितों पर चोट होने की वजह से एक बार तो पूरे बरेली मे उनके खिलाफ  एक ऐसा माहौल बना कि  दीवारों पर उनके खिलाफ नारे लिखे गए ,मगर उस दौरान सच्चाई और पेशेगत ईमानदारी के चलते अमरउजाला प्रबंधन उनके साथ खड़ा था । अमर उजाला के तत्कालीन संपादक श्री अशोक अग्रवाल और स्व. अतुल माहेश्वरी जी के निर्देशन मे एक तरफ जहा उन्होने अपनी कलम को  धार दी वहीं अखबार ने भी करवट ली । उनकी खबरें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के लिए सबक बनी ,लिहाजा इस समूचे इलाके की पत्रकारों की भाषा ही बदल गयी । सन 1982 मे दिल्ली से जनसत्ता शुरू होने के बाद उस के तेवरों ने बेशक पत्रकारिता को नए आयाम दिये ,मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे विपिन धूलिया पहले पत्रकार थे,जिसने उससे भी आगे बढ़कर मौलिकता के साथ अखबार  और खबरों के साथ पत्रकारों के हितों के मोर्चे पर एक साथ काम किया । इस सबसे अलग उन्होने कभी किसी पत्रकार के अनुचित व्यवहार या खबर को प्रश्रय नहीं दिया । बल्कि पत्रकारों की नयी पीढ़ी को तैयार करने में उनकी हमेशा रूचि रही,जो अब IFWJ में भी  दिखाई देगी।
मरउजाला के उस समय  मात्र दो ही एडिशन थे -आगरा और बरेली । यही दोनों एडिशन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आवाज़  हुआ करते थे । संचार और तकनीक के सीमित युग मे उन्होने रिपोटिंग और अखबार को नए तेवर दिए  ,इसमे दो राय नहीं। नवीनतम तकनीक अपनाने मे अमर उजाला कभी देश के नामी और बड़े कहे जाने अखबारों से पीछे नहीं रहा ,उस दौर की पत्रकारिता को लोग आज भी याद करते हैं और विपिन धूलिया भी अपने उस कार्यकाल को कभी भूल नहीं पाएंगे,बरेली उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है । बीते 25 सालों पत्रकारिता मे ही रमे  विपिन धूलिया का जीवन के इस पड़ाव मे सबसे बड़ा दूसरा सपना पूरा होने  जा रहा है ,उनका सपना था भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ के शीर्ष नेतृत्व मे शामिल होकर संगठन को नयी दिशा देना, जिससे देश भर के पत्रकारों के हितों मे कुछ सार्थक काम किया जा सके ,वह घड़ी अब आ गयी है ,और विपिन धूलिया जीवन के दूसरे दौर मे फिर एक नए मोर्चे पर तैनात हैं ! निश्चित तौर पर भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ को नए बदलाव से नयी दिशा मिलेगी और संगठन फिर से अपना गौरव शैली इतिहास लिखने की और बढ़ेगा।
-आशीष अग्रवाल 

07/11/2015

बदलेगी ड्राइविंग लाइसेन्स की प्रक्रिया !


मेरे सुझाव का परीक्षण शुरू !

अक्सर अंग्रेजों के जमाने के कानून ,और उसके बाद कांग्रेस के बनाए अपने हितों वाले आम आदमी को अमानित करने वाले कानून मुझे कचोटते हैं ,इन्हीं सब मामलों पर मैं गाहे बगाहे केंद्र व राज्य सरकारों को लिखता रहता हूँ । मैंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को ड्राइविंग लाइसेन्स की प्रक्रिया को सुविधा जनक करने के लिए सुझाव दिया था ,जिसे सिद्धांततः स्वीकार कर लिया गया है । केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय मे मेरे सुझाव पर परीक्षण चल रहा है । यह सूचना मुझे कल मिली ।
प्रधानमंत्री कार्यालय से प्राप्त और मेरे द्वारा भेजे गए सुझाव को ज्यों का त्यों नीचे दे रहा हूँ !
Registration Number :MORTH/E/2015/00746
Name Of Complainant:Asheesh K Agarwal
Date of Receipt : 02 May 2015
Received by : Ministry of Road Transport and Highways
Forwarded to : RT Wing MVL Section
Contact Address :1, Parliament Street, Transport Bhawan,
New Delhi110001
Grievance Description :


महोदय ,
ड्राइविंग लाइसेंस आज के दौर में एक बड़ी जरूरत और बड़ी समस्या है . बहुत कम शब्दों में अपनी बात कहूँगा . आधार कार्ड जब गली मोहल्लों में बन सकते हैं , टेलीफोन के सिम और बीएसएनएल के कनेक्शन सड़कों पर बेचे जा सकते हैं , लोकवाणी केन्द्रों के जरिये तमाम प्रमाण पत्र जनता को दिए जा सकते हैं और गैस कनेक्शन और सब्सिडी भी ऑनलाइन की जा सकती है तो ड्राइविंग लाइसेंस को आधार से जोड़कर पासपोर्ट की तरह उसके आवेदन आन लाइन लेकर औपचारिकताएं पूरी करने के लिए आवेदकों को निर्धारित समय पर बुलाया जा सकता है . ड्राइविंग लाइसेंस के लिए आम भारतीय नागरिक को अपमानित न करें और यह काम राज्यों से लेकर केंद्र अपने पास रखे ,क्योंकि ड्राइविंग लाइसेंस पूरे भारत का होता है। .
Current Status : CASE CLOSED
Date of Action : 05 Nov 2015
Details : Thank you for your suggestion. Your views/remarks/suggestion have been noted in the Ministry for examining the same.

स्मार्ट सिटी बरेली के लिए अपनी राय दें !



Captionless ImageBareilly, a city that is known widely as one of the most Historic Cities in India, has a new mission—to also become one of the top 20 Smart Cities in India. To accomplish this lofty goal, WE NEED YOUR HELP

First, help us identify community problems that impact your life. What are they? 

