18/10/2016

राजनीति और विकास के अद्भुत शिल्पी नारायण दत्त तिवारी !

जन्म 18 अक्तूबर 1925- आज 92वें जन्म दिवस पर 
ज अपना 92वां जन्म दिवस मना रहे वरिष्ठ राजनेता एवं उत्तर प्रदेश के चार बार और  उत्तराखण्ड राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री  रहे नारायण  दत्त तिवारी  भारतीय राजनीति मे हमेशा एक नायाब शख्सियत के साथ चर्चा मे रहे । एक दो अपवादों को छोड़ दिया जाए तो उनके द्वारा रची गयी विकास की कल्पना को उन्होने कभी आने वाली सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा । खुद ही अपनी हर कल्पना को मूर्त रूप दिया ।उत्तर प्रदेश हो उत्तराखंड ,उनके पास आने वाले फरियादियों कभी किसी को लाइन नहीं लगानी पड़ी । उनके खास निर्देश थे कि जो अभी उसे समान के साथ बिताया जाये ,पानी और चाय के साथ कुछ नाश्ता दिया जाये । उसके बाद वह देर रात तक 12 -12 बजे तक लोगों से मिलते थे । थकान उनके पास से होकर नहीं गुजरती थी । 
त्तर प्रदेश मे उनके द्वारा बसाया गया नोयडा आज देश राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और एनसीआर मे विकास का प्रतिमान है । एक यही नहीं ,हजारों विकास के काम ऐसे हैं ,जो उनके बाद के शासकों के अनुकरणीय बने हैं, मगर उन्होने कभी अपने कामों का गुणगान नहीं किया । उनकी हर योजना और सोच राजनीतिक दलों और सरकारों के लिए प्रेरणा और अनुकरणीय बनी । 
नारायण दत्त तिवारी का बरेली से गहरा नाता रहा । बरेली मे आजादी के पहले से चला आ रहा काष्ठ कला केंद्र नाम का जिसे कार्पेंटरी स्कोल कहते थे उसमें उनके पिता पूर्ण नन्द तिवारी नौकी करते थे । वह जब बरेली आए इस स्क्लूलकी चिंता करते करते थे और इसके विकास के लिए कुछ ण कर पाने की उनके मन मे एक टीस रही । आज उस स्कूल का नामोनिशान मिट चुका है और उसकी जमीन पर उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार के दौर मे विकास भवन और और इससे पहले इसके आधे हिस्से मे महिलाओं का सरकारी डिग्री कालेज खोला जा चुका है । आजादी के आंदोलन के दौरान वह बरेली सेंट्रल जेल मे बंद भी रहे । 
अपने पिछले जन्म दिन पर 16 अक्तूबर 2015 वह बरेली आए थे । अगले दिन उन्हें हल्द्वानी जाना था । और वहाँ 18 अक्तूबर को होने वाले अपने प्रशंसकों के द्वारा आयोजित जन्मदिन समारोह मे हिसा लेना था । एक साथ लंबी यात्रा के लिए येंकी सेहत अब इजाजत नहीं देती । इसीलिए वह बरेली आए । बरेली से विशेष लगाव भी इसकी एक वजह तो थी ही । 
1989 के चुनाव मे उत्तर प्रदेश मे कांग्रेस की आखिरी सरकार के मुखिया भी वही थे और उसके बाद जब मुलायम सिंह यादव पहली बार जनता दल और भाजपा की गठबंधन सरकार के मुखिया बने तो उनके सामने अपनी सरकार का बजट पेश करने कि बहुत बड़ी चुनौती थी । उस समय भी यह बात चर्चा मे रही कि बजट तिवारी जी ने बनाया है । नोयडा के लिए उनका सपना अभी अधूरा है । वह इसे देश का एक और केंद्र शासित प्रदेश बनाना चाहते थे । इसको बसाने के लिए उन्होने देश के बड़े बड़े उद्योगपतियों को खुद फोन कर करके व्यक्तिगत रूप से बुला-बुलाकर अपने उद्योग लगाने के प्रेरित किया उनकी मुश्किलें सुनी और फिर उन्हें हाथों हाथ हल किया । 
16 अक्तूबर 2015को  बरेली मे पुरानी यादें ताज़ा करते लेखक आशीष अग्रवाल के साथ 
ह जहां होते थे ,उनका मंत्री या मुख्यमंत्री के तौर पर दफ्तर वहीं होता था । जो अभी सामने आया ,जो फरियाद की ,मौके पर ही उसका समाधान और आदेश करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा थी । वह जहां भी जाते थे ,सबसे पहले उस जिले का अखबार उनके सामने पेश करना डीएम की पहली ज़िम्मेदारी होती थी । पहले के दौर मे मीडिया मे एक प्रचलन था कि जब भी कोई वीआईपी मूवमेंट होता था था अपने और आसपास के इलाके की खास समस्याओं पर उनका और उनके विभाग से संबन्धित समस्याओं पर खासकर लेख और रिपोर्ट अखबार मे दी जाती थी । और तिवारी जी अखबार देखते ही सबसे पहले उस मसले पर अफसरों से बात करते थे ,उनकी खबर लेते थे और हाथों हाथ अपना फैसला सबके सामने जाहिर कर  देते थे । इसका सबसे बड़ा लाभ यह होता था कि मीडिया की रिपोर्ट्स को अनदेखा करना प्रशासन के बूते के बाहर की बात होती थी । सरकार और प्रशासन मे मीडिया कि उपयोगिता का इससे बढ़िया माध्यम कोई और हो नहीं सकता था । इसके साथ मीडिया को समाज के प्रति जिम्मेदार बनाने मे उनकी इस शैली बहुत बाद योगदान रहा । 
बरेली मे मेरा आत्मीयता से मिलते हुये ,साथ मे उज्ज्वला शर्मा । 
तना ही नहीं ,अपने कार्यक्रमों के दौरान वह अपनी पार्टी के सांसदों और विधायकों के अलावा यदि  विरोधी दलों के लोग भी उनसे मिलने जाते थे ,तो उनसे भी वह सबसे पहले यह पूछ लिया करते थे कि आज यहाँ किस चीज़ के जरूरत सबसे ज्यादा है ,अगर कोई उन्हें मौखिक रूप से भी समस्या बता कर अपना सुझा देता तो वह अपने भाषण मे तत्काल उसकी घोषणा कर दिया करते थे । उनके लखनऊ से चलने से पहले जिले के अधिकारियों से बात करके पूरी तैयारी करते थे कि मुख्यमंत्री से किस परियोजना की घोषणा करवानी है । विरोधी दलों के नेताओं को भी को भी हमेशा महत्व दिया । यही वजह थी की उनसे मिलने जाने वालों मे सभी दलों के नेता थे।आज के दौर मे राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्री समेत केंद्रीय मंत्री से मिलने वालों की जगह 100 मीटर दूर होती है और वह सिर्फ विरोध के लिए जाते हैं । उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड केमुख्यमंत्री रहते हुये उन्होने हमेशा विकास की परियोजनाओं को राजनीति से ऊपर रखा । 
राजनीति के भी वह एक माहिर खिलाड़ी रहे । एक हद से ज्यादा अतार्किक विरोध को उन्होने कभी पनपने नहीं दिया । उनके लिए इस बात का कोई मतलब नहीं था कि इस जिले मे उनकी पार्टी का सांसद नहीं है और विधायक कितने हैं ,कहाँ के लोगों ने उनकी पार्टी के उम्मीदवार को हरा दिया है । विकास और राजनीति को उन्होने हमेशा अलग रखकर देखा । उत्तर प्रदेश के खाद कारखाने और गैस की पाइपलाइन यहाँ के लिए एक दिवा स्वप्न थी ,उन्होने ऐसे चुटकियों मे इन परियोजनाओं की बुनियाद रखी मानों कि कुछ किया ही नहीं । मात्र बरेली मण्डल मे ही खाद के तीन तीन कारखाने लगवा देना अपने आप मे बड़ी बात है । अपने संसदीय और निर्वाचन क्षेत्र नैनीताल मे गन्ने की भारी  पैदावार और किसानों के सामने इसकी बिक्री की समस्याओं से पूरी तरह वाकिफ नारायण दत्त तिवारी ने वहाँ चीनी मिलों की स्थापना ऐसे कि जैसे आज सांसद और विधायक अपने अपने क्षेत्रों मे इंडिया मार्का हैंडपंप लगवा देते हैं । 
बरेली से हल्द्वानी जाते समय भी मुझे अपने साथ बाहर तक लाये ,साथ मे रोहित शेखर । 
ड़कों को देश के भाग्य रेखाएँ बताकर उन्होने देश के विकास मे सड़कों की महत्ता को न केवल समझा , बल्कि आने वाली पीढ़ियों को एक संदेश भी दिया ,जो आज तक देश के लिए अनुकरणीय बना हुआ है । बरेली की सेमीखेड़ा चीनी मिल उनकी इसी योजना का परिणाम थी ,क्योंकि यह इलाका नैनीताल से लगा हुआ है था जो अब ऊधन सिंह नगर के नाम से जाना जाता है । मुझे याद है केंद्र मे उद्योग मंत्री के तौर नार्वे और स्वीडन के दौरे के बाद वह जब अपने निर्वाचन क्षेत्र के दौरे पर आए, तो उन्होने सड़कों के निर्माण के लिए हाटमिक्स तकनीक का उत्तर प्रदेश मे श्रीगणेश किया । उस समय नैनीताल सड़कों के लिए पूरे देश मे चर्चित हो गया था । यह कहा जाने लगा था कि सड़कें देखनी हैं नैनीताल की देखो । 
म आदमी और देश प्रदेश की हर जरूरत को उनहोंने जितनी शिद्दत के साथ महसूस किया ,आज के दौर उनकी जैसी सोच के राजनीतिक दल और उनके नेताओं कि संख्या गिननी मुश्किल होगी । 1990 मे राजीव गांधी हत्या के बाद के संसदीय चुनावों मे नैनीताल से मात्र 800 वोटों से हारने के बाद उन्होने अपनी इस पीड़ा को व्यक्त भी किया था कि देश की जनता को विकास से कोई सरोकार  नहीं है ,उस चुनाव मे नैनीताल ने देश के भावी प्रधान मंत्री को हराया था ,जिसका नैनीताल के लोगों ने उनके सामने प्रायश्चित स्वरूप उनसे खेद भी जतया था ।  इन पंक्तियों  का लेखक उस समय का गवाह है ,और इसकी रिपोर्टिंग तब मैंने अपने @अमरउजाला मे मैंने प्रकाशित भी की थी । यह वह समय था जब वह अपनी हार से उबर कर एक बार फिर पूरे जोश के साथ अपने संसदीय क्षेत्र  मे विकास यात्रा लेकर निकले थे । उस यात्रा की कवरेज के लिए उस समय देश के लगभग सभी राज्यों के प्रमुख अखबारों के साथ विदेशी मीडिया भी यह देखने आया था कि एक हारा हुआ बड़ा राजनेता किस हौसले के साथ अपने क्षेत्र मे फिर से जा रहा है । उस यात्रा मे उन्होने अपने क्षेत्र की जनता से श्क्वा नहीं किया बल्कि उन्हें उनके फैसले के लिए प्रणाम किया । उस दौरान उनकी उकाड संहाओं मे उनके भाषण का पहला वाक्य होता था -आपके फासले के लिए आपको प्रणाम -बस यही एक छोटा सा वाक्य हजारों की भीड़ के लिए उनकी आँखें नम कर देने के लिए काफी होता था । 
उत्तरखंड के मुख्यमंत्री आवास मे  मैं और वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानन्द मिश्र । 
त्तराखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होने इस नए राज्य के विकास की जो परिकल्पना की वह शायद किसी के बूते की बात नहीं थी । हरिद्वार की बंजर ऊसर जमीन और राख़ के बड़े बड़े ढेरों वाले खौफनाक इलाके मे उद्योगों के विकास की एक ऐसी संरचना सिडकुल खड़ी कर देना गोया कि उद्योगों का जंगल बसाया गया हो ,यह उनकी विकास के प्रति ललक और देश के भविष्य के प्रति गहरी चिंता का ही परिणाम था ।बिजनौर जिले के नजीबाबाद और हरिद्वार के बेच मे गंगा के बीच से होकर जाने वला रास्ता जिन्हें रपटे कहा जाता था ,हर सलर बरसात मे यह मार्ग सैकड़ों सैकड़ों की जान ले लेता था और बसें तक इसमें बह जाती थी ,उन्होने मुख्यमंत्री बनते ही एक पत्रकार के सुझाव पर इसकी परियोजना बनाने का आदेश दिया और खुद और केंद्र से इसकी मंजूरी करवाकर इस मार्ग को एक नया रहसरीय राजमार्ग घोषित करवा दिया । उत्तरखंड को उत्तरखंड से जोड़ने के साथ उत्तर प्रदेश से जोड़ने के लिए यह एक ऐसा काम हुआ ,जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । वह भी तब जब कि केंद्र मे भी कांग्रेस की सरकार होते हुये वह कभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने नहीं गए । इसकी वजह यह थी कि जब वह केंद्र मे राजीव गांधी की सरकार मे वितता मंत्री थे तब मनमोहन सिंह उनके वित्त सचिव थे ।
-आशीष अग्रवाल

31/08/2016

भारत के इस तंत्र मे तो "लोक" का दम घुटता है !

