18/10/2016

राजनीति और विकास के अद्भुत शिल्पी नारायण दत्त तिवारी !

जन्म 18 अक्तूबर 1925- आज 92वें जन्म दिवस पर 
ज अपना 92वां जन्म दिवस मना रहे वरिष्ठ राजनेता एवं उत्तर प्रदेश के चार बार और  उत्तराखण्ड राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री  रहे नारायण  दत्त तिवारी  भारतीय राजनीति मे हमेशा एक नायाब शख्सियत के साथ चर्चा मे रहे । एक दो अपवादों को छोड़ दिया जाए तो उनके द्वारा रची गयी विकास की कल्पना को उन्होने कभी आने वाली सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा । खुद ही अपनी हर कल्पना को मूर्त रूप दिया ।उत्तर प्रदेश हो उत्तराखंड ,उनके पास आने वाले फरियादियों कभी किसी को लाइन नहीं लगानी पड़ी । उनके खास निर्देश थे कि जो अभी आए,उसे सम्मान के साथ बिठाया जाये ,पानी और चाय के साथ कुछ नाश्ता दिया जाये । उसके बाद वह देर रात तक 12 -12 बजे तक लोगों से मिलते थे । थकान उनके पास से होकर नहीं गुजरती थी । 
त्तर प्रदेश मे उनके द्वारा बसाया गया नोयडा आज देश राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और एनसीआर मे विकास का प्रतिमान है । एक यही नहीं ,हजारों विकास के काम ऐसे हैं ,जो उनके बाद के शासकों के अनुकरणीय बने हैं, मगर उन्होने कभी अपने कामों का गुणगान नहीं किया । उनकी हर योजना और सोच राजनीतिक दलों और सरकारों के लिए प्रेरणा और अनुकरणीय बनी । 
नारायण दत्त तिवारी का बरेली से गहरा नाता रहा । बरेली मे आजादी के पहले से चला आ रहा काष्ठ कला केंद्र नाम का जिसे कार्पेंटरी स्कूल कहते थे ,उसमें उनके पिता पूर्ण नन्द तिवारी नौकरी करते थे । वह जब बरेली आए इस स्क्लूल की चिंता जरूर करते थे और इसके विकास के लिए कुछ न कर पाने की उनके मन मे एक टीस रही । आज उस स्कूल का नामोनिशान मिट चुका है और उसकी जमीन पर उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार के दौर मे विकास भवन और और इससे पहले इसके आधे हिस्से मे महिलाओं का सरकारी डिग्री कालेज खोला जा चुका है । आजादी के आंदोलन के दौरान वह बरेली सेंट्रल जेल मे बंद भी रहे । 
अपने पिछले जन्म दिन पर 16 अक्तूबर 2015 वह बरेली आए थे । अगले दिन उन्हें हल्द्वानी जाना था । और वहाँ 18 अक्तूबर को होने वाले अपने प्रशंसकों के द्वारा आयोजित जन्मदिन समारोह मे हिसा लेना था । एक साथ लंबी यात्रा के लिए उनकी सेहत अब इजाजत नहीं देती । इसीलिए वह बरेली आए । बरेली से विशेष लगाव भी इसकी एक वजह तो थी ही । 
1989 के चुनाव मे उत्तर प्रदेश मे कांग्रेस की आखिरी सरकार के मुखिया भी वही थे और उसके बाद जब मुलायम सिंह यादव पहली बार जनता दल और भाजपा की गठबंधन सरकार के मुखिया बने तो उनके सामने अपनी सरकार का बजट पेश करने की बहुत बड़ी चुनौती थी । उस समय भी यह बात चर्चा मे रही कि बजट तिवारी जी ने बनाया है । नोयडा के लिए उनका सपना अभी अधूरा है । वह इसे देश का एक और केंद्र शासित प्रदेश बनाना चाहते थे । इसको बसाने के लिए उन्होने देश के बड़े बड़े उद्योगपतियों को खुद फोन कर करके व्यक्तिगत रूप से बुला-बुलाकर अपने उद्योग लगाने के प्रेरित किया उनकी मुश्किलें सुनी और फिर उन्हें हाथों हाथ हल किया । 
16 अक्तूबर 2015को  बरेली मे पुरानी यादें ताज़ा करते लेखक आशीष अग्रवाल के साथ 