Take a moment to tell Bareilly Nagar Nigam about them.click link below-
बरेली शहर भारत सरकार स्मार्ट सिटी योजना के तहत देश के सौ शहरों मे चयनित हुआ है ,जिसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर शहर को अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त एक ऐसा स्वचालित व्यवस्था वाला शहर बनाना चाहती हैं , जिसमें नागरिक सुविधाएं विश्वस्तरीय होंगी ,जैसा कि स्मार्ट सिटी योजना के आशय पत्र मे है ।

आप बरेली के मूल निवासी हैं , बरेली मे रहते हैं या नहीं ,देश मे कहीं भी रहते हैं या विदेश मे रहते हैं ,तो आपकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है ,जल्दी से जल्दी इस फार्म को भरकर अपनी आय स्मार्ट सिटी योजना के शिल्पकारों को दें जिससे वह आपकी बात समझ सकें

आपके जीवन को प्रभावित करने वाली बुनियादी सेवाओं में प्राथमिकता बताइए और समस्याओं की पहचान में मदद करें। वे क्या हैं? उनके बारे में बरेली नगर निगम को बताने के लिए कुछ समय निकालें।
बरेली, भारत के ऐतिहासिक शहरों में से एक है, और इसका चयन भारत के “१०० स्मार्ट सिटीज चैलेंज” में हुआ है.बरेली शहर को भारत के शीर्ष 20 स्मार्ट शहरों में से एक बनाने के लिए हमे आपकी मदद की जरूरत है।आपके जीवन को प्रभावित करने वाली बुनियादी सेवाओं में प्राथमिकता बताइए और समस्याओं की पहचान में मदद करें। वे क्या हैं? उनके बारे में नगर निगम को बताने के लिए कुछ समय निकालें।
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06/10/2015

बहुत मुश्किल है वीरेन डंगवाल होना !

