शनिवार, 4 जुलाई 2009

तेजी बच्चन का था झुमका !


(६
जुलाई को अमरउजाला के 'ब्लॉग कोना' में प्रकाशित )
दिल्ली और लखनऊ से बराबर की दूरी पर बसे शहर बरेली के साथ अक्सर झुमके वाली बरेली का जिक्र होता है मेरा साया फिल्म में साधना पर फिल्माए गए और आशा भोंसले के गाए इस गीत के बोल रजा मेहंदी अली खान के हैं संगीतकार मदन मोहन कोहली हैं सुनील दत्त साहब इस फ़िल्म के हीरो थे अभी भी यदि आप उत्तर भारत के किसी शहर में जाएँ और खुद को बरेली का बताएं तो सुनने वाल पहले तो पूर्व प्रधानमंत्री इन्द्रागांधी वाली रायबरेली को याद करता है फिर ज्यादा बताने पर वोह इस बरेली तक पहुंचता है एक सवाल है आखिर रजा मेहंदी अली खान को अगर अपने गीत के बोल ही लिखने थे तो वह झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में के बजाये पटना या भोपाल या लखनऊ के बाज़ार में भी लिख सकते थे क्या वजह थी की इन्दीवर ने झुमका बरेली में ही गिराया? वजह है साफ़ है यह अलग बात है कि कम लोगो को ही पता है प्रख्यात बाल साहित्यकार स्वर्गीय निरंकार देव सेवक जी की बातें यहाँ याद आती हैं यही बातें आज इस आलेख का आधार बनी हैं सेवक जी अक्सर अपने परम मित्र स्वर्गीय हरिबंश राय बच्चन का जिक्र करते थे बच्चन जी और उनकी पत्नी तेजी बच्चन शादी से पहले एक बार इलाहाबाद से बरेली आए थे सेवक जी के घर पर ही दोनों रुके थे मित्रता की बात अलग है ,मगर घनिष्टता दोनों की सेवक जी के घर पर ही हुई थी और अगर यह कहा जाये की एक मुलाकत और मित्रता के सम्बन्ध को रिश्ता मिला, एक प्यार को मुकाम बरेली में ही मिला, तो ज्यादा ठीक होगा एक दोस्ती को रिश्ते में बदलने के पीछे सेवक जी का काफी योगदान था दोनों की उस बरेली यात्रा का ख़ास मकसद भी यही था उस समय यह दोनों कई दिन बरेली रहे थे और जब बात बन गयी तो तेजी बच्चन के मुख से अचानक ही निकल पड़ा था मेरा झुमका खो गया रे बरेली के बाज़ार में तेजी बच्चन जी का यह कहना इस बात का संकेत था की वह इस बरेली में आकर अपनी सुधबुध खो बैठी हैं और यहाँ तक की उनको ऐसा लग रहा है की उनके कान से झुमका गिरा गया और उन्हें खबर तक नहीं है यही बात धीरे-धीरे उस समय चर्चा में आई और उसके बाद ही रजा मेहंदी अली खान ने जब मेरा साया फिल्म के गीत लिखे तो उनका बरेली ही झुमका गिराने का ख़ास मकसद यही था बरेली का यह झुमका उस समय के बाद एक तरह से बीते जमाने की बात हो गयी थी ,मगर इधर फिर एक बार माधुरी दीक्षित के फिल्म जगत में शादी के बाद वापस आने के बाद बनी फिल्म आजा नच ले में भी एक गीत के बोल में मंगा दे झुमका बरेली वाला आया है यही वजह है की बरेली से झुमके का जो खास रिश्ता है वह अभी तक बना हुआ है हालांकि मेरा साया फिल्म का वह गीत अभी बीते जमाने की बात नहीं हुआ था और अक्सर बरेली और झुमका का जिक्र आ ही जाता था,मगर नच ले वे फिल्म ने झुमके और बरेली के रिश्ते को एक बार फिर जोड़ दिया

शनिवार, 13 जून 2009

संतोष गंगवार हार गए !