ह जहां होते थे ,उनका मंत्री या मुख्यमंत्री के तौर पर दफ्तर वहीं होता था । जो अभी सामने आया ,जो फरियाद की ,मौके पर ही उसका समाधान और आदेश करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा थी । वह जहां भी जाते थे ,सबसे पहले उस जिले का अखबार उनके सामने पेश करना डीएम की पहली ज़िम्मेदारी होती थी । पहले के दौर मे मीडिया मे एक प्रचलन था कि जब भी कोई वीआईपी मूवमेंट होता था था अपने और आसपास के इलाके की खास समस्याओं पर उनका और उनके विभाग से संबन्धित समस्याओं पर खासकर लेख और रिपोर्ट अखबार मे दी जाती थी । और तिवारी जी अखबार देखते ही सबसे पहले उस मसले पर अफसरों से बात करते थे ,उनकी खबर लेते थे और हाथों हाथ अपना फैसला सबके सामने जाहिर कर  देते थे । इसका सबसे बड़ा लाभ यह होता था कि मीडिया की रिपोर्ट्स को अनदेखा करना प्रशासन के बूते के बाहर की बात होती थी । सरकार और प्रशासन मे मीडिया की उपयोगिता का इससे बढ़िया माध्यम कोई और हो नहीं सकता था । इसके साथ मीडिया को समाज के प्रति जिम्मेदार बनाने मे उनकी इस शैली बहुत बाद योगदान रहा । 
बरेली मे मेरा आत्मीयता से मिलते हुये ,साथ मे उज्ज्वला शर्मा । 
तना ही नहीं ,अपने कार्यक्रमों के दौरान वह अपनी पार्टी के सांसदों और विधायकों के अलावा यदि  विरोधी दलों के लोग भी उनसे मिलने जाते थे ,तो उनसे भी वह सबसे पहले यह पूछ लिया करते थे कि आज यहाँ किस चीज़ की जरूरत सबसे ज्यादा है ,अगर कोई उन्हें मौखिक रूप से भी समस्या बता कर अपना सुझाव देता तो वह अपने भाषण मे तत्काल उसकी घोषणा कर दिया करते थे । उनके लखनऊ से चलने से पहले जिले के अधिकारियों से बात करके पूरी तैयारी करते थे कि मुख्यमंत्री से किस परियोजना की घोषणा करवानी है । विरोधी दलों के नेताओं को भी को भी हमेशा महत्व दिया । यही वजह थी कि उनसे मिलने जाने वालों मे सभी दलों के नेता होते थे।आज के दौर मे राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्री समेत केंद्रीय मंत्री से मिलने वालों की जगह 100 मीटर दूर होती है और वह सिर्फ विरोध के लिए जाते हैं । उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहते हुये उन्होने हमेशा विकास की परियोजनाओं को राजनीति से ऊपर रखा । 
राजनीति के भी वह एक माहिर खिलाड़ी रहे । एक हद से ज्यादा अतार्किक विरोध को उन्होने कभी पनपने नहीं दिया । उनके लिए इस बात का कोई मतलब नहीं था कि इस जिले मे उनकी पार्टी का सांसद नहीं है और विधायक कितने हैं ,कहाँ के लोगों ने उनकी पार्टी के उम्मीदवार को हरा दिया है । विकास और राजनीति को उन्होने हमेशा अलग रखकर देखा । उत्तर प्रदेश के खाद कारखाने और गैस की पाइपलाइन यहाँ के लिए एक दिवा स्वप्न थी ,उन्होने ऐसे चुटकियों मे इन परियोजनाओं की बुनियाद रखी मानों कि कुछ किया ही नहीं । मात्र बरेली मण्डल मे ही खाद के तीन तीन कारखाने लगवा देना अपने आप मे बड़ी बात है । अपने संसदीय और निर्वाचन क्षेत्र नैनीताल मे गन्ने की भारी  पैदावार और किसानों के सामने इसकी बिक्री की समस्याओं से पूरी तरह वाकिफ नारायण दत्त तिवारी ने वहाँ चीनी मिलों की स्थापना ऐसे कि जैसे आज सांसद और विधायक अपने अपने क्षेत्रों मे इंडिया मार्का हैंडपंप लगवा देते हैं । 
बरेली से हल्द्वानी जाते समय भी मुझे अपने साथ बाहर तक लाये ,साथ मे रोहित शेखर । 
