20/02/2014

लोकसभा के इस चुनाव में मत दान न करें !

ह आलेख केवल और केवल भारत के वोटरों और चुनाव आयोग के लिए है। राजनीतिक दलों के लिए बेमानी है। शीर्षक को पढ़ कर चौंकिए नहीं ,क्या वजह है कि मतदान को "दान" ही रखा जाए? आप आज़ाद देश में अभी तक
इस बात के लिए स्वतन्त्र हैं कि वोट डालें या नहीं। औपचारिक रूप से आपसे वोट की अपील करना एक मजबूरी है ,क्यों? कभी सोचा ? आज यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका जवाब देश की दिशा बदल देगा। भारत में सिर्फ वोट देना, यहाँ के नागरिकों की इच्छा पर है। मगर वोट देना सबसे बड़ा दान है ! इस दान के अलावा भारत के नागरिकों को दान से बनी सरकार और संसद की हर उस बात को सर झुका कर मान लेना है, जो वहाँ से सिर्फ आपके लिए अनिवार्य बनकर निकलती है। सरकार बनाने की लिए मत (वोट) को दान कहना और समझाना ही सबसे बड़ा धोखा है। अब वोट दान नहीं है। दान है तो दान देकर भूल जाना किसी भी दान की पहली शर्त है। दान लेने के लिए कोई प्रपंच नहीं किया जाता।अरबों- खरबों का खर्च नहीं किया जाता।आत्मनिर्भर देश में लोकतंत्र आज भी एक-एक वोट के लिए वैसे ही गड़गिड़ा रहा है, जैसे आम आदमी अपने अधिकारों और न्याय  के लिए ! वोट के अलावा देश के लिए कुछ और दान नहीं किया जाता। यह दान भी तब करना है, जब संवैधानिक सरकार शक्तिहीन है। लोकतंत्र कि इस लाचारी को इसे मज़बूत करने वालों ने देखा ही नहीं .
दान के बारे में यहाँ तक कहा जाता है दूसरे हाथ को न पता लगे ,और दान वही है जो स्वेच्छा से दिया जाए। दान किसे दिया जाए इस पर कुछ लोग या उनका समूह बहस नहीं करते कि दान उनमें से किसे या उन्हें ही दिया जाए। आजादी के बाद जब देश में सरकार बनाई जानी थी तब साधन संसाधन नहीं थे। देश को खडा करने की आपाधापी थी। देश संपन्न नहीं था। तब यह कहा गया कि मत दान करें और देश को सरकार दें। जो देश को चलयेगी। मगर अब भारत एक आत्मनिर्भर ही नहीं,दुनिया के बहुत सारे कमजोर मुल्कों की मदद करने वाला ऐसा देश है जो आने वाले समय में दुनिया में पहली पंक्ति में शुमार देश होगा। ऐसे में आज यह सवाल मौजू है कि क्या अब भी इस देश में सरकारें दान से बनेंगी? वह भी तब इस दान को लेने के लिए सैकड़ों अरब रूपया पानी की तरह बहाया जा रहा है?

पके वोट का दान लेने वाले क्या-क्या करेंगे, कर चुके हैं और कैसे-कैसे हैं,शायद इस बारे में यहाँ कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। दान की पात्रता तो दान देने वाले को तय करनी होती है, मगर वोट के मामले में हम सिर्फ और सिर्फ अपने हित देखते हैं ,वह भी वो, जो हमें काल्पनिक रूप से दिखाये जा रहे हैं, उनसे  सिर्फ उम्मीदें ही हैं। ऐसे में अब सही वक्त है कि यह फिर से सोचा जाए की

वोट देकर सरकार का चुनाव किया जाए 
या मतदान करके भूल जाएँ ! 