बरेली संसदीय सीट से काग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन की जीत निःसंदेह इस सीट पर बीस साल बाद कांग्रेस की वापसी का सवब बनी है। लगातार छह बार चुनाव जीतने वाले संतोष गंगवार को लेकर भारतीय जनता पार्टी उतनी ही ब्रेफ्रिक्र थी, जितने कि आत्मविश्वास से लवरेज खुद संतोष गंगवार। इसे एक तरह से अतिउत्साह या अति आत्मविश्वास भी कहा जा सकता है। मगर यह वजह दरअसल संतोष गंगवार की हार के लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं कही जाएगी।
बरेली संसदीय सीट पर संतोष गंगवार की जीत का आंकडा पिछले पाँच चुनावों के दौरान जिस तरह से घटता रहा यह किसी भी राजनीतिक दल और उसके उम्मीदवार के लिए जनता का साफ संकेत था, मगर इस संकेत को समझने की कोशिश न पार्टी ने की और न ही उम्मीदवार संतोष गंगवार ने। बरेली में संतोष गंगवार ने अपनी जीत का श्रेय कभी पार्टी को नहीं दिया। वह इसे निहायत निजी सफलता मानते रहे जिसका नतीजा रहा कि श्री गंगवार खुद को पार्टी के लिए जिस तरह से अपरिहार्य मान बैठे थे, पार्टी का जमीनी और ठोस कार्यकर्ता उनसे काफी दूर चला गया था और उनकी हार का इसबार यहां प्रमुख कारण बना। वरना कोई वजह नहीं थी कि जिस तरह से भा0ज0पा0 और संघ के तमाम संगठनों ने इस चुनाव में जहां अपनी पूरी ताकत झोंकने में कोई कसर बाकी नहीं रखी, मगर श्री गंगवार के चुनाव प्रबधको के आगे इन सबका वजूद पूरे चुनाव तक सामने नहीं आया। इसके नतीजे में संतोष गंगवार को हालांकि अपनी हार का अंदाजा हो गया था, मगर चुनाव प्रबंधको ने उन्हें इस असलियत को भी स्वीकार करने का मौका न देकर आखिरी समय तक पचार हजार वोटों से जीत का ख्याव दिखाए रखा।
इस चुनाव में मात्र 9338 वोटों से जीतने वाले प्रवीण सिंह ऐरन ने खुद इस बात को स्वीकार किया कि उनके पास कार्यकर्ताओं का अभाव था। तमाम बूथों पर उनके बस्ते तक नहीं नजर आये। इस हकीकत को उन्होंने मतदान वाले दिन स्वयं देखा। इससे निराश होने का कारण उनके पास इसलिए नहीं था क्योंकि दूसरी तरफ मतदाताओं में परिवर्तन की चाहत और भा0ज0पा0 के कार्यकर्ताओं में औपचारिकता का भाव स्वाभाविक रूप से उनके पक्ष में मतदान का प्रतिशत बढा रहा था। रणनीति के हिसाब से देखा जाए तो यहां भा0ज0पा0 शुरू से ही बचाव की मुद्रा में थी और पहले दिन से आक्रामक रूख अखितियार करके कांग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन ने न केवल तटस्थ कार्यकर्ताओं और नेताओं, बल्कि आम मतदाताओं तक को अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए मजबूर कर दिया था। संतोष गंगवार अपनी जिस सहज, सुलभ छवि को ही अपनी जीत के लिए काफी मान रहे थे और इसी आधार पर उन्होंनें बरेली के मतदाताओं से अपने पक्ष में मतदान की अपील के बजाए उनके वोट अपना हक़ जताने वाले विज्ञापन तक जारी किए थे वह इस बात का साफ संकेत था कि भा0ज0पा0 के अति उत्साह में कोई कमी नहीं थी। पार्टी के अंदरूनी झगडों के साथ-साथ जमीनी नेताओं और कार्यकर्ताओं की संतोष गंगवार से दूरी के चलते जिले की ही दूसरी सीट से मेनका गांधी जैसे राष्ट्रीय व्यक्तित्व की उम्मीदवारी ने श्री गंगवार को खासा नुकसान पहुंचाया। वजय यह रही कि तटस्थ और शांत रहने वाले नेताओं की सक्रियता आंवाला संसदीय सीट पर मेनका के साथ ज्यादा दिखी। हालांकि मनाने का प्रयास करने पर ऐसे लोग अपने मूल स्थान पर सक्रिय हो सकते थे, मगर यहां फिर संतोष गंगवार के अति विश्वास ने इस दूरी को बरकरार रहने दिया।
अपनी सरलता, सहजता और सुलभता को सदैव से अपने व्यक्तित्व की विशेषता और जीत का प्रमुख आधार मानने वाले संतोष गंगवार की मात्र नौ हजार वोटों से पराजय निश्चित तौर पर पार्टी के लिए तगडा झटका है। इसमें कोई शक नहीं कि सरलता, सहजता, सुलभता के मामले में विरोधी भी संतोष गंगवार की तारीफ करते थे, मगर इसके वावजूद मतगणना के पहले दौर से पिछडते संतोष गंगवार क्यों बढत नहीं ले पाए, इसका कारण उन्हें स्वयं भी खोजना होगा। हालांकि दबी जुबां से वह पूरे चुनाव में कह भी रहे थे कि यह उनका आखिरी चुनाव है। भारतीय जनता पार्टी की राजनीति अब यहां क्या दिशा लेती है यह भविष्य गर्त में है। सरलता, सुलभता और सहजता के वावजूद आखिर यह सातवां चुनाव संतोष गंगवार मात्र नौ हजार वोटों से क्यों हार गए, तात्कालिक तौर पर पार्टी के विश्लेषक इसका कारण तमाम मौकों पर उनकी तटस्थता को भी मानते हैं जो हर वक्त सरलता, सुलभता और सहजता के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व में साफ नजर आती थी। यही तटस्थता संतोष के प्रति पार्टी और जनमानस में असंतोष का कारण बन गयी।