जन्म:5अगस्त1947-निधन28 सितम्बर 2015
वीरेन डंगवाल ! बस नाम ही काफी है। जिसने सुना हो या मिला हो उसके दिल दिमाग में उनकी एक अलग ही छवि बन जाती थी ,जिसकी शायद किसी से तुलना बहत मुश्किल से हो पाती थी। आज भी कोई उनके जैसा व्यक्तित्व कोई दूसरा नहीं खोजा जा सकता। ऐसा नहीं है कि उनके व्यक्तित्व में सब अच्छाईयां ही भरी थी ,वह भी इंसान थे ,सबके जैसे ,बेहद खिलंदड़ ! अल्हड ! और हंसोड़ ,और भी न जाने क्या क्या। बयान करने से पहले सोचना भी मुश्किल है। उनका व्यक्तित्व में बहुत कुछ प्राकृतिक था ! उन्होंने किसी को अपना आदर्श नहीं माना। वह खुद के गढ़े सिद्धांतों पर चलते थे, डिगते थे ,मगर बहुत परखने के बाद।
वि साहित्यकार ,पत्रकार संपादक जैसे भारी भरकम व्यक्तित्व भले उनकी पहचान बने ,मगर जब भी कोई उनसे मिला ,तो वह उनमे यह सब खोजता रहा। उनसे जब भी मिला, तो लगा कोई दोस्त है ! आओ-आओ दोस्त ! यह उनका एक तकिया कलाम था ,सबसे मिलने का ! वह एक जादुई शख्सियत लेकर इस दुनिया मे आए थे । मिलने जुलने और यारी दोस्ती के अंदाज़ उनसे सीखने वाले थे । लोग उनके कृतित्व के उतने कायल नहीं थे जीतने  उनके व्यवहार और सोच के -उससे भी ज्यादा एक अल्हड़ अंदाज़ के । वह किसी पर अपनी मर्जी थोपते नहीं थे । यहाँ तक की पत्नी पर भी नहीं । रीता भाभी से उन्होने यह कभी नहीं कहा कि इनके लिए चाय बना दो -हाँ ये कहा कि यह कह रहे कि कि चाय जरूर पीएगे ,बताओ अब क्या करूँ ! उनके इस अंदाज़ से भाभी  तो पूरी तरह वाकिफ थी, इसलिए उन्हें हंसी कम ही आती थी ।
ब भी मिले, जिससे भी मिले ,गर्मजोशी से। ऐसा कभी लगा ही नहीं कि कभी अपनी किसी परेशानी या उलझन या किसी और व्यस्तता में भी कभी उलझे हो। इसका मतलब यह भी नहीं की उन्होंने गृहस्थी को तवज्जो नहीं दी ! जितनी आत्मीयता से वह से युवा पत्रकारों को "बेटे" कह कर का सम्बोधित करते थे ,उतनी ही आत्मीयता अपने बेटों से सम्बोधन में दिखाई देती थी। सामाजिक औपचारिकता ,रीतिरिवाज ,परम्पराएँ और कुछ भी करने या न करने की मजबूरी का उनके जीवन में कोई स्थान नहीं था। अपनी मर्जी के मालिक थे वह। कई बार उनकी सोच सिखाती थी कि खुद का चरण कैसा हो ,मगर इसके पहले खुद को उस स्थान पर रखना बहुत मुश्किल काम था। बहुत सारी  सामाजिक परम्पराओं ,रीति रिवाजों ,अभ्यागत सत्कारों को वह बेवजह का मानते थे ,और उसी तरह खुद को अनौपचारिक रखते हुए ,कोशिश करते थे कि सामने वाला उपेक्षित महसूस न करे। जितना संकोच और सम्मान वह दूसरों का करते थे ,घर में हालत उससे भिन्न नहीं रखते थे। रीता भाभी को उन्होंने जब भी कुछ बोला तो आग्रह पूर्वक। आदेश नहीं ,अधिकार से नहीं।
हाड़ के लोगों के बीच वीरेन दा ,बरेली में डंगवाल जी थे। उनका व्यक्तित्व कभी किसी भौगोलिक सीमा मे नहीं बंधा,इसकी इजाजत उन्होंने कभी नहीं दी ,मगर फिर भी उनको बांधे रखने की बहुतेरी कोशिशें हुईं ,वह बंधे नहीं ,मगर यह भी नहीं कह सकते कि वह ऐसे बंधन से पूरी तरह अपने मन के मुताबिक मुक्त भी हो सके। वीरेंन डगवाल के भीतर बहुत सारे व्यक्तित्व एक साथ जीते थे ।बाहर भी आते थे ,सटीक समय पर ।तब यकयक आश्चर्य होता था एक आदमी पल भर मे इतना कैसे बदल और घुलमिल सकता है ।यहाँ तक कि कभी कभी बच्चों जैसे लगते थे । बातों से भी और शरारतों से भी ।
न्हें बहुत बड़ा साबित करने और आँकने के लिए अक्सर बड़े बड़े नाम लिए जाते हैं ,मगर मैं नहीं समझता उन्होने अपनी तुलना किसी से करने को कभी पसंद किया हो ।बरेली कालेज मे प्रोफेसर रहते हुये रोजाना शाम को वह अमरउजाला आते थे ,बरसों उनके पास अपना विजय सुपर स्कूटर था ,मगर यह क्या जब उनके बेटे साइकिल चलाने लायक हुये तो अक्सर बच्चों की साइकिल से ही अमरउजाला आ जाते थे । रास्ते मे कई बार मिले ,मुसकुराते हुये ,अपनी बचकानी आदतों पर । कहते थे थोड़ी वर्जिश भी होनी चाहिए । मगर यह एक बहाना ही था ,वह जिंदगी को खुलकर जीते थे ,कभी अपना व्यकतित्व खुद पर हावी नहीं होने दिया ,ऐसे इंसान को कोई कैसे किसी बंधन या परम्पराओं मे जकड़ सकता है ?