अमर उजाला 30 अगस्त 2016  मे प्रकाशित 

भारतीय लोकतंत्र और चुनाव प्रणाली इस देश के हक़ में है या इस देश के भू-भाग के और इस देश के आम नागरिकों के हक़ में,यह सवाल आज  शुरू हो चुकी नई नई राजनीतिक परमपराओं की वजह से बहस का विषय है। वर्तमान में सभी राजनीतिक दल ठीक उसी तरह से जनप्रतिनिधित्व कानून के रोम छिद्रों के भीतर माइक्रोस्कोप के जरिये अपने हित खोजने में लगे हैं और काफी हद तक उन्होंने खोज भी लिए हैं। 
पूर्व चुनाव आयुक्त टी एन शेषन ने चुनाव आचार संहिता का डंका और डंडा बजा या तब से हमारे नीति नियामकों ने ऐसे बहाने तलाश लिए हैं, जिनके जरिये वह कानून की अवहेलना से तब तक बचे रह सकते हैं, जब तक इसके खिलाफ माहौल नहीं बनता।  और इस तरह पिछले दो चुनावों से इस देश में राजनीतिक दलों द्वारा नए भ्रष्टाचार को जन्म दे दिया गया है और मजे की बात ये है इस मुद्दे पर सब एक हैं।  ठीक उसी तरह जैसे जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्तों पर सबकी बोलती और बुद्धि बंद हो जाती है ,ऐसे सिर्फ जनता को ही अपने लिए लोकतंत्र का साफ़ सुथरा रूप बरकार रखने के लिए आगे आना होगा।  
स्वस्थ लोकतान्त्रिक परम्पराओं के निर्माण और उनकी रक्षा के लिए ही चुनाव आयोग का गठन किया गया है । और यही आयोग का दायित्व है । कोई भी चुनाव देश मे भ्रष्टाचार का आधार हैं । देश मे काला धन बाहर निकलता है ,महंगाई बढ़ती है और हिंसा भी होती है । सरकार प्रशासन का भी समय ऊर्जा और धन की बरबादी होती है । सिर्फ इस वजह से कि चुनाव मे चुनाव प्रचार का समय दिया जाता है ,यह एक बहुत पुराना नियम है । इस देश मे रोज चुनाव ही होते रहते हैं ,भले ही मतदान न हो, इसलिए कि राजनीतिक दल और निर्वाचित सरकारें सब एक ही काम पर लगे रहते हैं । अगला चुनाव ऐसे मे किसी भी राज्य ,और देश के आम चुनावों के अलावा स्थानीय निकाय चुनावों मे चुनाव प्रचार के लिए दिये जाने वाले समय और चुनाव खर्च के प्रावधान को तुरंत समाप्त कर देना चाहिए । 
ज के दौर मे भारत की सभी सरकारें लगभग 20 सालों से देश मे चुनाव सुधारों की बात करते हुये सत्ता से बेदखल हो चुकी हैं ,मगर देश की चुनाव प्रणाली मे अभी तक कोई ऐसा सुधार नहीं सामने आया ,जिससे वाकई लोकतन्त्र की स्वच्छता और शुचिता के साथ मतदान की पवित्रता भी बनी रहे । लोकसभा या हो विधान सभा चुनाव, शायद ही देश का कोई हिस्सा ऐसा बचता होगा जहां मतदान केन्द्रों पर कब्जे  की कोशिशें न की जाती हो। इसके अलावा पूरे के पूरे गाँव के वोट ही किसी एक प्रत्याशी के पक्ष मे पड़ जाना उसकी लोकप्रियता का पैमाना माना जाता है ,जबकि यह लोकप्रियता भय पर आधारित होने मे कोई शक नहीं होता ।
देश मे चुनाव सुधारों के लिए टी एन शेषन नाम के एक मुख्य चुनाव आयुक्त बहुत जाने और पहचाने गए ,उन्होने जो भी किया उसे आज भी इसलिए याद किया जाता क्योंकि इससे पहले के सभी चुनाव आयुक्त सरकार के खिलाफ नहीं जाते थे ,क्योंकि चुनाव परिणाम भी कांग्रेस के खिलाफ जाएंगे, ऐसा नहीं माना जाता था । सवाल यह नहीं है कि श्री शेषन ने क्या किया और क्या नहीं किया ,आखिर चुनाव आयोग की नीति  नियामक संस्था भी भारतीय संसद ही है और उससे पारित कानून और नियमों को ही चुनाव आयोग को लागू करवाना होता है । बस सिर्फ इतना फर्क होता है -चुनाव के समय चुनाव आयोग के काम मे सरकारी दखल जाहिर तौर पर नहीं दिखाई देता । यह बात इसलिए गलत नहीं है क्योंकि सत्तारूढ़ दल चुनाव आचार संहिता से लेश मात्र भी सतर्क या भयभीत नहीं दिखाई देता ।
चुनाव सुधार के नाम पर अब तक देश मे जो भी किया गया वह कितना प्रभावी रहा ,यह जानने की कोशिशें भी चुनाव के बास आने वाली सरकारें ठीक से नहीं करती ।  चुनाव के बाद ऐसा लगता है जैसे चुनाव आयोग एक ऐसी संस्था है जो चुनाव के बाद स्वतः भंग सी हो जाती है या अस्तित्वहीन हो जाती है ,जबकि लोकतन्त्र मे यही एक मात्र ऐसी संस्था है, जो सर्वाधिक गतिमान और सशक्त दिखाई देनी चाहिए । विकास के नाम अपर भारत आज तक दुनिया भर से नयी नयी तकनीक और साधन,सहायता लेता रहा है ,मगर हमने आजादी के बाद से लेकर आज तक किसी देश से उसके उन क़ानूनों को नहीं लिया जिनके जरिये उन्होने अपने देश मे चुनाव सुधार के साथ आम जन के हित मे उपयोगी और सुविधाजनक कदम उठाए हैं ,जिनके अभाव मे उनके देश की जनता असुविधा महसूस करती रही है और उन्होने उसे बदला । दावे के साथ कहा जा सकता है कि भारत मे आने वाली हर सरकार ,चुनाव के पहले कितनी ही भ्रष्टाचार की परतें खोलने की बातें करे मगर चुनाव के बाद वह खुद आम जनता को,उसी जनता को जिसने उनसे वोट लेकर सरकार बनाई है ,ऐसे क़ानूनों से बांधने लगती है जिससे आम मतदाता का दम घटता हुआ नजर आता है ,मगर पाँच साल की लाचारी उसे सब्र के इम्तेहान मे ले जाती है ।
राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्रों और वादों के साथ चुनाव प्रचार के दौरान उस समय सतारूढ़ दलों की नीतियों पर उठाए जाने सवाल और उनके भ्रष्टाचार के मुद्दों के विषय ऐसे हैं ,जिन पर नयी सरकार को पूरी तरह से अमल मे लाना चाहिए । इसके अभाव मे उस सरकार की जवाबदेही तय करने का काम भी चुनाव आयोग उतने ही अधिकार से करे ,जितने अधिकार से निर्द्वंद होकर वह चुनाव सम्पन्न कराता है,मगर ऐसा आज तक हुआ नहीं और कभी होगा ,इस पर राजनीतिक दलों मे कहीं  मतभेद भी नहीं है । आखिर क्यों ? इस सवाल का जवाब भारत के राजनीतिक दल,सरकारें और न्यायपालिका और चुनाव आयोग कभी खोजने की कोशिश भी नहीं करते । अधिकतम मतदान की अपील के लिए करोड़ों अरबों रुपये खर्च करके भी मतदान के प्रतिशत मे मात्र 10-15 प्रतिशत की औसत वृद्धि ही दर्ज की जा सकी है -इसमें मतदान केन्द्रों पर कब्जे और मतदान की पवित्रता भंग किए जाने के गैरकानूनी तरीके भी शामिल हैं ,जो भविष्य की सरकारे कानून बनाने की ताकत प्राप्त करने के लिए अमल मे लाती हैं ।
हाँ यह मिसाल काफी होगी कि नरेंद्र मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली अपने चुनाव के दौरान (जो वह हार गए ) खुद आयकर सीमा पाँच लाख किए जाने की घोषणा ,पूरे चुनाव अभियान के दौरान करते रहे और चुनाव के बाद देश के वित्त मंत्री के तौर शपथ लेने के बाद उनका सबसे पहला काम देश का अगला बजट बनाने का ही था । अपने पहले ही  बजट मे ही उन्होने पिछली मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियों को बेहद खराब बताने मे कभी संकोच नहीं किया और उनकी पार्टी ने भी मनमोहन सिंह की सरकार को हर मोर्चे पर नाकाम बताया और फिर अपने पहले ही बजट मे अरुण जेटली  ने आम आदमी की सबसे बड़ी उम्मीद आयकर सीमा मे बढ़ोत्तरी को छुआ तक नहीं, जिसे मनमोहन सिंह सरकार अपने दस साल के कार्यकाल मे कई बार ,थोड़ा थोड़ा ही सही बढ़ा चुकी थी ।
वाल यह है कि सरकार बनाने जा रहे लोग क्या ऐसे ही बिना समुचित जानकारी के नारों और भाषणों के सहारे सत्ता हथियाने का अभियान चालते हैं या फिर देश को एक उत्तर दायित्व पूर्ण सरकार देना चाहते हैं -इस सवाल का जवाब चुनाव आयोग को लेने के लिए सक्षम बनाना होगा । जब तक हमारे देश के राजनीतिक दलों की जनता के प्रति जवाबदेही कानूनी तौर पर आती नहीं होग जाती ,तब तक भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र का नाम देना महज एक चुनावी वादे और नारे जैसा खोखला है। इसके बाद मतदान और उसकी प्रक्रिया ही सबसे बड़ा मुद्दा है जिसकी बुनियाद पर ही हमारा लोकतन्त्र खड़ा है। इसके लिए हम आज भी उस सोच मे जी रहे हैं जब भारत को  आजाद कराया गया था और जैसे तैसे देश मे आजाद भारत की एक सरकार का गठन करना था। उस समय देश मे सिर्फ एक ही पार्टी थी और वह कांग्रेस । उस कांग्रेस ने अपने हिसाब से चुनाव प्रणाली और मतदान की प्रक्रिया तय कर दी ,वही प्रक्रिया आज विकास के मामले मे दुनिया के मुक़ाबले को तैयार इस देश को हर पाँच साल मे एक नए दल को सरकार बनाने का अवसर देती है जो पिछली सरकार के धुर खिलाफ होता है ,मगर चुनाव प्रणाली को बदलने के बारे कोई नहीं सोचता ।क्योंकि चुनाव प्रचार के लिए मुद्दे गढ़ने वाले राजनीतिक दल चुनाव की लाचार प्रणाली को ही अपने लिए संजीवनी शक्ति मानते हैं ।
त्तर प्रदेश और उत्तराखंड पंजाब के बाद मणिपुर आदि राज्यों की विधान सभाओं के लिए अगले वर्ष के शुरू में ही होने वाले चुनावों के लिए इस समय सभी दलों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।  मगर अभी चुनाव में समय है।  कितना हास्यास्पद है कि चुनाव की पवित्रता के नाम पर सभी राजनीतिक दाल किस तरह से कानून  इस्तेमाल करते हए निर्द्वंदता के साथ अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर रहे हैं ,बाकायदा खर्च की सीमा के बंधन से मुक्त होकर लगभग पूरा चुनाव प्रचार अब से कई महीने पहले ही शुरू कर चुके हैं ,जिस करोड़ों रूपया खर्च किया जा रहा है।
  1. यही नहीं राजनीतिक दलों में टिकटों की खुली बिक्री किये जाने की बात अब किसी से छिपी नहीं है।  इसके बावजूद रोज उम्मीदवार तय करके ,बदले भी जा  रहे हैं ,जाहिर यह इस खुले लोकतांत्रिक भ्र्ष्टाचार को रोकने में यह देश पूरी तरह असहाय और मूकदर्शक है।  किसी को न तो इसमें कोई खामी नजर आ रही है और न ही कोई कानून इस पर लागू होता है।  ऐसे में मौजूद परिवेश में जरूरी है कि -कहीं भी किसी प्रदेश सत्तारूढ़ दल के द्वारा यदि चुनावी तैयारी और उम्मीदवारों का चयन /घोषणा किया जाना शुरू कर दिया जाये तो वहाँ तुरंत चुनाव आचार संहिता अस्तित्व में आ जानी चाहिए।ऐसे में फिलहाल उत्तर प्रदेश और उत्तरखंड मे तत्काल चुनाव आचार संहिता लागू की जाए । 
  2. सभी दल पूरी तरह से चुनाव की खुले आम तैयारी कर रहे हैं जबकि चुनाव मे अभी समय है । ऐसे मे राजनीतिक दल अपनी तैयारी करें उसमें कोई ऐतराज नहीं है मगर उम्मीदवारों की घोषणा न करें । इससे चुनावी रंजिश पैदा हो रही है जो मतदान के समय हिंसक रूप मे सामने आती है । 
  3. कोई भी राजनीतिक दल यदि अपने किसी उम्मीदवार की घोषणा करता है तो उसका निर्वाचन अधिकार पत्र नामांकन के समय जारी करने के बजाए उम्मीदवारी की घोषणा के साथ ही तत्काल निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराया जाये । 
  4. राजनीतिक दलों पर यह पाबंदी होनी चाहिए कि एक बार अपने उम्मीदवार कि घोषणा के बाद उसे बदलेंगे नहीं ।और यदि बदलते हैं तो उन पर जुर्माना लगना चाहिए ,क्योंकि आज के दौर मे राजनीतिक दल अपने टिकिट बेच रहे हैं ,ऐसे मे राजनीतिक दलों पर यह पाबंदी होनी चाहिए कि वे चुनाव आयोग के समक्ष इस बात का शपथ पत्र दें कि किसी भी उम्मीदवार को अपना प्रत्याशी बनाने के लिए उन्होने किसी प्रकार का धन नहीं लिया है । और न ही वह चुनाव के लिए किसी प्रत्याशी धन देंगे और चन्दा भी नहीं लिया जाएगा । 
  5. यदि कभी भी किसी भी उम्मीदवार का चयन करने के लिए उससे धन या अन्य किसी प्रकार का लाभ लिया गया है तो उस दल का पंजीकरण निरस्त करके उसे चुनाव मे प्रतिबंधित कर दिया जाएगा । 
  6. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मे बड़ी संख्या मे राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों ने अपने होर्डिंग बैनर प्रचार सामिग्री लगा दी है । जिला निर्वाचन अधिकारियों से जांच कराकर रिपोर्ट ले ली जाये और ऐसी सभी प्रचार सामिगरी को उस क्षेत्र के प्रयाशी के चुनाव खर्च मे जोड़ दिया जाये ,भले ही पार्टी उस क्षेत्र से अपना प्रत्याशी ऐन चुनाव के मौके पर बदल दे । 
  7. चुनाव कार्यक्रम की निर्धारित व्यवस्था मे अब बदलाव किया जाये प्रचार की अवधि ,चुनाव प्रचार चुनाव मे होने वाले खर्च समाप्त कर देना चाहिए ! 
  8. इसलिए कि यह तब जरूरी था,जब संचार और यातायात के साधन नहीं थे , मीडिया सोशल मीडिया ,इन्टरनेट ,टेलीफोन ,मोबाइल स्कूटर मोटसाइकिलें नहीं थे तब यह प्रचार का समय ठीक था ,अब तो सब अपने अपने हिसाब से इस कदर प्रचार मे लगे हैं कि मतदान से पहले अलग से चुनाव प्रचार सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार और लोकतन्त्र के चीरहरण के अलावा कुछ नहीं है । 
  9.  #ElectionCommissionofIndia को इस बारे मे सोचना चाहिए ।देश मे चुनाव के लिए चुनाव प्रचार ,प्रचार के लिए दिया जाना वाला समय और खर्च समाप्त कर देनी चाहिए । खर्च की अनुमति ही न हो । चुनाव की घोषणा के साथ ही एक हफ्ते मे मतदान होना चाहिए ।
  10. वर्तमान समय मे इलेक्ट्रानिक और इन्टरनेट का युग है ,ऐसे मे चुनाव आयोग को न केवल अपनी वेब साइट पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य सोशल साइट्स के जरिये भी आधार नमबर से मतदाता  सूची लिंक होने कारण मतदान की वयवस्था करनी चाहिए । 
  11. इसके अलावा सबसे अंत मे जो सबसे महत्वपूर्ण सुझाव है वह यह कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र मे मतदान के लिए न्यूनतम तीन दिन समय दिया जाये ,सचल मतदान केन्द्रों की भी व्यवस्था की जाये ,जिससे सभी मतदाता अपने मत का अपने घर पर ही प्रयोग कर सकें ।
-आशीष अग्रवाल 

