05/07/2015

जब चिता मे अग्नि भीतर से प्रकट होने लगी !

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायनम भूतवा भविता वा न भूय: ।
अजो नित्यं शाश्वतोये न पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे  ॥   
यह आत्मा कभी जन्म नहीं लेता और न यह कभी मरता ही है । इस आत्मा का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता । यह अजन्मा ,नित्य और पुरातन है । शरीर के मर जाने पर भी यह नहीं मरता ।                                                     श्रीमद्भागवद गीता -2/20

दिव्य आत्माओं के इस संसार मे शरीर धारण करने से लेकर शरीर त्यागने तक के कई किस्से हमारे धर्मशास्त्रों मे दर्ज हैं, जिन पर हम धार्मिक आस्था के तहत यकींन करते हैं। हालांकि सनातन धर्म मे ईश्वर की अनुभूति और उसकी लीला और चमत्कारों और कृपा के तमाम किस्से धर्म भीरु लोगों के अनुभव मे आते रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है । पल-पल पर हम लोग अखिल जगत के नियंता की शक्ति का एहसास करते हैं । और ठीक ऐसा ही एहसास अभी हाल मे हुआ । किसी अंतिम संस्कार के दौरान चिता मे स्वयं अग्नि प्रज्ज्वलित होने का वह दृश्य आज भी आँखों  के आगे से नहीं जाता है । मैं सोच रहा था यह अनुभूति मेरा भ्रम है या यथार्थ ! मगर वह सच था । पूज्य गुरु देव डा एस के अग्रवाल "गुरु जी "की अर्धांगिनी श्रीमति ऊषा जी के अंतिम संस्कार के समय मौजूद तमाम लोगों ने उस दृश्य को विस्मय के साथ देखा ।
बीती एक जुलाई को करीब ढाई वर्ष की लंबी बीमारी के बाद अपनी तीन जैविक संतानों और अनंत परिवार की "माँ जी " इस संसार से चली गईं । एक दिन पूर्व  उन्हें फिर कुछ तकलीफ महसूस हुयी ,तब उन्हें आक्सीजन देनी पड़ी ,मगर आक्सीजन देने के बाद जब उनकी तन्द्रा लौटी तो उनकी देखभाल के लिए चौबीस घंटे उनके पास रहने वाली नर्से से  उन्होंने अपनी जप माला ऐसे मांगी, जैसे बेहोशी की हालत में कोई बड़ा जरूरी कार्य नहीं कर पायीं हो,और अब उसकी याद आई है । अगले दिन उन्हें और तबीयत बिगड़ने पर सुबह अस्पताल ले जाने  के लिए उनके गली मिर्धान स्थित निवास से एम्बुलेंस में ले जाया गया ,मगर तब तक वह शरीर त्याग चुकी थी। आधी सदी से ज्यादा से निरंतर चल रहे पूजन  भजन व् अन्य धार्मिक क्रियाकलापों के लते वजह गुरूजी का यह निवास एक तपोभूमि जैसा सिद्ध स्थल बन चुका है शायद यही वजह रही की काल उन्हें उनकी चौखट से बाहर लाने का अवसर तलाश रहा था।  
पिछले  ढाई साल से वह मां जी किडनी की समस्या से पीड़ित थीं ,मगर बड़े से बड़े कष्ट मे  उनके हृदय से कभी आह तो नहीं निकली, मगर "सीता राम "का जाप निरंतर उनकी हर सांस मे रहता था । एक बार बीमारी के दौरान काफी दिन अस्पताल मे रहने के बाद जब मैं उनके दर्शन को गया तो  इनके हाथों मे सूजन देखकर सहसा पूछ लिया अब तो आपको आराम है, तो फिर सूजन क्या दोबारा आई है -बड़े शांत भाव से उनका उत्तर था "हमे क्या मालूम , क्या है ! और उनकी निगाह सीधे उनके सामने बने मंदिर मे श्री राम दरबार की ओर चली गयी । वह शांत थीं । मैं भी शांत भाव से उनके चेहरे के उस संवाद भाव को पढ़ने की कोशिश कर रहा था- मानो अपने आराध्य से कोई शिकवा सा कर रही हों ! यह बात करीब एक वर्ष पूर्व की है।