एलएलबी करते हुये बरेली कालेज के छात्र आंदोलन मे अपनी सक्रियता के चलते मेरा कई बार अखबार से साबका पड़ा,खबर देने भी जाना पड़ता था। इसी दौरान मेरी मुलाक़ात ड़गवाल जी से हुयी । एक बार मेरा छात्रों से संबन्धित एक समाचार उन्होने देखा और बोले किसने लिखा है ये ?मैंने कहा मैंने ही लिखा है ।बोले यार तुम तो पत्रकारों की तरह खबरें लिखते हो।तो और लिखो। जैसे मेरे भीतर के सोये बागी आदमी और एक पत्रकार को उन्होने उसी क्षण झकझोर के जागा दिया ! मेरे घर के आसपास बरसों से शीरे का कारोबार होता था ,और यह शीरा खुली नांदों में पकाया जाता था। एक तो शीरे की गैस और ऊपर से भट्टियों की आग ,बेचारे पसीना बहाते मजदूरों का दर्द किसी तरह से प्रशासन की निगाह में लाने का मेरा मन था। मैंने जो भी लिख सकता था ,लिखा और एक दिन जाकर डंगवाल जी को उनके घर दे आया। यह क्या अगले ही रविवार को देखा तो एक बड़ी सी स्टोरी अमरउजाला में छपी हुयी थी। नीचे मेरा नाम। मैं अवाक था। इसके बाद जब-जब मैं उनसे कृतज्ञ भाव से मिला, तो उन्होंने इतना मौक़ा ही नहीं दिया और थोड़ा हिदायत देते हुए बोले तुम अच्छा कर सकते हो।
कालेज की प्रोफ़ेसरी का रुआब उन्होंने कभी अपने छात्रों पर नहीं दिखाया। अमरउजाला बरेली में एक अलग मुकाम शुरू से हासिल होने के बावजूद नए पत्रकारों को भले ही उनसे मिलने में संकोच हो,मगर उनके इस संकोच को भांपकर वह खुद ही आगे बढ़कर ऐसे मिल लेते थे कि संकोच काफूर ! और अगला यह सोचता रह जाता था कि आखिर यह हुआ क्या।
साहित्य और पत्रकारिता मे शुरू से ही एक बड़ा नाम बन गए ।अपने व्यवहार और सोच ने उन्हें उससे भी बड़ा बना दिया । यही वजह थी कि अखबार मे कोई पद उनके लिए बेमानी था । उन्हें अमरउजाला के दफ्तर मे बैठने के लिए कोई दफ्तर नुमा कमरा सजा धजा आफिस , ऊंची कुर्सी और वह सारे तामझाम नहीं चाहिए होते थे जो बड़े बड़े नाम पहले मांगते रहे हैं । हालांकि उनका एक कमरा था । बढ़िया कुर्सी मेज और एक सहायक के साथ जब तक वह दफ्तर मे रहें तब तक के लिए एक चपरासी भी उनकी सेवा मे रहता था ,मगर उनके लिए इस सबका कोई अर्थ कभी रहा ही नहीं । अक्सर वह अखबारों के ढेर पर ,रद्दी के बीच मे ,तो कभी जमीन पर बेतरतीब पड़े अखबारों के ढेर पर पर बैठे और कुछ पढ़ते हुये मिलते थे । कभी कभी तो उन्हें खोजना पड़ता था कि आखिर बैठे कहाँ हैं ।
न 1985 की अक्तूबर मे अमरउजाला मे विधिवत काम शुरू करने के बाद से मेरा सबसे ज्यादा सबका उनसे पड़ता था । वह मुझे हमेशा प्रोत्साहित करते थे । मेरी बहुत सारी खबरें /स्टोरी ऐसी रही जिनका रुख ही उन्होने बदल दिया । अक्सर वह मेरे उठाए विषयों को पसंद करते थे । यही वजह रही कि वह मुझसे पूछ भी लेते थे कि "विस्फोट कर रहे हो प्यारे" ! मेरे लिए यह काफी था । मेरे हम उम्र कुछ साथीओयन को मेरा उनसे और उनका मुझसे इस बेबाकी से मिलना पसंद नहीं आता था । बीच मे बहुत लंबे अरसे तक उनसे संपर्क नहीं हुआ ,जब उनका आपरेशन हुआ और बरेली आए तो उनसे मिलना हुआ । सर्दी के मौसम मे दरी बिछाए तख्त पर ऐसे बैठे थे मानो उन्हें कोई बीमार न समझ ले । मुहावरों चुटकुलों मे बातों को ऐसा मोड दे दिया करते थे कि हंसी न रुके और पल भर किसी बात  को लेकर इतना गुस्सा  कि खुद का चेहरा लाल हो जाया करता था । मुद्दे उन्हें छेड़ दिया करते थे ।अपनी उनकी जो सोच रही सो रही ,मगर बाद मे उसी सोच मे बांधे रखने के लिए बहुतेरे लोगों ने उनपर आखिर तक अपना एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश की -तमाम तरीके से ! जिससे वह आखिर तक निकाल नहीं पाये ।
उनकी एक कविता के कुछ अंश
कहाँ की होती है वह मिटटी,जो हर रोज़ साफ़ करने के बावजूद,तुम्हारे बूटों के तलवों में चिपक जाती है ?कौन होते हैं वे लोग, जो जब मरते हैं ,तो उस वक्त भी नफ़रत से आँख उठाकर तुम्हें देखते हैं ?आँखें मून्दने से पहले, याद करो रामसिंह और चलो ।
वीरेन डंगवाल को पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक कर सकते हैं - आँखें मूँदने से पहले याद करो रामसिंह और चलो... / वीरेन डंगवाल
  -आशीष अग्रवाल 