08/07/2016

जातियाँ - अनुप्रिया 'कुर्मी' अजय टमटा 'दलित' और दीपक सिंघल 'भ्रष्ट' !

अनुप्रिया पटेल -केन्द्रीय राज्य मंत्र
ई दिनों से उलझन के चलते मन विचलित है । यही नहीं समझ पा रहा हूँ कि देश और प्रदेश का विकास कौन करता है ? राजनीतिक दलों का चुनावी एजेंडा ,इस देश की जातियाँ या फिर सरकार की नीतियाँ , सरकार मे बैठे विभिन्न योग्यताओं से लकधक मंत्री और अफसर ! या फिर कुछ जातियां ! ये जातियाँ अपना विकास करती हैं या देश का ? कुछ जातियाँ ऐसी भी जो इस देश को चूसे-खाये जा रही हैं आखिर अपना खोया हुआ गौरव वापस लाने के रास्ते पर चल पड़ा और एक बार फिर विश्वगुरु बनने पर आमादा भारत का आज के दौर मे बदले हुये माहौल मे क्या अब भी वही भविष्य है ,जिसे खोजते-खोजते हमने "आजादी के सात दशक ' बना लिए और आज भी बाकायदा खास अभियान चलाकर गाँव गलियों की सफाई के साथ भारत की सरकार अपने नागरिकों को यह बता रही  है कि उन्हें शौच कैसे करनी है ,कहाँ, करनी है ! यहाँ तक की महिलाओं का प्राकृतिक मासिक धर्म से शरीर की सुरक्षा का प्रचार भी आज भारत भर मे सरकारों  की एक योजना का हिस्सा है ।
देश को अपने अपने नजरिए से देखने के लिए तो सब स्वतंत्र हैं ,खासकर मीडिया । मगर क्या मीडिया भी खुद को उस सोच से बचाकर रख पाया है जिसके लिए वह खुद आए दिन राजनीतिक दलों और सत्ता के तमाम प्रतिष्ठानों को आड़े हाथों लिए रहता है । वह खुद रम गया है उसमे । रच बस गया है । बाहर निकलना ही नहीं चाहता । राजनीतिक दलों का संकीर्ण नजरिया ,मीडिया के व्यवहार मे ऐसे समा गया है ,मानो यही एक आचार संहिता है ।
हाल मे दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र और इस लोकतन्त्र के सबसे बड़े सूबे मे दो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुये । हमारे देश के मीडिया ने इसे अपनी चिर-परीचित विद्वता के साथ टीका-टिप्पणियों के साथ दोनों की कवरेज और विश्लेषण दिये । केंद्र की सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार और देश के उस प्रदेश के मुख्य सचिव की नियुक्ति ,जिसमें सभी दल चुनाव की तैयारी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाकर मैदान-ए-जंग मे कूद पड़े हैं ,मतलब उत्तर प्रदेश की सरकार ने अभी दो दिन पहले दीपक सिंघल जैसे बहुचर्चित आईएएस अधिकारी को नया मुख्य सचिव बनाया है ।
स बारे मे जो खबरें मीडिया मे आयीं, वो दो तरह की थीं । बक़ौल मीडिया -केंदीय मंत्रिमंडल मे शामिल किए गए नए मंत्रियों को लेकर मीडिया ने ज़्यादातर की जाति देखी ,खासकर जिन राज्यों मे चुनाव होने वाले हैं ,वहाँ प्रधानमंत्री ने जिस जाति के मंत्री को मंत्रिमंडल मे शामिल किया ,वहाँ तो उसकी जाति के वोटों को लुभाने के लिए  किया । मसलन उत्तर प्रदेश मे अपना दल की अनुप्रिया पटेल को कुर्मी वोटों की वजह से मंत्री बनाया गया । अनुप्रिया एक युवा और पढ़ी लिखी ,आधुनिक विचारों और जीवन शैली वाली ऐसी महिला है ,जिसे राजनीति विरासत मे मिली । उसके पिता सोने लाल पटेल ने अकेले ही बड़े-बड़े राजनीतिक सूरमाओं की हवा निकाल दी थी -अपनी जाति के मतदाताओं को एक जुट करके । तो यहाँ मीडिया ने अनुप्रिया को एक कुर्मी महिला का खिताब दिया । किसी ने भी यह नहीं लिखा कि एक सुशिक्षित युवा महिला को केंद्र सरकार मे ज़िम्मेदारी देकर भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को तरजीह दी, महिलाओं को तरजीह दी। दिल्ली के नामी लेडी श्रीराम कालेज से स्नातक और मनोविज्ञान की पढ़ाई करने के बाद प्रबंधन की डिग्री प्राप्त अनुप्रिया की ये सारी योग्यताएं एक जाति मे समाहित होकर वोट गंगा मे प्रवाहित हो गईं  ।
अजय टमटा-केंद्रीय मंत्री 
दूसरी तरफ उत्तरखंड मे एक लगभग युवा और कम पढे लिखे जाति से दलित और बिना बड़ी महत्वाकांक्षा के राजनीति मे एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे अजय टमटा की शिक्षा केवल 12वीं तक ही है ,बजाए इन सब बातों के अजय ट्म्टा मीडिया की नजर मे भाजपा के लिए दलित वोट का आधार स्तम्भ बने गए ,जबकि वह कपड़ा विभाग के राज्यमंत्री हैं, जिसकी बड़ी मंत्री एक अत्याधुनिक जीवन शैली वाली एक ऐसी महिला है जिसने टीवी और फिल्म कि दुनिया मे ही होश संभाला । यह भी कम विचित्र नहीं कि स्मृति ईरानी और अजय का तालमेल ,बन भी पाएगा या नहीं ,इससे अजय को तो तकलीफ नहीं होने वाली ,हां स्मृति ईरानी जरूर अक्सर माथे पर बल डाले दिखाई देंगी । उन्हें पहाड़ के दुर्गम इलाके का यह सीधा सादा नौजवान ,जिसने दिल्ली भी ठीक से सांसद बनने के बाद भी अभी देखी नहीं होगी ,व्यावहारिक रूप से स्मृति ईरानी के सामने या बराबर बैठने लायक खुद को बना भी पाएगा या नहीं ! यह एक सवाल अकसर सत्ता के गलियारों मे गूंजेगा ।
उत्तर प्रदेश के नए मुख्य सचिव दीपक सिंघल 
खिरी नाम है उत्तर प्रदेश के एक नामी आईएएस अधिकारी दीपक सिंघल का ,जिन्हें मुख्यमंत्री बेटे अखिलेश यादव ने पिता मुलायम सिंह और चाचा शिवपाल  सिंह यादव  के कहने पर इस ओहदे पर बैठाया । मीडिया ने इस खबर के साथ यह भी जोड़ा कि दीपक सिंघल एक "भ्रष्ट" अधिकारी हैं और टॉप टेन मे उनका नाम है । एक बनिए ,शुद्ध अग्रवाल बिरादरी के एक अफसर को तमाम जतियों और राजनीतिक समीकरणों को दर किनार करते हुये इस सबसे बड़ी कुर्सी पर बिठाया ,तो न तो किसी जाति की उपेक्षा हुयी ,न कोई वोट बैंक ढहा ,और न ही कोई वोट बैंक साधा गया ,बस एक भ्रष्ट अफसर को मुख्यमंत्री की असहमति के बाद भी सूबे का मुख्य सचिव बना दिया गया ,मीडिया की इन खबरों ने सत्ता के आगे नतमस्तक होकर न केवल अखिलेश को मसीहा बनाए रखने के साथ सवर्ण जाति के प्रति अपने एकतरफा नजरिए को ही उजागर नहीं किया,बल्कि अपना असली चेहरा दिखा दिया कि जातिवाद केवल सरकार और प्रशासन मे ही नहीं ,मीडिया मे उससे ज्यादा है । हाँ,यदि सिंघल की जगह कोई मुस्लिम या दलित या पिछड़ा वर्ग का अधिकारी होता तो यही मीडिया फौरन वोट बैंक साधता हुआ नजर आता । उसमें वोट दिखाई देते । पिछड़ा अधिकारी होता तो भाजपा की काट हो जाती और दलित होता तो मायावती पर अखिलेश का पहलवान पिता से विरासत मे मिला "राजनीति का पुट्ठी दांव" बन जाता । मगर बनिया और सवर्ण बिरदरी के अधिकारी के कच्चे और पक्के चिट्ठे और  ,बाकी सब का जनाधार मीडिया की लाइब्रेरियों मे रहते ही है ।
सहमति-असहमति के के बीच एक साथ-मुलायम,शिवपाल अखिलेश यादव !
दीपक सिंघल का बरेली से एक करीबी नाता रहा है । वह यहाँ डीएम भी रहे और कमिश्नर । एक अफसर की तरह कमरे मे बंद रहकर काम करना उन्हे पसंद नहीं है । वह शासन के प्रतिनिधि के तौर खुलकर और एक जिम्मेदार अधिकारी के तौर इस तरह काम करते हैं कि एक अफसर कम जननेता ज्यादा नजर आते हैं । उनके काम मे पारदर्शिता है । आम आदमी का दर्द है और सबसे बड़ी बात उन्हें नयी मिसाल कायम करने मे तनिक भी देर नहीं लगती । फैसले लेने मे वह एक बेहतर अधिकारी हैं । यही वजह है कि उनका तालमेल बढ़िया है ,जहा तक लोगों की बात हैं लोग तो कहेंगे ,उनका काम है कहना ! बाकी ईमान दार नेताओं और अफसरो की अगर सूची बन्ने के काम शुरू किया जाये तो एक पन्ना भी भरना मुश्किल हो जाएगा !
-आशीष अग्रवाल 

26/01/2016

नए वकीलों को मानदेय देने की तैयारी मे यू पी बार काउंसिल !


बरेली बार व्सोसियव्श्न की नयी कार्यकरिणी ,अध्यक्ष घनश्याम शर्मा,सचिव अमर भारती की टीम ने 26 जन वारी 2016 को गंतत्र दिवस के मौके पर अपना कार्यभार ग्रहण किया । 
समारोह के मुख्य अतिथि इलाहाब्द हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कालीमुल्लाह का स्वागत करते जिला जज बरेली ,श्री ए के सिंह ,साथ मे बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट घनश्याम शर्मा । 
मुख्य अतिथि जस्टिस क्लीमुल्लाह का स्वागत करते बार एसोसिएशन के सचिव एडवोकेट अमरभारती । 
जस्टिस क्लीमुलाह का स्वागत करते हुये वारिस्थ पत्रकार व एडवोकेट आशीष अग्रवाल । 






जस्टिस क्लीमुल्लाह का स्वागत करते हुये एडवोकेट ममता गोयल ,साथ मे बार एसोसिएशन के अध्यक्ष घनश्याम शर्मा । 



समारोह मे पहुंचे पूर्व सांसद वीरपाल सिंह (सपा),व प्रवीण सिंह एरन (कांग्रेस ),बीच मे पत्रकार व एडवोकेट आशीष अग्रवाल । 
जस्टिस कलीमुल्लाह से भोजन के दौरान वार्ता करते हुये पत्रकार व एडवोकेट आशीष अग्रवाल । 

जस्टिस कालीमुलाह के साथ वार्ता करते हुये वरिष्ठ एडवोकेट और बरेली के पूर्व DGC (Criminal ) राजेश सिंह यादव । 


शपथ ग्रहण समारोह मे उपस्थित बरेली का अधिवक्ता समुदाय । 











ह एक खास बात है कि बरेली बार एसोसिएशन की नयी कार्यकारिणी उसी दिन शपथ लेती है जिस दिन देश को पूर्ण गणराज्य का दर्जा मिला । इस ऐतिहासिक दिन के संयोग पर मुख्य अतिथि जस्टिस कलीमुल्लाह ने भी सराहा । 
रेली बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी ,नए अध्यक्ष घनश्याम शर्मा और सचिव अमर भारती की टीम ने 26 जनवरी को गणतन्त्र दिवस के मौके पर अधिवक्ताओं और संगठन के हित मे काम करने की शपथ ले ली । बरेली के पूर्व जिला जज और इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस कालीमुल्लाह ने बरेली बार एसोसिएशन के सभी पदाधिकारियों को एक साथ शपथ दिलाई ।
स मौके पर आए बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा सदस्य एडवोकेट बलवंत सिंह ने कई खास ऐलान किए -जिसमें नए वकीलों को शुरुआती दौर मे कुछ वर्षों तक प्रशिक्षु भत्ता देने की बात खास है । इसके अलावा उन्होने नए वकीलों के लिए आल इंडिया बार काउंसिल द्वारा लगाई जा रही एक और परीसखा पास करने की बाध्यता के खिलाफ बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती की मुहिम से सहमति प्रकट करते हुये बताया कि बार काउंसिल आफ यू पी भी इस बारे मे सहमत नहीं है और यही प्रयास है तीन साल की विधि परीसखा पास करने के बाद किसी भी युवा को दोबारा परीक्षा न देनी पड़े ,आखिर ऐसी परीक्षाओं के बाद विश्वविद्यालयों की परीक्षा का क्या महत्व रह जाएगा ?
मारोह मे सचिव अमर भारती संक्षिप्त और सारगर्भित संचालन के दौरान ही प्रखर राजनेता की भूमिका मे नजर आए ,वहीं अपनी चिर परिचित शैली मे अध्यक्ष घनश्याम शर्मा ने चंद शब्दों मे ही अपनी बात करके भविष्य के इरादे का संकेत दे दिया कि बोलने से ज्यादा करके दिखया जाए ,यह सही है बरेली के विशाल अधिवक्ता समाज को उनसे बेहद उम्मीदें हैं । तमाम वक्ताओं के भाषों मे जहां शेरो शायरी की बहुतायत रही वहीं ,पूर्व डीजीसी क्रिमिनल Rajesh Singh Yadav एक मात्र ऐसे अधिवक्ता रहे जिनका भाषण पूरी तरह बार और बेंच के बीच की व्यावहारिक दिक्कतों और कानून पर केन्द्रित रहा । समारोह मे बार के निवर्तमान अध्यक्ष विनोद कुमार श्रीवास्तव की अनुपस्थिति कुछ खली जबकि बार काउंसिल आफ यू पी के सदस्य और अधिवक्ता Shirish Mehrotra झण्डा रोहण के बाद नहीं दिखाई दिये ! वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कवि,साहित्यकार स्व राम प्रकाश गोयल की पुत्री ममता गोयल एडवोकेट भी समारोह मे पहुंची !

-आशीष अग्रवाल 

20/12/2015

वकीलों के हक मे बरेली से शुरू हुई बड़ी जंग मे पहली जीत !