ड़कों को देश के भाग्य रेखाएँ बताकर उन्होने देश के विकास मे सड़कों की महत्ता को न केवल समझा , बल्कि आने वाली पीढ़ियों को एक संदेश भी दिया ,जो आज तक देश के लिए अनुकरणीय बना हुआ है । बरेली की सेमीखेड़ा चीनी मिल उनकी इसी योजना का परिणाम थी ,क्योंकि यह इलाका नैनीताल से लगा हुआ है था जो अब ऊधम सिंह नगर के नाम से जाना जाता है । मुझे याद है केंद्र मे उद्योग मंत्री के तौर नार्वे और स्वीडन के दौरे के बाद वह जब अपने निर्वाचन क्षेत्र के दौरे पर आए, तो उन्होने सड़कों के निर्माण के लिए हाटमिक्स तकनीक का उत्तर प्रदेश मे श्रीगणेश किया । उस समय नैनीताल सड़कों के लिए पूरे देश मे चर्चित हो गया था । यह कहा जाने लगा था कि सड़कें देखनी हैं नैनीताल की देखो । 
म आदमी और देश प्रदेश की हर जरूरत को उनहोंने जितनी शिद्दत के साथ महसूस किया ,आज के दौर उनकी जैसी सोच के राजनीतिक दल और उनके नेताओं कि संख्या गिननी मुश्किल होगी । 1990 मे राजीव गांधी हत्या के बाद के संसदीय चुनावों मे नैनीताल से मात्र 800 वोटों से हारने के बाद उन्होने अपनी इस पीड़ा को व्यक्त भी किया था कि देश की जनता को विकास से कोई सरोकार  नहीं है ,उस चुनाव मे नैनीताल ने देश के भावी प्रधान मंत्री को हराया था ,जिसका नैनीताल के लोगों ने उनके सामने प्रायश्चित स्वरूप उनसे खेद भी जताया था । इन पंक्तियों  का लेखक उस समय का गवाह है ,और इसकी रिपोर्टिंग तब मैंने अमरउजाला मे मैंने प्रकाशित भी की थी । यह वह समय था जब वह अपनी हार से उबर कर एक बार फिर पूरे जोश के साथ अपने संसदीय क्षेत्र  मे विकास यात्रा लेकर निकले थे । उस यात्रा की कवरेज के लिए उस समय देश के लगभग सभी राज्यों के प्रमुख अखबारों के साथ विदेशी मीडिया भी यह देखने आया था कि एक हारा हुआ बड़ा राजनेता किस हौसले के साथ अपने क्षेत्र मे फिर से जा रहा है । उस यात्रा मे उन्होने अपने क्षेत्र की जनता से शिकवा नहीं किया बल्कि उन्हें उनके फैसले के लिए प्रणाम किया । उस दौरान उनकी जनसभाओं मे उनके भाषण का पहला वाक्य होता था -आपके फैसले के लिए आपको प्रणाम -बस यही एक छोटा सा वाक्य हजारों की भीड़ के लिए उनकी आँखें नम कर देने के लिए काफी होता था । 
उत्तरखंड के मुख्यमंत्री आवास मे  मैं और वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानन्द मिश्र । 
त्तराखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होने इस नए राज्य के विकास की जो परिकल्पना की , वह शायद किसी के बूते की बात नहीं थी । हरिद्वार की बंजर ऊसर जमीन और राख़ के बड़े बड़े ढेरों वाले खौफनाक इलाके मे उद्योगों के विकास की एक ऐसी संरचना सिडकुल खड़ी कर देना गोया कि उद्योगों का जंगल बसाया गया हो ,यह उनकी विकास के प्रति ललक और देश के भविष्य के प्रति गहरी चिंता का ही परिणाम था ।बिजनौर जिले के नजीबाबाद और हरिद्वार के बीच मे गंगा के बीच से होकर जाने वला रास्ता जिन्हें रपटे कहा जाता था ,हर साल बरसात मे यह मार्ग सैकड़ों लोगों की जान ले लेता था और बसें तक इसमें बह जाती थी ,उन्होने मुख्यमंत्री बनते ही एक पत्रकार के सुझाव पर इसकी परियोजना बनाने का आदेश दिया और खुद और केंद्र से इसकी मंजूरी करवाकर इस मार्ग को एक नया राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित करवा दिया । उत्तराखण्ड को उत्तराखंड से जोड़ने के साथ उत्तर प्रदेश से जोड़ने के लिए यह एक ऐसा काम हुआ ,जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । वह भी तब जब कि केंद्र मे भी कांग्रेस की सरकार होते हुये वह कभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने नहीं गए । इसकी वजह यह थी कि जब वह केंद्र मे राजीव गांधी की सरकार मे वित्त मंत्री थे तब मनमोहन सिंह उनके वित्त सचिव थे ।
-आशीष अग्रवाल

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