14/07/2015

When flames came out from pyre itself,a divine experince !!!

(The soul is never born nor does it die ; nor does it exist on coming into being.For it is born ,eternal,everlasting,and primeval ; even though the body is slain,the soul is not.) Sri Madbhagvad Geeta,2/20) 
In our holy books, we can find inscribed in golden words, the incarnation of supernatural spirits who have divine presence, and unmatched capabilities. In fact, it is not usual to hear about incident that demonstrates the presence of the sacred powers of the almighty. We realize some supernatural power or event from time to time that can’t be explained. 
One such realization occurred recently in a cremation ceremony, when fire ignited itself from the pyre. I still cannot forget that view that I thought at first was a delusion, but it was NOT. Everyone present in the cremation ceremony of much respected Maa Ji (Usha Agarwal) wife of Guru Ji Shree S.K Agarwal had that view with astonishment. On July 1, after being suffered from almost two and half years of illness, Maa Ji left this world leaving behind her full family and countless followers including three progenies. For over half a century, Guru Ji had established a sacred environment, where he kept on praying and practicing good deeds. 
Though Maa Ji was suffering from a kidney ailment for past two and half years, she never expressed her pain or suffering to anyone. Rather she always kept on praying “Sita Ram” in her heart. I still remember an incidence when I visited her after discharged from hospital around an year ago, and found her hand swollen. I asked, “Are you feeling better now, and what about the swelling?” She kept on a calm disposition and said, “I don’t know” and quietly gazed at the picture of Lord Rama in front of her bed. I was constantly trying to read her expression, and all I could figure out was that she had some silent complaint to her God. She had her 67th birthday on June 13, 2015. Her birthday wish was to listen to the "Sundar Kand", Ramayana which was fulfilled in a holy manner. It seemed like this cheerful form of her was only on this day, seeing this no one could even say that she was on complete bed rest for almost Two and half years and was admitted in hospital when she was in serious condition. An immense glow on her face, the peace in her heart, the continuous meditation and chanting of her God was clearly visible on her face. 
She left for heavenly abode on July 1st, 2015. On July 1 at around 4 PM, on the cremation ground in Bareilly city, her pyre was set and before it was being touched with slight fire, the fire and smoke busted out of the pyre all of sudden. I was shocked to see this view as I watched it. Her was the only cremation in the whole cremation ground on that day, which has generally 5- 6 funerals at the minimum every day. July being the rainy season in North India, special care needs to be taken of wood logs as these get moist. Pyres don’t get ignited easily because of moist wood. 
I saw that the flames came out from the inside of the pyre. Igniting the pyre from the outside just seemed like a formality only. The outside flames were not enough to burn the pyre, but it seemed like the inside flames were waiting for the ritual of outside fire to be ignited. This astonishing view kept on hovering in my mind like a big question mark till the next day. Next day I went to Guru Ji’s place, as I was about to ask him regarding the same, others were inquiring about the same. It was for the very first time I witnessed such a view that the flames coming out from the inside of the pyre meaning to show that fire is taking her body in its lap like a mother does of a child. Adequate wind was not there in such a humid climate, and it is generally thought that it would be difficult to flame the pyre, but Maa ji’s pyre didn’t require any effort at all. 
The most interesting thing about this fire on pyre was that the temperature was negligible. Generally it is difficult to stand inside a 5 meter perimeter of a burning pyre, but everybody was standing under the small tin shed over the pyre as no one could feel the temperature raised by fire. Many respectable People belonging to all sectors including well known BJP leaders, lawyers, leading journalists, doctors, businessmen, administration and many others were present paying their last homage to Maa Ji.
Recently, we had a conversation with a saint in Jalandhar over the phone on why God’s devotees suffer. He mentioned that God sometimes puts His true followers’ body in pain, so that their focus and expectation from this world are diminished, and they concentrate only on the almighty. World also doesn’t expect anything from such people and don’t disturb them. This was the case with Maa Ji herself, that’s why she was remembering “Sita Ram” even when she was not conscious, and this glorified the last journey of her body and spirit beyond this world. Her relic is the proof of this. 
On July 8, when her son, Jiten Agarwal, a resident of United States of America went to holy Ganges for rendering her ashes, the water created a spout immediately and took it all inside it. It is said that the body is made up of five elements, is at last, mixed in these five elements in which earth, fire, sky and wind elements are merged after the cremation ceremony followed by merging into the fifth element, the water. The Lord of fire gave his contribution in taking the body to the universe, and then it becomes the duty of the Lord of water to take the relic to appropriate place.
S K Agarwal 'guruji'
Guruji Dr. S K Agarwal tells us that the saints aspire to sacrifice their bodies on a full moon (Pooranmasi) of Purushuttam (Purush Uttam – Lord Vishnu’s month) month which comes only once in three years. Saints worship their Gods for years and years to leave their human body on this day as it is said that heaven doors are open by Lord Vishnu on this day. And God chose the very same day for MaaJi as her last day. There was so much of peace and glow on her face in her last moments that it appeared that she made herself one with the God. She had her 67th birthday on June 13th, 2015 and her last ritual was finished exactly on July 13th, 2015, both in Purushottam month considered to be as holy, as it could be .you can reach the Guruji by: 
https://www.facebook.com/gurujibly?fref=ts 
                                                                                                                                                                Aashish Kumar Agarwal
(English translation by  Meetika Agarwal with Saugaat Kamily,software Engineer with MNC Accenture,based in pune.)