प्रो वसीम बरेलवी की इस नज़्म को अमर भारती ने हकीकत मे बदल दिया है 
वरिष्ठ अधिवक्ता घनश्याम शर्मा 
"बार एसोसिएशन के मौजूदा सचिव अमर भारती की याचिका पर इलाहाबद हाईकोर्ट ने विगत दस दिसंबर को एक आदेश जारी किया है ,जिसमें उनकी दलीलों को फौरी तौर अपर अदालत ने स्वीकार करते हुये मामले की सुनवाई के लिए अब 12 जनवरी की तारीख तय कर दी है । इस मुद्दे पर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के उम्मीदद्वार एडवोकेट घनश्याम शर्मा की भी नाइत्तेफकी नहीं है । श्री शर्मा कहते हैं कि वकीलो के हितों के लिए चाहे किसी हद जाना पड़े हम पीछे नहीं हटने वाले नहीं हैं । आखिर आम आदमी को इंसाफ दिलाने के लिए जब वकील कोई कसर नहीं छोडते तो उनके खुद के लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी लड़ाई से पीछे हटने का सवाल ही नहीं । अमर भारती कहते हैं यह कहाँ की तुक है कि बार काउंसिल आफ यूपी का चुनाव पाँच साल और जिलों की एसोसिएशन का कार्यकाल एक साल का ?जिले मे अध्यक्ष 25 साल की स्टैंडिंग पर चुनाव लड़ेगा ,और मौजूदा बार काउंसिल के अध्यक्ष मात्र तीन-चार साल की प्रैक्टिस के बाद ही बन गए हैं।बस हमारी लड़ाई जिले और तहसीलों के वकीलों के हक मे है,जो उनके मान सम्मान और आर्थिक हितों के साथ उनके भविष्य के लिए भी । 
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर प्रो वसीम बरेलवी की यह नज़्म मौजूदा समय मे बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती  ने हकीकत मे चरितार्थ कर दी है । अमर भारती वकालत का पेशा विरासत मे मिला । उनके पिता श्री रवीद्र भारती एडवोकेट बरेली के एक नामी वकील रहे । उनके बेटे अमर भारती ने जब पहली बार ने सन 2000 से बरेली बार एसोसिएशन मे बतौर कनिष्ठ उपाध्यक्ष कदम रखा और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा । फिलहाल वह पिछले करीब दस सालों से बार एसोसिएशन के सचिव चुने जा रहे हैं । बार एसोसिएशन के सचिव की हैसियत अमर भारती एडवोकेट ने अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी के तहत एक बड़ी लड़ाई छेड़ दी है । यह लड़ाई सरकार से नहीं ,बल्कि अपनी ही उस संस्था से है, जो सदियों से वकीलों के लिए एक मात्र नियामक और नियंत्रक संस्था है ,यही वह संस्था है जो कानून की पढ़ाई करने के बाद वकील के रूप मे पंजीकरण करीत है और वकीलों की नकेल मे अपने हाथ मे रखती है । बार काउंसिल वकीलों के लिए एक बहुत बड़ा हौसला है मगर यह हौसला कितना खोखला है ,अमर भारती ने इसी गलत फहमी के खिलाफ जंग छेड़ दी है ।
भारतीय लोकतन्त्र का महत्वपूर्ण स्तम्भ न्यायपालिका का अभिन्न अंग कहे जाने वाले वकीलों की सबसे बड़ी नियंत्रक और नियामक संस्था बार काउंसिल आफ इंडिया के बाद राज्यों मे इसकी ज़िम्मेदारी बार काउंसिल की होती है ,जिसका गठन बाकयदा एक अधिनियम के तहत किया गया है।राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर यही संस्थाएं वकीलों के पंजीकरण से लेकर उनके हितों और अस्तित्व की रक्षा की लड़ाई लड़ती हैं । अधिवक्ता अधिनियम 1961 के बाद से आज यह पहला मौका है जब किसी वकील की तरफ से ही बार काउंसिल के किसी आदेश को चुनौती मिली है ।पहले भी बार काउंसिल ने कुछ और मुद्दों पर अपना कदम पीछे हटाया है मगर इस बार कि बरेली से मिली यह चुनौती ही देश भर के वकीलों की दशा और दिशा बदलने की दिशा मे मील का पत्थर साबित होगी । बात सिर्फ इतनी नहीं है ,बरेली की बार एसोसिएशन ने इन कुछ मुद्दों के साथ और भी सवाल उठाए हैं जिनसे यू पी बार काउंसिल को कम से कम आईना तो दिखता ही है । उन्होने इसीलिए अपनी बात काउंसिल से निराश हकार सीधे हाईकोर्ट के सामने रखी है । 
हालांकि मुद्दा केवल बरेली बार एसोसिएशन के चुनाव का था ,मगर इसी बहाने बात कुछ ऐसी बन गयी जिसने एक ऐसे मुद्दे का रूप ले लिया है जो आज नहीं तो कल राष्ट्रीय स्तर पर वकीलों की आने वाली पीढ़ी के साथ, उन सारे वकीलों के लिए बहुत बड़ी उम्मीद्द की किरण होगी जो दूसरों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ते लड़ते ,खुद से हार गए ! ऐसे मे वाकई बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती नयी पीढ़ी के वकीलों के लिए एक उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं ।
बार एसोसिएशन के चुनाव और कार्यकाल की एक जरा सी बात इतना बाद रूप लेगी इसका अंदाजा अमर भारती को  भी नहीं था ,मगर बात आगे बढ्ने पर किसी भी हालत मे पीछे न हटने का उनका संकल्प आने वाले वक्त मे बहुत बड़ा गुल खिलाने वाला है ,इसमें दो राय नहीं ।अमर भारती के मन मे बेहद गुस्सा है ,बार काउंसिल की नीतियों के खिलाफ -जो हर तरफ से जिले के वकीलों के प्रति भेदभाव और उपेक्षा और दोयम दर्जे के व्यवहार को साफ परिलक्षित करती हैं । 
"बार एसोसिएशन के मौजूदा सचिव अमर भारती की याचिका पर इलाहाबद हाईकोर्ट ने विगत दस दिसंबर को एक आदेश जारी किया है ,जिसमें उनकी दलीलों को फौरी तौर अपर अदालत ने स्वीकार करते हुये मामले की सुनवाई के लिए अब 12 जनवरी की तारीख तय कर दी है । इस मुद्दे पर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के उम्मीदद्वार एडवोकेट घनश्याम शर्मा की भी नाइत्तेफकी नहीं है । श्री शर्मा कहते हैं कि वकीलो के हितों के लिए चाहे किसी हद तक जाना पड़े। अमर भारती कहते हैं "यह कहाँ की तुक है कि बार काउंसिल आफ यूपी का चुनाव पाँच साल और जिलों की एसोसिएशन का चुनाव एक साल का ? जिले मे अध्यक्ष 25 साल की स्टैंडिंग पर चुनाव लड़ेगा ,और मौजूदा बार काउंसिल के अध्यक्ष मात्र तीन चार साल की प्रैक्टिस के बाद ही बन गए हैं । कोई छोटे से कागज पर किसी वकील के खिलाफ शिकायत बार काउंसिल को भेज दे और बस इसी पर बार काउंसिल उस वकील को किसी भी जिले मे अपनी होने वाली बैठक मे तलब कर लेती है और आखिरी क्षण मे वह बैठक रद्द हो जाती है ,ऐसे मे आर्थिक तंगी झेल रहे वकील पर क्या गुजरती होगी होगी जब उसे स्टेशन से ही वापस लौटना पड़ता है ! अजीब मज़ाक है !मान समान का तो प्रश्न ही अभी पैदा नहीं हुआ है -हम किसी के खिलाफ नहीं हैं,बस हमारी लड़ाई जिले और तहसीलों के वकीलों के हक मे है जो उनके मान समान और आर्थिक हितों के साथ उनके भविष्य के लिए भी है ।
जाना पड़े हम पीछे नहीं हटने वाले नहीं हैं । आखिर आम आदमी को इंसाफ दिलाने के लिए जब वकील कोई कसर नहीं छोडते तो उनके खुद के लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी लड़ाई से पीछे हटने का सवाल ही नहीं ।