बीती तेरह जून को उनका 67वां जन्म दिन था । उनकी  इच्छा अपने इस जनम दिन पर सुंदर कांड का सस्वर पाठ सुनने की थी ,जिसे भव्य- दिव्य तरीके से सम्पन्न किया गया । इस आलेख मे लगा माँ जी का यह चित्र इसी तेरह जून का का है ,जिसे देखकर कोई यह कह ही नहीं सकता वह ढाई साल से पूरी  तरह बिस्तर पर थीं और जबकि कई बार उन्हें हालत गंभीर होने पर अस्पताल मे भी भर्ती करना पड़ा , चेहरे पर एक दिव्य तेज, उनके भीतर की शांति, उनके हृदय मंदिर मे विराजमान अपने आराध्य के निरंतर चिंतन और नाम जप को स्पष्ट बोध कराती थी । 
क जुलाई को करीब चार बजे बरेली की सिटी श्मशान भूमि पर माँ जी की चिता सजाई गयी और मुखाग्नि देने की रस्म अभी पूरी भी नहीं हुयी थी कि चिता स्वयम धू-धू कर  जलने लगी ! मैं उस समय इस दृश्य को अकेले ही आश्चर्य के साथ देख रहा था ,मगर किसी और के साथ बाटने की सुध ही नहीं हुयी ,इसलिए कि शायद ये मेरा भ्रम हो ! मगर वह मेरा भ्रम नहीं था। बरसात के साथ मौसम मे अक्सर लकड़ियाँ नमी पकड़ ही लेती है और इसी लिहाज से चिता को अग्नि पकड़ने मे देर न हो, इसका भी इंतजाम किया गया था ,मगर वह सारे इंतजाम धरे रहे गए ।
मैंने देखा- "आग चिता के भीतर से निकल रही है ! बाहर से अग्नि देने कि तो महज एक रस्म ही अदा हुयी । बाह्य अग्नि इतनी पर्याप्त नहीं होती कि उससे एक विशाल चिता कुछ ही क्षण मे आग की लपटों से घिर जाये ,मानो चिता को बस अग्नि देने की रस्म का इंतजार सा हो "! यह दृश्य अगले दिन तक मन मस्तिष्क को बेचैन किया रहा । अगले दिन जब मैं पूज्य गुरुदेव के निवास पर गया और अपने मन की  बेचैनी को उनसे कहने ही वाला था कि वहाँ बैठे अन्य लोग भी उनसे इस प्रसंग की  ही चर्चा कर रहे थे । और इस तरह मेरे भी मन की बेचैनी को भी शब्द मिल गए। मेरे जीवन का यह पहला अनुभव था, जब मैंने  अपनी आखो से देखा कि "चिता मे भीतर से अग्नि ने मृत देह को अपने आगोश मे लिया "। मौसम की उमस वाली गर्मी मे हवा चलने की तो कोई उम्मीद वैसे भी नहीं थी और ये चिंता स्वाभिक रूप से थी कि कैसे अंतिम क्रिया की रस्म पूरी हो पाएगी ,मगर उस चिता को किसी बाह्य सामिग्री और संसाधनों की जरूरत नहीं थी । और एक सबसे खास बात यह भी थी इस चिता की अग्नि मे ताप न के बराबर था ,आमतौर पर चिता से पाँच मीटर दूर पर खड़े होना असंभव सा होता है ,मगर यहाँ चिता के सामने के टीन शेड मे सब ऐसे खड़े और बैठे थे जैसे अग्नि कि तपन का उनको एहसास ही न हो ।नगर विधायक अरुण कुमार समेत भाजपा के तमाम वरिष्ठ नेताओं समेत शहर के सभी वर्गों तमाम गणमान्य लोग ,स्वाभाविक  रूप से मौजूद थे।  
भी हाल मे जालंधर के एक संत से फोन पर बात हो रही थी । सामान्य चर्चा के दौरान  बात आई, तो उनका यही कहना था ईश्वर के अनन्य भक्तों को कई बार व्यक्ति की एकाग्रता के लिए ईश्वर संसार से उनका ध्यान और उनसे अपेक्षाएं हटाने के लिए, उन्हें अपनी ओर एकाग्र रखने मे शरीर को ही कष्ट मे ले आते हैं । तब न तो संसार ऐसे लोगों से कोई उम्मीद करता है और वह भी अपनी पीड़ा मे प्रभु का स्मरण पूरी तल्लीनता के साथ करते हैं । और यही संयोग माँ जी के साथ था ,जो अर्द्ध बेहोशी की अवस्था मे भी "सीताराम" के जप से खुद को तपा रही थीं और वही ताप उनकी अंतिम यात्रा का ईंधन बन कर उनके शरीर समेत ब्रह्मांड मे ले गया ! उनके अवशेष इसका प्रमाण बने !