05/07/2015

जब चिता मे अग्नि भीतर से प्रकट होने लगी !

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायनम भूतवा भविता वा न भूय: ।
अजो नित्यं शाश्वतोये न पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे  ॥   
यह आत्मा कभी जन्म नहीं लेता और न यह कभी मरता ही है । इस आत्मा का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता । यह अजन्मा ,नित्य और पुरातन है । शरीर के मर जाने पर भी यह नहीं मरता ।                                                     श्रीमद्भागवद गीता -2/20

दिव्य आत्माओं के इस संसार मे शरीर धारण करने से लेकर शरीर त्यागने तक के कई किस्से हमारे धर्मशास्त्रों मे दर्ज हैं, जिन पर हम धार्मिक आस्था के तहत यकींन करते हैं। हालांकि सनातन धर्म मे ईश्वर की अनुभूति और उसकी लीला और चमत्कारों और कृपा के तमाम किस्से धर्म भीरु लोगों के अनुभव मे आते रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है । पल-पल पर हम लोग अखिल जगत के नियंता की शक्ति का एहसास करते हैं । और ठीक ऐसा ही एहसास अभी हाल मे हुआ । किसी अंतिम संस्कार के दौरान चिता मे स्वयं अग्नि प्रज्ज्वलित होने का वह दृश्य आज भी आँखों  के आगे से नहीं जाता है । मैं सोच रहा था यह अनुभूति मेरा भ्रम है या यथार्थ ! मगर वह सच था । पूज्य गुरु देव डा एस के अग्रवाल "गुरु जी "की अर्धांगिनी श्रीमति ऊषा जी के अंतिम संस्कार के समय मौजूद तमाम लोगों ने उस दृश्य को विस्मय के साथ देखा ।
बीती एक जुलाई को करीब ढाई वर्ष की लंबी बीमारी के बाद अपनी तीन जैविक संतानों और अनंत परिवार की "माँ जी " इस संसार से चली गईं । एक दिन पूर्व  उन्हें फिर कुछ तकलीफ महसूस हुयी ,तब उन्हें आक्सीजन देनी पड़ी ,मगर आक्सीजन देने के बाद जब उनकी तन्द्रा लौटी तो उनकी देखभाल के लिए चौबीस घंटे उनके पास रहने वाली नर्से से  उन्होंने अपनी जप माला ऐसे मांगी, जैसे बेहोशी की हालत में कोई बड़ा जरूरी कार्य नहीं कर पायीं हो,और अब उसकी याद आई है । अगले दिन उन्हें और तबीयत बिगड़ने पर सुबह अस्पताल ले जाने  के लिए उनके गली मिर्धान स्थित निवास से एम्बुलेंस में ले जाया गया ,मगर तब तक वह शरीर त्याग चुकी थी। आधी सदी से ज्यादा से निरंतर चल रहे पूजन  भजन व् अन्य धार्मिक क्रियाकलापों के लते वजह गुरूजी का यह निवास एक तपोभूमि जैसा सिद्ध स्थल बन चुका है शायद यही वजह रही की काल उन्हें उनकी चौखट से बाहर लाने का अवसर तलाश रहा था।  
पिछले  ढाई साल से वह मां जी किडनी की समस्या से पीड़ित थीं ,मगर बड़े से बड़े कष्ट मे  उनके हृदय से कभी आह तो नहीं निकली, मगर "सीता राम "का जाप निरंतर उनकी हर सांस मे रहता था । एक बार बीमारी के दौरान काफी दिन अस्पताल मे रहने के बाद जब मैं उनके दर्शन को गया तो  इनके हाथों मे सूजन देखकर सहसा पूछ लिया अब तो आपको आराम है, तो फिर सूजन क्या दोबारा आई है -बड़े शांत भाव से उनका उत्तर था "हमे क्या मालूम , क्या है ! और उनकी निगाह सीधे उनके सामने बने मंदिर मे श्री राम दरबार की ओर चली गयी । वह शांत थीं । मैं भी शांत भाव से उनके चेहरे के उस संवाद भाव को पढ़ने की कोशिश कर रहा था- मानो अपने आराध्य से कोई शिकवा सा कर रही हों ! यह बात करीब एक वर्ष पूर्व की है।
बीती तेरह जून को उनका 67वां जन्म दिन था । उनकी  इच्छा अपने इस जनम दिन पर सुंदर कांड का सस्वर पाठ सुनने की थी ,जिसे भव्य- दिव्य तरीके से सम्पन्न किया गया । इस आलेख मे लगा माँ जी का यह चित्र इसी तेरह जून का का है ,जिसे देखकर कोई यह कह ही नहीं सकता वह ढाई साल से पूरी  तरह बिस्तर पर थीं और जबकि कई बार उन्हें हालत गंभीर होने पर अस्पताल मे भी भर्ती करना पड़ा , चेहरे पर एक दिव्य तेज, उनके भीतर की शांति, उनके हृदय मंदिर मे विराजमान अपने आराध्य के निरंतर चिंतन और नाम जप को स्पष्ट बोध कराती थी । 
क जुलाई को करीब चार बजे बरेली की सिटी श्मशान भूमि पर माँ जी की चिता सजाई गयी और मुखाग्नि देने की रस्म अभी पूरी भी नहीं हुयी थी कि चिता स्वयम धू-धू कर  जलने लगी ! मैं उस समय इस दृश्य को अकेले ही आश्चर्य के साथ देख रहा था ,मगर किसी और के साथ बाटने की सुध ही नहीं हुयी ,इसलिए कि शायद ये मेरा भ्रम हो ! मगर वह मेरा भ्रम नहीं था। बरसात के साथ मौसम मे अक्सर लकड़ियाँ नमी पकड़ ही लेती है और इसी लिहाज से चिता को अग्नि पकड़ने मे देर न हो, इसका भी इंतजाम किया गया था ,मगर वह सारे इंतजाम धरे रहे गए ।