रअसल बात अगर बार एसोसिएशन  और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के बीच होती तो तो भी ठीक था ,मगर उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने एक छोटी सी बात को हाईकोर्ट तक पहुंचा कर इसे नया मोड दे दिया । हालांकि इसकी वजह सिर्फ यही थी अपने हक मे वकीलों ने आज तक सिर्फ अपना अस्तित्व बार काउंसिल के हवाले करके अपना जीवन वाकई कानून के हवाले कर दिया और कानून ने कभी पलट कर नहीं देखा कि आखिर वकीलों की हालत क्या है ? अमर भारती का सवाल है -चार साल ही वकालत के पेशे मे आने पर बार काउंसिल का अध्यक्ष के चुनाव की हर्ता हो सकती है तो फिर प्रदेश भर की बार एसोसिएशन (जिले की ) मे यह 25 साल होना कहाँ तक न्याय संगत है ? यही नहीं 2012 मे एक ऐसा प्रस्ताव पारित कर दिया गया कि 2010 2के बाद एलएलबी की पढ़ाई करने करने वाले बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश मे एक वकील के तौर पर पंजीकृत तो हो जाएंगे मगर ,उन्हें अपने जिले की बार एसोसिएशन मे वोट देने का अधिकार भी नहीं होगा और न ही वह सीधे किसी अदालत मे प्रैक्टिस भी नहीं कर सकते ! बस इन्हीं बातों ने अमर भारती को इस कदर झकझोर दिया कि उन्होने अपने इससे पूर्व के कार्यकाल मे बरेली की बार एसोसिएशन को एक अलग सोसाइटी के रूप  मे पंजीकृत करके कम से कम बरेली के उन हजारों युवाओं का भविष्य पर छाया कुहासा छाँट दिया, जो एक वकील के रूप मे पंजीकृत होने के बाद भी उनका हौसला तोड़ देने वाला था । 
क बड़ा मुद्दा बार एसोसिएशन के चुनाव और निर्वाचित कार्यकारिणी के कार्यकाल का था । बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश का चुनाव उसकी स्थापना से पाँच साल के लिए होता है ,यही आज भी है ,मगर इसी बार काउंसिल ने जिलों की बार एसोसिएशनों के लिए यह कार्यकाल एक साल कर रखा है। तमाम वकीलों का यह एक बड़ा सवाल था एक साल के कार्यकाल मे कौन सी बार एसोसिएशन अपने वकीलों के हितों पर ध्यान दे सकती है ?आखिर यह भेदभाव पूर्ण व्यवस्था क्यों? इसी के खिलाफ उन्होने बरेली की बार एसोसिएशन को एक अलग पंजीकृत संस्था के रूप मे स्थापित करके अपणी अलग नियमावली बना ली । और जिसमे कार्यकाल दो साल कर निर्धारित कर लिया गया है । यह उनका सवाल है इस पर बार काउंसिल को आपत्ति क्यों? बार काउंसिल जिले स्तर या प्रदेश स्तर के वकीलो के हक मे कितना कुछ कर पायी है -इसके बार मे कुछ कहने के बजाए अमर भारती कहते हैं इसका जवाब प्रदेश भर के वकील ज्यादा बेहतर दे सकते हैं । अमर भारती बताते हैं कि हमने अपने फैसले की जानकारी बार काउंसिल कू पूर्ण सम्मान देते हुये बाकायदा प्रदान कि और उन्होने हमे उस पर अपनी तात्कालिक सहमति भी दी ,मगर हाल मे बरेली के जिला जज को एक सूचना भेज कर हमे चुनाव कराने से रोकने की कोशिश भी की गयी और ऊपर से तुर्रा यह कि पदाधिकारी रह चुके लोग चुनाव नहीं लड़ सकते !आखिर बार का अंदरूनी मामला बेंच को भेजने का क्या औचित्य है ? बार काउंसिल बार और वकीलों की है या बेंच की ?यह भी एक नया सवाल खड़ा कर दिया गया है । बार और बेंच रेल की पटरियाँ है ,जो जुड़ गईं तो गाड़ी नहीं चलेगी !
ह भी कम हैरत की बात नहीं है कि बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी वैसे तो पूरे प्रदेश के वकीलों के हितों के संरक्षण और संवर्धन की है ,मगर आज तक प्रदेश के वकील काउंसिल से नाउम्मीद ही हुये हैं ,और यही वजह रही कि बरसों से वकीलों के भीतर घुमड़ रही चिंगारी की तपिश को अमर भारती ने बड़ी शिद्दत के साथ महसूस किया और उसे हवा देकर एक ऐसी चिंगारी बना दिया है जो आने वाले दौर मे न केवल उत्तर प्रदेश के, वरन देश भर के वकीलों को अपने हितों को किसी और के हाथों गिरवी रखने का मौका नहीं देगी । 
रअसल हुआ यह कि बार काउंसिल आफ इंडिया ने एक फैसला लिया  कि 2010 के बाद से एलएलबी की डिग्री हासिल करने वाले एक वकील के तौर पर अपना पंजीकरण तो करा लेंगे ,मगर वकालत करने के लिए उन्हें आल इंडिया बार काउंसिल का एक इम्तिहान और पास करना होगा ।इसके साथ ही पंजीकरण शुल्क भी बढ़ा कर 12-13 हजार कर दिया गया । यही नहीं इसके पहले भी कानून की डिग्री ले चुके लोग बढ़ती उम्र मे अपना वकील के रूप मे पंजीकरण कराएं तो उन्हें भी इसका अधिक शुल्क देना पड़ेगा । यह फैसले लागू भी हो गए । यहाँ तक तो सब ठीक था ,मगर जिलों मे बार एसोसिएशन को संबद्धता प्रदान कने वाली यू पी बार काउंसिल ने खुद के लिए अलग और जिलों के लिए अलग नियम बना रखे हैं,बस यही बात एक आग के रूप मे अमर भारती को कचोट रही थ जिसके खिलाफ उन्होने बहुत धीरे से जंग का अघोषित ऐलान 2012 मे बार एसोसिएशन के सचिव चुने जाने के बाद कर दिया । जिलों की बार एसोसिएशन का कार्यकाल एक साल का चला आ रहा है ,मगर अमर भारती ने बरेली की बार एसोसिएशन को अपनी एक अलग संस्था के रूप मे पंजीकृत करा के अपना संविधान बना लिया और संबद्धता जरूर यू पी बार काउंसिल से रखी । उसके बाद उन्होने सालाना चुनाव नहीं कराये और बार एसोसिएशन का कार्यकाल दो साल का कर लिए। जिसे बड़ी संख्या मे वकीलों का समर्थन भी मिला । बार काउंसिल भी इस मुद्दे पर चुप रही । उसने कोई दखल नहीं किया । इसके ठीक विपरीत यू पी बार काउंसिल का चुनाव पहले से ही पाँच साल के लिए है । 
देश भर मे वकीलों की नियामक संस्था बार काउंसिल आफ इंडिया है । बार काउंसिल आफ इंडिया ही राज्यों मे बार काउंसिल को संबद्धता प्रदान करने के साथ कानून की पढ़ाई करके वकालत करने वालों का पंजीकरण करके उन्हेन्बाक्यड़ा विधि  व्यवसाय करने की अनुमति प्रदान करती है । यहाँ कहने मे कोई संकोच नहीं है बार काउंसिल मात्र यही एक काम करके वकीलों को शेष जीवन के लिए अपने हकों की लड़ाई लड़ने का हक एक तरह से गिरवी रख लेती है । एक वकील की तो क्या कहें देश भर मे राज्यों और जिलों की बार एसोसिएशन की आज तक हिम्मत नहीं हयी कि वह बार काउंसिल से एक वकील के हक मे कुछ आवाज़ उठाने को सुझाव भी दें ! यह भी कम हैरत की बात नहीं है कि बार काउंसिल एक वकील के खिलाफ जरा सी भी शिकायत सुनने के लिए आतुर रहती हैं और इस शिकायत के नाम पर वकीलों को यदा कदा लंबी और निरर्थक और लंबी  यात्राएं भी करनी पड़ जाती हैं । दूसरों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले और कभी कभी जनहित याचिकाओं के जरिये समूचे समाज के खुद के किसी स्वार्थ के बिना कानून से लड़ जाने वाले खुद कितने कमजोर हैं ,बस इसी दर्द के एहसास ने बरेली बार एसोसिएशन के सचिव अमर भारती को न केवल झकझोर दिया बल्कि हालत बदलने की पहल का रास्ता खोजने को मजबूर  भी कर दिया ,जिसके पहले पड़ाव मे उन्हें आगे का रास्ता लंबा मगर साफ दिखाई दे रहा है । 
मर भारती ने जिस तरह से धीरे धीरे कदम बढ़ाकर जो एक बड़ी जंग छेड़ी है उससे न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश के अन्य राज्यों और इलोन की बार एसोसिएशनों को भी आज नहीं तो कल अँग्रेजी सोच पर आधारित अपने उन कड़े कानूनों ओ बदलना पड़ेगा जो एक वकील के हौसले और आत्मसम्मान के लिए बहुत जरूरी है । ऐसे मे युवा पीढ़ी को इस बेहद सम्मानजनक और न्याय व्यवस्था के आधार स्तम्भ पेशे की गरिमा को बनाए रखने मे भी सहूलियत होगी ।
                                                                                                      -आशीष अग्रवाल 
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD 