ठ जुलाई को उनके अमेरिका वासी पुत्र श्री जितेंद्र अग्रवाल गढ़मुक्तेश्वर मे जब यह अवशेष गंगा की बीच धारा मे जल प्रवाह कर रहे थे तब फिर एक बार फिर जल धारा मे प्रवाहित करते ही यकायक भय देने वाला भंवर अस्थियों को आपने आगोश मे समेटकर दूसरे ही क्षण गंगा की सतत जलधार मे परिवर्तित होकर लुप्त हो गया, मानो स्थूल शरीर के पाँच तत्वों मे से विलय होने मे बाकी रह गए जल को इन अवशेषों को स्वयम मे विलय करने की प्रतीक्षा का अंत करना हो । सर्वविदित है की पंचतत्वों से बना शरीर अंत मे पाँच तत्वों मे ही मिल जाता है ,जिसमें पृथ्वी,अग्नि, आकाश और वायु मे स्थूल शरीर का विलय अंतिम संस्कार के बाद जल मे अवशेष विसर्जन की ही प्रक्रिया बाकी रहती है । और ताप विहीन अग्निदेव के प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होने के बाद स्थूल देह को ब्रह्मांड मे ले जाने की बाद जल देव की ही ज़िम्मेदारी थी की उनके अवशेषों को वह यथास्थान ले जाएँ ।
एस के अग्रवाल 'गुरुजी' 
गुरुदेव बताते हैं कि बड़े बड़े संत ऋषि-मनीषी अपना शरीर त्यागने के लिए प्रत्येक तीन वर्ष मे एक बार आने वाले पुरुषोत्तम मास (अधिक मास ) की पूर्णिमा के दिन ही उनका संसार मे अंतिम दिन हो, इसके लिए बरसों-बरस अपने आराध्य से विनय करते हैं ,जबकि इनके (माँ जी ) के लिए तो प्रभु ने वही दिन चुना और इस दिन प्राणी सीधे प्रभु के धाम मे पहुँच कर संसार सागर के आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाते हैं । एक जुलाई से 13 जुलाई तक के माँ जी के अंतिम संस्कार से लेकर तेरहवीं तक के समस्त संस्कारों मे कहीं भी शोक या विलाप नहीं था ।यह तेरह दिन का एक मृत्यु पर्व था जिसमें सभी जरूरी रस्मों के साथ मानव के मृत्युलोक से विदाई को एक भव्य दिव्य रूप प्रदान किया गया और समस्त संस्कारों मे हरीनाम संकीर्तन की अविरल धारा आत्मा को उसके लोक तक पहुंचाने का कुछ ऐसी संवाहक बनी कि शोक के बजाए पल पल और पग पग पर श्रद्धा और आत्मान्द की अनुभूति सभी उपस्थित लोग कुछ इस तरह कर रहे थे मानो मृत्यु पर शोक या विलाप की अब तक की परंपरा शास्त्र सम्मत भी है,यह एक ऐसा प्रश्न  हो गया है ,जिसका उत्तर समाज को आज नहीं तो कल खोजना पड़ेगा। आखिर जन्म और मृत्यु पूरी तरह उस दैवीय शक्ति के नियंत्रण मे है ,एक पर हर्ष और एक पर विलाप एक अजीब विरोधाभास है ,शोक-विलाप शरीर छूट जाने के बाद आत्माओं को ईश्वर मे विलय मे बहुत बड़ी बाधा ही है । गुरुजी से संपर्क करने के लिए उनके फेसबुक पेज के जरिये उन तक पहुंचा जा सकता है -https://www.facebook.com/gurujibly?fref=ts
-आशीष अग्रवाल
English version -http://jhumkabareillyka.blogspot.in/2015/07/when-flames-came-out-from-pyre-itself.html

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