मैंने देखा- "आग चिता के भीतर से निकल रही है ! बाहर से अग्नि देने कि तो महज एक रस्म ही अदा हुयी । बाह्य अग्नि इतनी पर्याप्त नहीं होती कि उससे एक विशाल चिता कुछ ही क्षण मे आग की लपटों से घिर जाये ,मानो चिता को बस अग्नि देने की रस्म का इंतजार सा हो "! यह दृश्य अगले दिन तक मन मस्तिष्क को बेचैन किया रहा । अगले दिन जब मैं पूज्य गुरुदेव के निवास पर गया और अपने मन की  बेचैनी को उनसे कहने ही वाला था कि वहाँ बैठे अन्य लोग भी उनसे इस प्रसंग की  ही चर्चा कर रहे थे । और इस तरह मेरे भी मन की बेचैनी को भी शब्द मिल गए। मेरे जीवन का यह पहला अनुभव था, जब मैंने  अपनी आखो से देखा कि "चिता मे भीतर से अग्नि ने मृत देह को अपने आगोश मे लिया "। मौसम की उमस वाली गर्मी मे हवा चलने की तो कोई उम्मीद वैसे भी नहीं थी और ये चिंता स्वाभिक रूप से थी कि कैसे अंतिम क्रिया की रस्म पूरी हो पाएगी ,मगर उस चिता को किसी बाह्य सामिग्री और संसाधनों की जरूरत नहीं थी । और एक सबसे खास बात यह भी थी इस चिता की अग्नि मे ताप न के बराबर था ,आमतौर पर चिता से पाँच मीटर दूर पर खड़े होना असंभव सा होता है ,मगर यहाँ चिता के सामने के टीन शेड मे सब ऐसे खड़े और बैठे थे जैसे अग्नि कि तपन का उनको एहसास ही न हो ।नगर विधायक अरुण कुमार समेत भाजपा के तमाम वरिष्ठ नेताओं समेत शहर के सभी वर्गों तमाम गणमान्य लोग ,स्वाभाविक  रूप से मौजूद थे।  
भी हाल मे जालंधर के एक संत से फोन पर बात हो रही थी । सामान्य चर्चा के दौरान  बात आई, तो उनका यही कहना था ईश्वर के अनन्य भक्तों को कई बार व्यक्ति की एकाग्रता के लिए ईश्वर संसार से उनका ध्यान और उनसे अपेक्षाएं हटाने के लिए, उन्हें अपनी ओर एकाग्र रखने मे शरीर को ही कष्ट मे ले आते हैं । तब न तो संसार ऐसे लोगों से कोई उम्मीद करता है और वह भी अपनी पीड़ा मे प्रभु का स्मरण पूरी तल्लीनता के साथ करते हैं । और यही संयोग माँ जी के साथ था ,जो अर्द्ध बेहोशी की अवस्था मे भी "सीताराम" के जप से खुद को तपा रही थीं और वही ताप उनकी अंतिम यात्रा का ईंधन बन कर उनके शरीर समेत ब्रह्मांड मे ले गया ! उनके अवशेष इसका प्रमाण बने !
ठ जुलाई को उनके अमेरिका वासी पुत्र श्री जितेंद्र अग्रवाल गढ़मुक्तेश्वर मे जब यह अवशेष गंगा की बीच धारा मे जल प्रवाह कर रहे थे तब फिर एक बार फिर जल धारा मे प्रवाहित करते ही यकायक भय देने वाला भंवर अस्थियों को आपने आगोश मे समेटकर दूसरे ही क्षण गंगा की सतत जलधार मे परिवर्तित होकर लुप्त हो गया, मानो स्थूल शरीर के पाँच तत्वों मे से विलय होने मे बाकी रह गए जल को इन अवशेषों को स्वयम मे विलय करने की प्रतीक्षा का अंत करना हो । सर्वविदित है की पंचतत्वों से बना शरीर अंत मे पाँच तत्वों मे ही मिल जाता है ,जिसमें पृथ्वी,अग्नि, आकाश और वायु मे स्थूल शरीर का विलय अंतिम संस्कार के बाद जल मे अवशेष विसर्जन की ही प्रक्रिया बाकी रहती है । और ताप विहीन अग्निदेव के प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होने के बाद स्थूल देह को ब्रह्मांड मे ले जाने की बाद जल देव की ही ज़िम्मेदारी थी की उनके अवशेषों को वह यथास्थान ले जाएँ ।
एस के अग्रवाल 'गुरुजी' 
गुरुदेव बताते हैं कि बड़े बड़े संत ऋषि-मनीषी अपना शरीर त्यागने के लिए प्रत्येक तीन वर्ष मे एक बार आने वाले पुरुषोत्तम मास (अधिक मास ) की पूर्णिमा के दिन ही उनका संसार मे अंतिम दिन हो, इसके लिए बरसों-बरस अपने आराध्य से विनय करते हैं ,जबकि इनके (माँ जी ) के लिए तो प्रभु ने वही दिन चुना और इस दिन प्राणी सीधे प्रभु के धाम मे पहुँच कर संसार सागर के आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाते हैं । एक जुलाई से 13 जुलाई तक के माँ जी के अंतिम संस्कार से लेकर तेरहवीं तक के समस्त संस्कारों मे कहीं भी शोक या विलाप नहीं था ।यह तेरह दिन का एक मृत्यु पर्व था जिसमें सभी जरूरी रस्मों के साथ मानव के मृत्युलोक से विदाई को एक भव्य दिव्य रूप प्रदान किया गया और समस्त संस्कारों मे हरीनाम संकीर्तन की अविरल धारा आत्मा को उसके लोक तक पहुंचाने का कुछ ऐसी संवाहक बनी कि शोक के बजाए पल पल और पग पग पर श्रद्धा और आत्मान्द की अनुभूति सभी उपस्थित लोग कुछ इस तरह कर रहे थे मानो मृत्यु पर शोक या विलाप की अब तक की परंपरा शास्त्र सम्मत भी है,यह एक ऐसा प्रश्न  हो गया है ,जिसका उत्तर समाज को आज नहीं तो कल खोजना पड़ेगा। आखिर जन्म और मृत्यु पूरी तरह उस दैवीय शक्ति के नियंत्रण मे है ,एक पर हर्ष और एक पर विलाप एक अजीब विरोधाभास है ,शोक-विलाप शरीर छूट जाने के बाद आत्माओं को ईश्वर मे विलय मे बहुत बड़ी बाधा ही है । गुरुजी से संपर्क करने के लिए उनके फेसबुक पेज के जरिये उन तक पहुंचा जा सकता है -https://www.facebook.com/gurujibly?fref=ts
-आशीष अग्रवाल
English version -http://jhumkabareillyka.blogspot.in/2015/07/when-flames-came-out-from-pyre-itself.html