Court No. - 39 
Case :- WRIT - C No. - 65946 of 2015 
Petitioner :- Bareilly Bar Association & Another 
Respondent :- Bar Council Of U.P. & 2 Others 
Counsel for Petitioner :- Subodh Kumar,Udit Chandra 
Counsel for Respondent :- Ashutosh Dwivedi 

Hon'ble Dilip Gupta,J. 
Hon'ble Mukhtar Ahmad,J. 
This petition seeks the quashing of the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman, Bar Council of Uttar Pradesh by which the amendments made in the bye-laws of the Bareilly Bar Association have been declared void ab initio and rejected. The petitioners have also sought the quashing of the communication dated 28 November 2015 sent by the Secretary of the Bar Council of Uttar Pradesh to the District Judge, Bareilly for implementation of the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman of the Bar Council of Uttar Pradesh. 
It is the submission of the learned counsel for the petitioners that the amendments were carried out in the Constitution of the Bareilly Bar Association in accordance with the procedure prescribed and were dully approved by the Assistant Registrar, Firms, Societies and Chit Funds, Bareilly. Learned counsel has also pointed out that in terms of the Constitution of the Bareilly Bar Association there was no necessity at all of seeking approval of the Bar Council of Uttar Pradesh before making any amendments in the Constitution. In support of his contention learned counsel has placed reliance upon a Division Bench judgment of this Court passed in Writ C-No. 42417 of 20151 . 
Learned counsel appearing for the Bar Council of Uttar Pradesh, however, has placed reliance upon the provisions of clause- 53 of the bye laws and has submitted that the Executive Committee could, from time to time, frame bye-laws but the said bye-laws framed would not be effective till they were approved by the Bar Council. It is, therefore, his contention that if any amendment is made in the bye-laws it cannot be effective until it is approved by the Bar Council. The submission, therefore, is that the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman of the Bar Council does not suffer from any illegality. 
Shri Ashutosh Dwivedi has put in appearance on behalf of respondent nos. 1 and 2. 
Learned counsel for the petitioners has, however, pointed out that the clause on which learned counsel for the respondents have placed reliance, was amended subsequently and the amended clause-53 provides that the Executive Committee may, from time to time, frame bye-laws for the purpose of carrying of the objects of regulating the activities of the Association. 
We are of the prima facie opinion that the Chairman of the Bar Council of Uttar Pradesh had no jurisdiction to annul the amendments that had been made in the Constitution of Bareilly Bar Association, particularly when the Assistant Registrar, Firms, Societies and Chit Funds, Bareilly had approved the amendments made in the bye-laws on 18 December 2014. Accordingly, the operation of the order dated 13 July 2015 passed by the Chairman, Bar Council of Uttar Pradesh shall remain stayed and the implementation of the consequential communication dated 28 November 2015 sent by the Secretary of the Bar Council of Uttar Pradesh to the District Judge, Bareilly shall also remain stayed. 
Issue notice to respondent no.3 by registered post. Steps be taken within a week. 
Respondents may file their counter affidavits within two weeks. Rejoinder affidavit, if any, may be filed within a week thereafter. 
List this petition for admission/ hearing on 12 January 2016. 
Order Date :- 10.12.2015 
Fhd. 
(Dilip Gupta, J.) 
(Mukhtar Ahmad, J.) 

03/12/2015

गजब की नेतृत्व क्षमता है विपिन धूलिया में !

National Secretary IFWJ Vipin Dhuliya  
" सन 1982 मे दिल्ली से जनसत्ता शुरू होने के बाद उस के तेवरों ने बेशक पत्रकारिता को नए आयाम दिये ,मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे विपिन धूलिया पहले पत्रकार थे जिसने उससे भी आगे बढ़कर मौलिकता के साथ अखबार और खबरों के साथ पत्रकारों के हितों के मोर्चे पर एक साथ काम किया । इस सबसे अलग उन्होने कभी किसी पत्रकार के अनुचित व्यवहार या खबर को प्रश्रय नहीं दिया ।बल्कि पत्रकारों की नयी पीढ़ी को तैयार करने में उनकी हमेशा रूचि रही,जो अब IFWJ में भी  दिखाई देगी।  "