बृहस्पतिवार, 15 जनवरी 2009

सत्य का महास्वांग

आज भारत और सदा चका चौंध से भरी दुनीया में एक नाम बड ज़ोर से गूंज रहा है वह है सत्यम का | इस तेज़ रफ्तार फैक्ट्री ने मेरी नज़र में ऐसा कुछ नही कीया है जो इस देश में और लोग नही कर रहे हैं |हाँ यह ज़रूर हुआ है की इसने अपने कर्मों को जल्दी कुबूल कर लीया है तो इसमे इसको अब सज़ा देने के उन तमाम रास्तों की खोज की जा रही है जो शायद उसे कभी मिह्मा मंडित करने के लिए भी तलाशे गए थे जो रस्ते इस कंपनी को एक वक्त में इतनी ऊंचाई पर ले गए जहाँ से इसको भारत भी छोटा नज़र आने लगा था वोह रस्ते आज इसको भारत का होने भर से ही शर्मसार हैं | सत्यम के पालनहारों ने जब इसका नामकरण कीया होगा तब भी नही सोच होगा की यह नाम सबसे बड़ा असत्य का संकेत हो जाएगा ,क्यूंकि सत्यम को बड़ासत्य ने बनाया न की उसके रामाइलिगा ने | आज सवाल बार बार यह आता है की क्या सत्यम की बुनियाद ही एक बहुत बड़े झूट का स्वांग रचने के लीए की गई थी?एक ऐसा झूट जीसका नाम "सच" रख दीया गया? और इस सच को न केवल भारत बल्कि पुरी दुनीया ने सत्यम के नाम पर स्वीकार कीया और सत्य कीतना बड़ा असत्य है यह शायद अब पता लगा जब सारा जीवन और तन मन धन सत्यम को सौपने वालों के जीवन का वोह सच सामने आ गया जीससे वोह अब तक वाकीफ नही थे मगर इस सत्य को यह देश इतनी खामोशी से स्वीकार कर रहा है मनो यह देश की रीती रेवाजो का एक हिस्सा हो !कौन सही है और कौन ग़लत यह तलाशने का वक्त तो अब आ ही चुका है इस देश आज आतकवाद तो बर्ब्बाद कर ही रहा है मगर आर्थिक आतंकवाद भी हमारे लीए कम बड़ी चुनौती नही है मुझे लगत है यह आर्थिक आतंकवाद शायद उन गोलियों के आतंकवाद से ज्यादा खतर्नआक है जो एक झटके में जन तो ले लेता है यह तो पीढियों को खोकला करने का ऐसा कम है जिसमे कोई भी शिक्षा धरम और पुरानो की के उपदेश भी कम नही आएंगे



रविवार, 27 जुलाई 2008

दुनिया में बरेली

झुमका बरेली का एक ऐसा प्रयोग है जिसके जरिये हम और आप अपनी जड़ों को गहरे तक तक खोज और सींच भी सकते हैं। तेजी से बदलती, दौड़ती और धड़कती ज़िन्दगी में आज तरक्की तो है मगर ज़िन्दगी की तलाश मरते दम तकन तो पूरी होती है यह तलाश कब शरू होती है है इसका भी अहसास इस ज़िन्दगी की भागम भाग में यह ज़िन्दगी ही हमें नही होने देतीआख़िर क्यूँ है ऐसा कभी सोच हमने?कभी नहीं ?क्यूँ? इसलिए की ज़िन्दगी की तेज रफ्तार में आगे निकलने की होड़ तो है मगर इस होड़ में एक और तलाश अनजाने में ही शुरू हो जाती है वोस है ज़िन्दगी की तलाश हम इस हकीकत से जानकर भी अनजान बन जाते है और यह भी भूल जाता हैं यह बहाग दौड़ आज तरक्की की तलाश में है या ज़िन्दगी की तलाश में ?डर असला यह भाग दौड़ तो ज़िन्दगी की ही तलाश में है और इसको हम तरक्की का नम देकर ख़ुद को समझाने और खुश होने का पर्यास करते हैंहकीकत में यह भाग दौड़ ज़िन्दगी की ही है और इसकी मंजिल है हमारी जड़ें (our roots)और जब जड़ों की तलाश पूरी हो जाती है हम अपनी मंजिल मिल गई ऐसा समझते हैंअफ़सोस तब तक इतनी देर भाग भाग कर ज़िन्दगी भी इतनी थक चुकी होती है की जड़ों से ख़ुद को जोड़ने का समय ही नही मीलता ,या हमजुड़ नही पाते यही सब सोच कर मैंने यह ब्लॉग बरेली के लोगों के लिए बनाया है क्यूंकि मई जब ख़ुद जड़ों की बात कर रहा हूँ तो शायद मुझे ही पहल करनी होगी और यह पहल करने के लिए बरेली ही इस दुनिया में एक ऐसा मुकाम है मुक्कम्मल जगह हैतो आज भगवान कृष्णके जन्मदिन पूरी दुनिया में बिखर ही के मौके पर पूरी दुनिया में बीखरे हुएबरेली के लोगों को खास तौर पे इस दिन की शुभकामनायें देते हुए मई आप सबको आमंत्रित करता हूँ की इस ब्लॉग से जुड़कर" बरेलीकी दुनीया "बनायें क्यूंकि दुनीया में बरेली कम नही है !"