28/03/2015

मेरे जीवन की "अटल स्मृतियाँ,संतोष गंगवार के साथ !


बांये से-भाजपा नेता सतीश रोहतगी,मैं ,पूव प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ,पूर्व सांसद राजवीर सिंह, व पूर्व मंत्री बहोरनलाल मौर्य 
ज पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी जी वाजपेयी को भारत रत्न दिये जाने की घोषणा से देश के इस सबसे बड़े पुरस्कार को भी सम्मान मिला है। एक सामान्य  नागरिक और पेशे से पत्रकार होने के नाते मुझे भी इस बात की ख़ुशी है कि  इतने महान व्यक्तित्व और अब "भारतरत्न  सम्मान" से विभूषित भारत  माँ के इस लाल के साथ मुझे भी कुछ क्षण बिताने का और सार्वजानिक समारोह में मंच तक पर रहने का मुझे भी अवसर मिला,तीन बार।
क बार तब मेरे घनिष्ठ मित्र और अग्रज , मौजूदा केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार की शुभेच्छाओं से। तब भी मैं अमरउजाला में था और मुझ पर प्रादेशिक डेस्क की जिम्मेदारी थी। दूसरी  बार तब जब मैं अपने विवाह के बाद हिमाचल की यात्रा पर गया और वहाँ मेरे परिचित तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री राधा रमण शास्त्री जी ने मुझे राज्य अतिथि का दर्जा दिलवा दिया और  मुझे कुल्लू ,मनाली के सर्किट हाउस में रहने का अवसर मिला। मनाली के सर्किट हाउस में मेरे बगल के कमरे में श्री अटल जी अपने प्रवास पर थे। अगली सुबह मैंने देखा सर्किट हाउस के बरामदे में हरे नीले चेक का तहमद और बनियान पहने अटल जी अखबार पढ़ रहे थे। नमस्कार/प्रणाम के बाद उस दिन उन्होंने सुबह का नाश्ता मुझे अपने साथ करने का अवसर दिया।
वैसे तो अखबार के रिपोर्टर के तौर पर कई  बार अटल जी के साथ होने का अवसर मिला। मैंने पत्रकारिता के जीवन में पहली महत्वपूर्ण खबर भी अटल जी की वह खबर लिखी ,जब वह पौड़ी में भाजपा के गठन के बाद पहली बार भाजपा की विचारधारा पर बोले थे -उस खबर का शीर्षक था "भाजपा गांधीवादी-समाजवाद पर ही चलेगी"।  नवम्बर १९८५ में। अमरउजाला की नौकरी शुरू किये मुझे कुछ ही दिन हुए थे। तब संपादक स्व. अतुल महेश्वारी जी ने मुझे बाहर से आने वाली ख़बरों को फिर से लिखने और अच्छी प्रस्तुति का  काम दिया था। उसी में अटल जी की वह खबर भी थी, जो भाजपा के गठन के बाद पहली बार आई थी।योगेश धस्माना ने पौड़ी से अटल जी का वह इंटरव्यू भेजा था। अमरउजाला के बरेली और आगरा अंक में तब छपी यह खबर बहुत चर्चित हुयी थी ,क्योंकि जनसंघ से अलग होने बाद भाजपा का क्या स्वरुप होगा, यह एक बड़ा सवाल था। बड़ी खबर में से यह मुद्दे की बात निकाल कर उभार देने के लिए मुझे तब अतुल जी ने शाबासी भी दी। तब मैंने अटल जी को जाना।
टल जी से मिलने  का पहला मौक़ा तब मिला जब लोकसभा में पहली बार भाजपा के सांसदों की संख्या दो से अचानक 85 हो गयी और चार राज्यों में भाजपा की सरकार भी बन गयी। तब भाजपा ने अपने सांसदों और विधायकों का एक प्रशिक्षण शिविर भोपाल में आयोजित किया। इत्तेफाक से मैं दिल्ली में था और संतोष जी तब पहली बार संसद बने थे ,उन्होंने मुझसे भोपाल चलने को कहा, मैं तैयार हो गया। घूमने और राजनीति को समझने शौक था। मैंने अवसर को जाने नहीं दिया। दिल्ली से चली भाजपा की स्पेशल ट्रेन में कुछ समय अटल जी से बात करने का भी मिला। और भीपाल पहुंचकर मैंने वह खबर अमरउजाला बरेली को फैक्स भी कर दी।
खैर ! अटल जी से मिलने का दूसरा  मौक़ा था संतोष जी के सांसद के रूप में पहले कार्यकाल के दौरान किये गए विकास कार्यों का लेखाजोखा प्रस्तुत करती उस पुस्तक  के विमोचन का, जो मेरे द्वारा संपादित और संग्रहित किये गाये आकंड़ों पर आधारित थी। इस पुस्तक के आकड़ों को जुटाने में स्वयं श्री संतोष जी के अलावा उनके सहयोगी सतीश रोहतगी ,और स्व. पंडित गोवर्धन नाथ चतुर्वेदी जी का बड़ा सहयोग था। इस पुस्तक का विमोचन बरेली में 1993 के लोकसभा चुनाव के दौरान तब हुआ जब बरेली में नगर निगम के सामने भारतीय जनता पार्टी की चुनावी सभा को सम्बोधित करने के लिए श्री अटल जी आने वाले थे।
ह पहले से तय था कि जनसभा में श्री अटल जी इस पुस्तक का विमोचन करेंगे। मगर इस बात से मैं और भाजपा के तमाम नेता अनभिज्ञ थे । और मेरी ऐसा कोई मंशा भी नहीं था कि पुस्तक के विमोचन में मेरी उपस्थिति भी हो। संतोष जी की एक ख़ास बात है वह जब किसी के सहयोग या काम से प्रसन्न या नाराज़ होते हैं तो उसका अहसास  सिर्फ उन्हीं को रहता है।तब के अनगिनत शुभचिंतक इस बात को जानते हैं। मुझे नहीं पता था कि इस पुस्तक का रूप रंग संयोजन  संतोष जी को पसंद आया है। पुस्तक की सबसे ख़ास बात यह थी कि यह खुद संतोष जी के द्वारा ही प्रस्तुत की जानी थी ,तो इसका संपादक कोई और कैसे हो सकता था ? उन्होंने मुझसे कहा भी आप इस पुस्तक के संपादक के रूप में अपना नाम लिखें ,मगर मुझे यह बात जची नहीं। मैंने उनसे पूछा -पुस्तक आपके संसदीय क्षेत्र और कार्यकाल के विकास कार्यों का ब्यौरा भर है ,तो यह आपकी ही तरफ से होनी चाहिए। वह सहमत हुए।मैंने संपादक के तौर पर अपना नाम नहीं दिया।
इस दौरान मैंने  काफी सोच विचार करके उनसे एक आग्रह किया। सोच विचार इसलिए करना पड़ा क्योंकि मैं देख रहा था सर्दी के मौसम में सुबह तड़के से लेकर रात देर तक वह अपने चुनाव प्रचार में रहते हैं ,ऐसी में उनसे इस पुस्तक का सम्पादकीय लिखने का आग्रह करना उचित होगा ! फिर भी एक दिन मैंने संकोच तोड़कर उनसे कह ही दिया की-इस पुस्तक का सम्पादकीय आपको ही लिखना है। वह राजी हो गए -एक चुप्पी के साथ !
मुझे आश्चर्य हुआ कि अगले दिन उन्होंने मुझे फोन करके बताया कि -मैंने आपका काम कर दिया है। मैं कुछ भूल चुका था ,कि मैंने कौन सा काम कहा है !और मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि इस कदर चुनावी व्यस्तता में वह इतना समय निकाल कर सम्पादकीय इतनी जल्दी लिख देंगे।  मगर उन्हने यह काम शायद रात में दो ढाई बजे के आसपास तब पूरा किया जब वह चुनावी दौरे से लौटे। संतोष जी की लेखनी का कौशल तब मैंने पहली बार देखा। किसी मंझे हुए पत्रकार और संपादक के  जैसा आलेख था। उन्होंने कहा भी- मैं इसी ठीक कर लूँ ,मगर उसमें कलम चलाने तक की गुंजाइश तक नहीं थी। उस पुस्तक में  वह आज भी संरक्षित है।
खैर बात श्री अटल जी के निकट तक पहुँचने की थी। जो मेरे लिए अकल्पनीय थी। उस समय मोबाइल का युग नहीं था ,और लैंडलाइन फोन का भरोसा नहीं था। जनसभा वाले दिन सुबह सुबह भाई सतीश रोहतगी जी अचनाक मेरे घर आये और बोले संतोष जी ने बुलाया है। मैंने पूछा क्यों -बोले मुझे नहीं पता ! मैं आश्चर्य में था। रोहतगी जी खुद मुझे अपने साथ ले गए। सीधे नगर निगम -जनसभास्थल ,बोले संतोष जी वहीँ हैं। मुझे तब भी नहीं बताया गया कि मुझे क्यों बुलाया है। मैं पसोपेश में था। अखबार की मेरी नौकरी की लिहाज से मेरे लिए यह उचित नहीं था कि बिना आधिकारिक ड्यूटी के मैं किसी कार्यक्रम में रहूँ, जहां मुझे नहीं रहना है।
सुबह के ग्यारह बजे के आसपास श्री अटल जी जनसभा स्थल पर आ गए। सारे नेता गण जिन्हें  मंच पर होना था, पहुँच गए। मैं नीचे खड़ा था। मुझे तब भीं नहीं पता था कि मुझे अटल जी के साथ मंच पर खड़े होने का सौभाग्य मिलने वाला है। शायद संतोष जी ने अपना यह विचार किसी से साझा भी नहीं किया था। कार्यक्रम शुरू होते ही जब संतोष जी मंच की और बढे तो हाथ पकड़  कर मुझे भी अपने साथ ले गए और इतना ही नहीं अपनी पुस्तक के विमोचन के दौरान खुद पीछे खड़े हो गए और मुझे आगे कर दिया। और इस तरह यह पहला मौक़ा था जब मुझे देश की किसी बड़ी हस्ती के साथ सार्वजनिक रूप से खड़े होने का मौक़ा मिला मुझे आश्चर्य था कि संतोष जी ने मंच पर आगे आने का ज़रा भी प्रयास नहीं किया। वर्ना राजनेता आज के देर ऐसा मौक़ा कहाँ छोड़ते हैं !वह भी तब जब उनका खुद का चुनाव है और उन्हें ही खुद को प्रस्तुत करना है।
मैं गदगद था और भयभीत भी !गदगद होने की वजह तो साफ़ है ,मगर भयभीत इसलिए था कि अखबार की नौकरी में इस तरह के कार्यक्रम  में सहभागिता को पत्रकारिता की निष्पक्षता के लिहाज से पसंद नहीं किया जाता था,। खैर जो भी हुआ !वह मेरे लिए एक "अटल स्मृति" बन गया !इस कार्यक्रम की यह तस्वीर तब से लेकर आज तक मेरे ड्राइंगरूम में लगी है।
-आशीष अग्रवाल