त्तर भारत के पत्रकारों मे विपिन धूलिया एक जाना पहचाना नाम है। करीब बीस साल बाद वह फिर अब चर्चा मे आए हैं, जब उन्हें हाल मे ही मथुरा मे हुये महासंघ के सम्मेलन मे  भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ (IFWJ )के राष्ट्रीय सचिव की कमान सौंपी गयी है ,इस दायित्व् के साथ उन्हें महासंघ के मुख्यालय का भी प्रभारी बनाया गया है । ट्रेड यूनियन और जनहित के मुद्दों पर उनके भीतर की खलबली को मैंने बड़े नजदीक से महसूस किया है ।अपने पेशे के साथ आम जन की हितों पर उनके भीतर की आग को उन्होने अपनी कलम की धार से न केवल आवाज़ दी बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे पत्रकारिता की दशा और दिशा को बदलने मे उनका बहुत बड़ा योगदान है । अपने साथियों के लिए वह हमेशा एक प्रेरणा स्रोत बने और सबसे आश्चर्य की बात यह कि उन्होने पत्रकारिता के पेशे मे आने की ललक रखने वाले किसी भी उम्र के उत्साही व्यक्ति को हतोत्साहित नहीं किया ।
हां बस गए वहीं रम गए ,यह उनका स्वभाव है।उन्होने अपनी पेशेगत जिम्मेदारियों को बखूबी  निभाया । शायद यही वजह रही कि बरेली अमर उजाला से सीधे राष्ट्रीय  न्यूज़ एजेंसी पीटीआई की हिन्दी सेवा ' भाषा ' जब शुरू हुयी तो पहले ही बैच मे उन्हें सीधे उपसंपादक बनाया गया। वहाँ के प्रथम संपादक और वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक की टीम के वह एक जिम्मेदार सदस्य बने और फिर पेशे मे ऐसे रमे कि ट्रेड यूनियन से जुड़े रहने के बावजूद उनकी सक्रियता पत्रकारिता मे ही ज्यादा रही ,वजह उन्हें नित नयी नयी ज़िम्मेदारी मिलती रही और इसके बाद कई टीवी चैनल लांच करने के साथ उन्हें सहारा टीवी मे भी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना पड़ा । पत्रकारिता और ट्रेड यूनियन दोनों मोर्चों पर उनकेव्यक्तित्व में आकर्षण के साथ एक बेबाकी और आक्रामकता उनकी ख़ास पहचान है।
स समय इलेक्ट्रानिक मीडिया मे कोई खबर आ जाना बहुत बड़ी बात थी , उन्होने इस क्षेत्र मे भी नया और क्रांतिकारी कदम उठाया । नीतियों मे परिवर्तन करके कस्बों और तहसीलों के पत्रकारों की बहुत बड़ी टीम बनाकर सहारा टीवी पर कस्बों और शहरों की हर छोटी-छोटी खबर को राष्ट्रीय बना दिया । उस समय ये खबरें टीवी की स्क्रीन पर नीचे एक स्ट्रिप के रूप मे चलती थी । यह एक ऐसा कदम था, जिसने इलेक्ट्रानिक मीडिया की दिशा बदल दी और इसके बाद लगभग सभी टीवी चैनलों को क्षेत्रीय पत्रकारिता की ओर रुख करना पड़ा।  जिसका नतीजा है कि आज छोटे छोटे कस्बों मे टीवी चैनलों के पत्रकार हैं । इससे भी ज्यादा  महत्वपूर्ण बात यह रही कि छोटे कस्बों के पत्रकारों को उनकी ही पहल पर आर्थिक संरक्षण मिला । प्रबंधन को मजबूरन उनकी बात माननी पड़ी । नतीजतन पेशेवर पत्रकारों की एक बहुत बड़ी टीम कहें या पीढ़ी तैयार हो गयी जो आज भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का आधार स्तम्भ है ।
विपिन धूलिया के व्यक्तित्व मे एक गज़ब का आकर्षण और एक अद्भुत नेतृत्व क्षमता है । पत्रकारिता उनकी पहली प्राथमिकता तो ट्रेड यूनियन उनका सपना -दोनों मोर्चों पर उन्होने अपने शुरुआती दौर मे साथ साथ काम किया । उन्होने कभी किसी को किसी भी तरह के पूर्वाग्रह  से नहीं देखा । पत्रकारों के हितों के लिए संघर्ष मे युवावास्था से ही आगे बढ्ने की चाह  रखने वाले विपिन धूलिया ने सन 1984 में श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की सुप्त पड़ी बरेली इकाई को सक्रिय किया और बहुत कम समय मे ही बरेली मे एक यू पी इकाई का सम्मेलन कराने के बाद बहुत जल्दी ही नैनीताल मे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ की राष्ट्रीय कार्यपरिषद का सम्मेलन अपने दम पर आयोजित करने का भी प्रण किया और उसे पूरा भी किया। यह सम्मेलन श्रमजीवी पत्रकार महासंघ के लिए इस मायने मे यादगार बना कि उस दौरान उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र (कुमायूं और गढ़वाल मण्डल -वर्तमान उत्तराखंड प्रदेश ) के सभी जनपदों मे यूनियन की सक्रियता हुयी और बहुत सारे लोग उस समय पत्रकारों के इस सबसे बड़े संगठन से जुड़े । हालांकि यह कोई सामाजिक उपलब्धि नहीं कही जाएगी मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अब उत्तराखंड राज्य के पत्रकारों के लिए वह उस समय बहुत बड़ी उम्मीद की किरण बनकर उभरे । बात पत्रकारों के वेतनमान और आर्थिक हितों की हो या उनकी सुरक्षा की,धूलिया जी ने हमेशा आगे बढ़कर पत्रकारों को हिम्मत दी और उस दौरान इस सारे इलाके मे पत्रकारों  के भीतर आत्मसमान और सुरक्षा का एक ऐसा भाव आया,जिससे पत्रकारों के बीच नया नेतृत्व उभरा । उत्तराखंड और पश्चिमी  उत्तर प्रदेश  जिलों में  इकाइयां सक्रिय हुईं। इसका नतीजा यह हुआ कि पत्रकारों के दूसरे संगठन एनयूजे और उसकी उत्तर प्रदेश इकाई की सक्रियता भी और बढ़ी ।एक स्वस्थ प्रतियोगी माहौल ने पत्रकारों  की गरिमा बढ़ाई ।
मैं धूलिया जी को तब से जनता हूँ,जब वह बरेली अमर उजाला मे  आए थे जब मैं 1984 मे अपनी एलएलबी की पढ़ाई कर रहा था और छत्र और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ा हुआ था । वह उस समय अमर उजाला मे एक रिपोर्टर थे । अक्सर अपने आंदोलनो की खबर लेकर मैं अमरउजाला के दफ्तर जाता था -साथियों के साथ ! मेरी लिखी खबर को पढ़ने के बाद उन्होने मेरा परिचय मेरे भीतर के पत्रकार से करवाया । मैं हतप्रभ था । हमारे द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों पर उन्होने  एक पत्रकार की नजर से काम किया और लोगों को इंसाफ मिला । और उनकी सतत प्रेरणा से मैंने अपना एलएलबी का परिणाम आने के बाद बजाए वकालत के , 28 अक्तूबर 1985 को अमरउजाला में एक प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में काम शुरू किया । इतना ही नहीं उन्होने ही मुझे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ से जोड़ा और जिले से लेकर राष्ट्रीय परिषद तक के लिए सदस्य चुने जाने का अवसर भी मुझे मिला । कई बार उनके साथ कई राज्यों की यात्राएं आज भी मेरे जीवन के सुखद संस्मरण हैं । हालांकि दिल्ली जाने के बाद भी मेरा उनसे सतत संपर्क बना रहा । उनके संपर्क मे मैं अकेला नहीं था ,और भी बहुतेरे पत्रकार थे जिनसे उनके संबंध सदैव मधुर बने रहे ।
मुझे याद है कुछ निहित स्वार्थी संगठनों के हितों पर चोट होने की वजह से एक बार तो पूरे बरेली मे उनके खिलाफ  एक ऐसा माहौल बना कि  दीवारों पर उनके खिलाफ नारे लिखे गए ,मगर उस दौरान सच्चाई और पेशेगत ईमानदारी के चलते अमरउजाला प्रबंधन उनके साथ खड़ा था । अमर उजाला के तत्कालीन संपादक श्री अशोक अग्रवाल और स्व. अतुल माहेश्वरी जी के निर्देशन मे एक तरफ जहा उन्होने अपनी कलम को  धार दी वहीं अखबार ने भी करवट ली । उनकी खबरें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के लिए सबक बनी ,लिहाजा इस समूचे इलाके की पत्रकारों की भाषा ही बदल गयी । सन 1982 मे दिल्ली से जनसत्ता शुरू होने के बाद उस के तेवरों ने बेशक पत्रकारिता को नए आयाम दिये ,मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे विपिन धूलिया पहले पत्रकार थे,जिसने उससे भी आगे बढ़कर मौलिकता के साथ अखबार  और खबरों के साथ पत्रकारों के हितों के मोर्चे पर एक साथ काम किया । इस सबसे अलग उन्होने कभी किसी पत्रकार के अनुचित व्यवहार या खबर को प्रश्रय नहीं दिया । बल्कि पत्रकारों की नयी पीढ़ी को तैयार करने में उनकी हमेशा रूचि रही,जो अब IFWJ में भी  दिखाई देगी।
मरउजाला के उस समय  मात्र दो ही एडिशन थे -आगरा और बरेली । यही दोनों एडिशन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आवाज़  हुआ करते थे । संचार और तकनीक के सीमित युग मे उन्होने रिपोटिंग और अखबार को नए तेवर दिए  ,इसमे दो राय नहीं। नवीनतम तकनीक अपनाने मे अमर उजाला कभी देश के नामी और बड़े कहे जाने अखबारों से पीछे नहीं रहा ,उस दौर की पत्रकारिता को लोग आज भी याद करते हैं और विपिन धूलिया भी अपने उस कार्यकाल को कभी भूल नहीं पाएंगे,बरेली उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है । बीते 25 सालों पत्रकारिता मे ही रमे  विपिन धूलिया का जीवन के इस पड़ाव मे सबसे बड़ा दूसरा सपना पूरा होने  जा रहा है ,उनका सपना था भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ के शीर्ष नेतृत्व मे शामिल होकर संगठन को नयी दिशा देना, जिससे देश भर के पत्रकारों के हितों मे कुछ सार्थक काम किया जा सके ,वह घड़ी अब आ गयी है ,और विपिन धूलिया जीवन के दूसरे दौर मे फिर एक नए मोर्चे पर तैनात हैं ! निश्चित तौर पर भारतीय श्रमजीवी पत्रकार महासंघ को नए बदलाव से नयी दिशा मिलेगी और संगठन फिर से अपना गौरव शैली इतिहास लिखने की और बढ़ेगा।
-आशीष अग्रवाल 

07/11/2015

बदलेगी ड्राइविंग लाइसेन्स की प्रक्रिया !


मेरे सुझाव का परीक्षण शुरू !

अक्सर अंग्रेजों के जमाने के कानून ,और उसके बाद कांग्रेस के बनाए अपने हितों वाले आम आदमी को अमानित करने वाले कानून मुझे कचोटते हैं ,इन्हीं सब मामलों पर मैं गाहे बगाहे केंद्र व राज्य सरकारों को लिखता रहता हूँ । मैंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को ड्राइविंग लाइसेन्स की प्रक्रिया को सुविधा जनक करने के लिए सुझाव दिया था ,जिसे सिद्धांततः स्वीकार कर लिया गया है । केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय मे मेरे सुझाव पर परीक्षण चल रहा है । यह सूचना मुझे कल मिली ।
प्रधानमंत्री कार्यालय से प्राप्त और मेरे द्वारा भेजे गए सुझाव को ज्यों का त्यों नीचे दे रहा हूँ !
Registration Number :MORTH/E/2015/00746
Name Of Complainant:Asheesh K Agarwal
Date of Receipt : 02 May 2015
Received by : Ministry of Road Transport and Highways
Forwarded to : RT Wing MVL Section
Contact Address :1, Parliament Street, Transport Bhawan,
New Delhi110001
Grievance Description :


महोदय ,
ड्राइविंग लाइसेंस आज के दौर में एक बड़ी जरूरत और बड़ी समस्या है . बहुत कम शब्दों में अपनी बात कहूँगा . आधार कार्ड जब गली मोहल्लों में बन सकते हैं , टेलीफोन के सिम और बीएसएनएल के कनेक्शन सड़कों पर बेचे जा सकते हैं , लोकवाणी केन्द्रों के जरिये तमाम प्रमाण पत्र जनता को दिए जा सकते हैं और गैस कनेक्शन और सब्सिडी भी ऑनलाइन की जा सकती है तो ड्राइविंग लाइसेंस को आधार से जोड़कर पासपोर्ट की तरह उसके आवेदन आन लाइन लेकर औपचारिकताएं पूरी करने के लिए आवेदकों को निर्धारित समय पर बुलाया जा सकता है . ड्राइविंग लाइसेंस के लिए आम भारतीय नागरिक को अपमानित न करें और यह काम राज्यों से लेकर केंद्र अपने पास रखे ,क्योंकि ड्राइविंग लाइसेंस पूरे भारत का होता है। .
Current Status : CASE CLOSED
Date of Action : 05 Nov 2015
Details : Thank you for your suggestion. Your views/remarks/suggestion have been noted in the Ministry for examining the same.

स्मार्ट सिटी बरेली के लिए अपनी राय दें !



Captionless ImageBareilly, a city that is known widely as one of the most Historic Cities in India, has a new mission—to also become one of the top 20 Smart Cities in India. To accomplish this lofty goal, WE NEED YOUR HELP

First, help us identify community problems that impact your life. What are they? 

Take a moment to tell Bareilly Nagar Nigam about them.click link below-
बरेली शहर भारत सरकार स्मार्ट सिटी योजना के तहत देश के सौ शहरों मे चयनित हुआ है ,जिसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर शहर को अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त एक ऐसा स्वचालित व्यवस्था वाला शहर बनाना चाहती हैं , जिसमें नागरिक सुविधाएं विश्वस्तरीय होंगी ,जैसा कि स्मार्ट सिटी योजना के आशय पत्र मे है ।

आप बरेली के मूल निवासी हैं , बरेली मे रहते हैं या नहीं ,देश मे कहीं भी रहते हैं या विदेश मे रहते हैं ,तो आपकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है ,जल्दी से जल्दी इस फार्म को भरकर अपनी आय स्मार्ट सिटी योजना के शिल्पकारों को दें जिससे वह आपकी बात समझ सकें

आपके जीवन को प्रभावित करने वाली बुनियादी सेवाओं में प्राथमिकता बताइए और समस्याओं की पहचान में मदद करें। वे क्या हैं? उनके बारे में बरेली नगर निगम को बताने के लिए कुछ समय निकालें।
बरेली, भारत के ऐतिहासिक शहरों में से एक है, और इसका चयन भारत के “१०० स्मार्ट सिटीज चैलेंज” में हुआ है.बरेली शहर को भारत के शीर्ष 20 स्मार्ट शहरों में से एक बनाने के लिए हमे आपकी मदद की जरूरत है।आपके जीवन को प्रभावित करने वाली बुनियादी सेवाओं में प्राथमिकता बताइए और समस्याओं की पहचान में मदद करें। वे क्या हैं? उनके बारे में नगर निगम को बताने के लिए कुछ समय निकालें।
इस लिंक पर क्लिक करें !

06/10/2015

बहुत मुश्किल है वीरेन डंगवाल होना !

जन्म:5अगस्त1947-निधन28 सितम्बर 2015
वीरेन डंगवाल ! बस नाम ही काफी है। जिसने सुना हो या मिला हो उसके दिल दिमाग में उनकी एक अलग ही छवि बन जाती थी ,जिसकी शायद किसी से तुलना बहत मुश्किल से हो पाती थी। आज भी कोई उनके जैसा व्यक्तित्व कोई दूसरा नहीं खोजा जा सकता। ऐसा नहीं है कि उनके व्यक्तित्व में सब अच्छाईयां ही भरी थी ,वह भी इंसान थे ,सबके जैसे ,बेहद खिलंदड़ ! अल्हड ! और हंसोड़ ,और भी न जाने क्या क्या। बयान करने से पहले सोचना भी मुश्किल है। उनका व्यक्तित्व में बहुत कुछ प्राकृतिक था ! उन्होंने किसी को अपना आदर्श नहीं माना। वह खुद के गढ़े सिद्धांतों पर चलते थे, डिगते थे ,मगर बहुत परखने के बाद।
वि साहित्यकार ,पत्रकार संपादक जैसे भारी भरकम व्यक्तित्व भले उनकी पहचान बने ,मगर जब भी कोई उनसे मिला ,तो वह उनमे यह सब खोजता रहा। उनसे जब भी मिला, तो लगा कोई दोस्त है ! आओ-आओ दोस्त ! यह उनका एक तकिया कलाम था ,सबसे मिलने का ! वह एक जादुई शख्सियत लेकर इस दुनिया मे आए थे । मिलने जुलने और यारी दोस्ती के अंदाज़ उनसे सीखने वाले थे । लोग उनके कृतित्व के उतने कायल नहीं थे जीतने  उनके व्यवहार और सोच के -उससे भी ज्यादा एक अल्हड़ अंदाज़ के । वह किसी पर अपनी मर्जी थोपते नहीं थे । यहाँ तक की पत्नी पर भी नहीं । रीता भाभी से उन्होने यह कभी नहीं कहा कि इनके लिए चाय बना दो -हाँ ये कहा कि यह कह रहे कि कि चाय जरूर पीएगे ,बताओ अब क्या करूँ ! उनके इस अंदाज़ से भाभी  तो पूरी तरह वाकिफ थी, इसलिए उन्हें हंसी कम ही आती थी ।
ब भी मिले, जिससे भी मिले ,गर्मजोशी से। ऐसा कभी लगा ही नहीं कि कभी अपनी किसी परेशानी या उलझन या किसी और व्यस्तता में भी कभी उलझे हो। इसका मतलब यह भी नहीं की उन्होंने गृहस्थी को तवज्जो नहीं दी ! जितनी आत्मीयता से वह से युवा पत्रकारों को "बेटे" कह कर का सम्बोधित करते थे ,उतनी ही आत्मीयता अपने बेटों से सम्बोधन में दिखाई देती थी। सामाजिक औपचारिकता ,रीतिरिवाज ,परम्पराएँ और कुछ भी करने या न करने की मजबूरी का उनके जीवन में कोई स्थान नहीं था। अपनी मर्जी के मालिक थे वह। कई बार उनकी सोच सिखाती थी कि खुद का चरण कैसा हो ,मगर इसके पहले खुद को उस स्थान पर रखना बहुत मुश्किल काम था। बहुत सारी  सामाजिक परम्पराओं ,रीति रिवाजों ,अभ्यागत सत्कारों को वह बेवजह का मानते थे ,और उसी तरह खुद को अनौपचारिक रखते हुए ,कोशिश करते थे कि सामने वाला उपेक्षित महसूस न करे। जितना संकोच और सम्मान वह दूसरों का करते थे ,घर में हालत उससे भिन्न नहीं रखते थे। रीता भाभी को उन्होंने जब भी कुछ बोला तो आग्रह पूर्वक। आदेश नहीं ,अधिकार से नहीं।
हाड़ के लोगों के बीच वीरेन दा ,बरेली में डंगवाल जी थे। उनका व्यक्तित्व कभी किसी भौगोलिक सीमा मे नहीं बंधा,इसकी इजाजत उन्होंने कभी नहीं दी ,मगर फिर भी उनको बांधे रखने की बहुतेरी कोशिशें हुईं ,वह बंधे नहीं ,मगर यह भी नहीं कह सकते कि वह ऐसे बंधन से पूरी तरह अपने मन के मुताबिक मुक्त भी हो सके। वीरेंन डगवाल के भीतर बहुत सारे व्यक्तित्व एक साथ जीते थे ।बाहर भी आते थे ,सटीक समय पर ।तब यकयक आश्चर्य होता था एक आदमी पल भर मे इतना कैसे बदल और घुलमिल सकता है ।यहाँ तक कि कभी कभी बच्चों जैसे लगते थे । बातों से भी और शरारतों से भी ।
न्हें बहुत बड़ा साबित करने और आँकने के लिए अक्सर बड़े बड़े नाम लिए जाते हैं ,मगर मैं नहीं समझता उन्होने अपनी तुलना किसी से करने को कभी पसंद किया हो ।बरेली कालेज मे प्रोफेसर रहते हुये रोजाना शाम को वह अमरउजाला आते थे ,बरसों उनके पास अपना विजय सुपर स्कूटर था ,मगर यह क्या जब उनके बेटे साइकिल चलाने लायक हुये तो अक्सर बच्चों की साइकिल से ही अमरउजाला आ जाते थे । रास्ते मे कई बार मिले ,मुसकुराते हुये ,अपनी बचकानी आदतों पर । कहते थे थोड़ी वर्जिश भी होनी चाहिए । मगर यह एक बहाना ही था ,वह जिंदगी को खुलकर जीते थे ,कभी अपना व्यकतित्व खुद पर हावी नहीं होने दिया ,ऐसे इंसान को कोई कैसे किसी बंधन या परम्पराओं मे जकड़ सकता है ?
एलएलबी करते हुये बरेली कालेज के छात्र आंदोलन मे अपनी सक्रियता के चलते मेरा कई बार अखबार से साबका पड़ा,खबर देने भी जाना पड़ता था। इसी दौरान मेरी मुलाक़ात ड़गवाल जी से हुयी । एक बार मेरा छात्रों से संबन्धित एक समाचार उन्होने देखा और बोले किसने लिखा है ये ?मैंने कहा मैंने ही लिखा है ।बोले यार तुम तो पत्रकारों की तरह खबरें लिखते हो।तो और लिखो। जैसे मेरे भीतर के सोये बागी आदमी और एक पत्रकार को उन्होने उसी क्षण झकझोर के जागा दिया ! मेरे घर के आसपास बरसों से शीरे का कारोबार होता था ,और यह शीरा खुली नांदों में पकाया जाता था। एक तो शीरे की गैस और ऊपर से भट्टियों की आग ,बेचारे पसीना बहाते मजदूरों का दर्द किसी तरह से प्रशासन की निगाह में लाने का मेरा मन था। मैंने जो भी लिख सकता था ,लिखा और एक दिन जाकर डंगवाल जी को उनके घर दे आया। यह क्या अगले ही रविवार को देखा तो एक बड़ी सी स्टोरी अमरउजाला में छपी हुयी थी। नीचे मेरा नाम। मैं अवाक था। इसके बाद जब-जब मैं उनसे कृतज्ञ भाव से मिला, तो उन्होंने इतना मौक़ा ही नहीं दिया और थोड़ा हिदायत देते हुए बोले तुम अच्छा कर सकते हो।
कालेज की प्रोफ़ेसरी का रुआब उन्होंने कभी अपने छात्रों पर नहीं दिखाया। अमरउजाला बरेली में एक अलग मुकाम शुरू से हासिल होने के बावजूद नए पत्रकारों को भले ही उनसे मिलने में संकोच हो,मगर उनके इस संकोच को भांपकर वह खुद ही आगे बढ़कर ऐसे मिल लेते थे कि संकोच काफूर ! और अगला यह सोचता रह जाता था कि आखिर यह हुआ क्या।
साहित्य और पत्रकारिता मे शुरू से ही एक बड़ा नाम बन गए ।अपने व्यवहार और सोच ने उन्हें उससे भी बड़ा बना दिया । यही वजह थी कि अखबार मे कोई पद उनके लिए बेमानी था । उन्हें अमरउजाला के दफ्तर मे बैठने के लिए कोई दफ्तर नुमा कमरा सजा धजा आफिस , ऊंची कुर्सी और वह सारे तामझाम नहीं चाहिए होते थे जो बड़े बड़े नाम पहले मांगते रहे हैं । हालांकि उनका एक कमरा था । बढ़िया कुर्सी मेज और एक सहायक के साथ जब तक वह दफ्तर मे रहें तब तक के लिए एक चपरासी भी उनकी सेवा मे रहता था ,मगर उनके लिए इस सबका कोई अर्थ कभी रहा ही नहीं । अक्सर वह अखबारों के ढेर पर ,रद्दी के बीच मे ,तो कभी जमीन पर बेतरतीब पड़े अखबारों के ढेर पर पर बैठे और कुछ पढ़ते हुये मिलते थे । कभी कभी तो उन्हें खोजना पड़ता था कि आखिर बैठे कहाँ हैं ।
न 1985 की अक्तूबर मे अमरउजाला मे विधिवत काम शुरू करने के बाद से मेरा सबसे ज्यादा सबका उनसे पड़ता था । वह मुझे हमेशा प्रोत्साहित करते थे । मेरी बहुत सारी खबरें /स्टोरी ऐसी रही जिनका रुख ही उन्होने बदल दिया । अक्सर वह मेरे उठाए विषयों को पसंद करते थे । यही वजह रही कि वह मुझसे पूछ भी लेते थे कि "विस्फोट कर रहे हो प्यारे" ! मेरे लिए यह काफी था । मेरे हम उम्र कुछ साथीओयन को मेरा उनसे और उनका मुझसे इस बेबाकी से मिलना पसंद नहीं आता था । बीच मे बहुत लंबे अरसे तक उनसे संपर्क नहीं हुआ ,जब उनका आपरेशन हुआ और बरेली आए तो उनसे मिलना हुआ । सर्दी के मौसम मे दरी बिछाए तख्त पर ऐसे बैठे थे मानो उन्हें कोई बीमार न समझ ले । मुहावरों चुटकुलों मे बातों को ऐसा मोड दे दिया करते थे कि हंसी न रुके और पल भर किसी बात  को लेकर इतना गुस्सा  कि खुद का चेहरा लाल हो जाया करता था । मुद्दे उन्हें छेड़ दिया करते थे ।अपनी उनकी जो सोच रही सो रही ,मगर बाद मे उसी सोच मे बांधे रखने के लिए बहुतेरे लोगों ने उनपर आखिर तक अपना एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश की -तमाम तरीके से ! जिससे वह आखिर तक निकाल नहीं पाये ।
उनकी एक कविता के कुछ अंश
कहाँ की होती है वह मिटटी,जो हर रोज़ साफ़ करने के बावजूद,तुम्हारे बूटों के तलवों में चिपक जाती है ?कौन होते हैं वे लोग, जो जब मरते हैं ,तो उस वक्त भी नफ़रत से आँख उठाकर तुम्हें देखते हैं ?आँखें मून्दने से पहले, याद करो रामसिंह और चलो ।
वीरेन डंगवाल को पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक कर सकते हैं - आँखें मूँदने से पहले याद करो रामसिंह और चलो... / वीरेन डंगवाल
  -आशीष अग्रवाल