फिर उसी को कोसें जिसको दान दिया है ,यह भी एक बड़ा पाप ही है कि जिनको दान दें उनको ही गालियाँ दें !पछताएँ, जब वो घोटालें करें !या हमारी आपकी रोजी-रोटी और चूल्हे पर हमला करें ,अपनी पगार बिना बहस के तय करें और आप कितनी रोटी खायेंगे ,कितनी बनायेंगे यह भी वो तय करें। आप कितनी आमदनी से अपना घर चलायें और वो कितनी भी आमदनी करें ,उसे जनहित के लिए जरुरी माना  जाये।और आपको अपनी आमदनी का हिस्सा देश के लिए दान नहीं करना है उसको क़र्ज़(कर ) के रूप में चुकाना है। मगर आपके हर कर्तव्य को क़ानून से बांध देना ,जबकि कानून बनाने की  ताकत उन्हें आपके दान से मिली है  ,कहाँ तक न्याय सांगत है?

ज वक्त बदल गया है। वोट जरुर दें, मगर अपना मत दान न करें। इस दान ने ही सारी गड़बड़ियों को जनम दिया है। सोचिये ! अगर आपने किसी को कुछ भी दान किया और उस दान का दुरूपयोग हुआ है ,जो हर तरह से साफ़ हो गया और जांच परख लिया गया ,तो क्या फिर आप कुछ समय के और कुछ वस्तु या किसी और लालच ,छलावे में आकर फिर उसी को वही दान देंगे जो आपके भरोसे को बेच गया ! नहीं न !और यह सीधे तौर पर जरुरी नहीं है आपकी इच्छा पर है ,आपने नहीं किया दान तो कोई बात नहीं , जिस  देश में   लोकतंत्र गर्व का विषय है मगर इसकी रक्षा और सम्मान  और स्वाभिमान नागरिकों के लिए अनिवार्य नहीं है और इसकी जरुरत भी आज तक महसूस नहीं की गयी ,यही नहीं विचार धाराओं के टकराव के बावजूद कभी इस और सोचा भी नहीं गया तो क्या यह एक मिला जुला छल नहीं है? मतदान हर नागरिक का एक सम्मानजनक अधिकार है ,आम नागरिक के आत्मसम्मान और लोकतंत्र के लोक का स्वाभमान तभी सुरक्षित और जागृत हो सकता है जब मतदान को अनिवार्य बनाया जाये।

लोकतंत्र में सरकार के गठन क्या  हर उस मुद्दे पर जनमत संग्रह होना चाहिए जहां देश के नागरिकों का सीधे तौर से तालुक है। संविधान ने संसद को अधिकार यह मान कर दिया है कि उसमे बैठे जनता के प्रतिनिधि धर्म भाव से उनके लिए सोचेंगे, जिनके दान से वो कम से कम दो लाख रूपए महीने की पगार वाले ऐसे वी आई पी बने हैं और इस हैसियत में आये हैं। वह सब नहीं करेंगे, जो दान की अवधारणा के खिलाफ है। आज जब वोट लेने के लिए अकल्पनीय तरीके और अकूत धन खर्च किया जा रहा है तो वोट को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। 67 साल  में हमारे प्रतिनधि इस देश के नागरिकों को देश के ऋण से मुक्त नहीं कर पाए ,मगर खुद अपनी पीढ़ियों के साथ अपन तमाम समस्याओं से मुक्त हो गए ! और किसी ने भी  नहीं सोचा कि सरकार बनाने वाली जनता ,नागरिकों को इस देश पर उसका अधिकार है,उसे यह अधिकार समझने और उस पर गर्व करने का मौक़ा भी दिया जाये ,और उसका सिर्फ एक ही तरीका है- देश में किसी भ मतदान को उतना ही जरुरी बना दिया जाये जितना कि आमदनी पर कर देना और जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रमाण पत्र, ज़िंदा इंसान के लिए ज़िंदा होने  का भी प्रमाण पत्र। ख़ुफ़िया, सुरक्षा,घोटाले, शिक्षा ,मछली पालने से लेकर जहां  चिड़िया घर तक का अलग से विभाग है ,उस देश में क्या इस बात का हिसाब नहीं रखा जा सकता कि सरकार बनाने के लिए किस-किस ने वोट दिया और नहीं दिया तो क्यों ? अगर कोई वोट नहीं डालता है तब भी थोड़े से ही मतों से सरकार बन जाती है !क्या मज़ाक है?अभी तक वोट के लिए कोई कानून नहीं है। जो है ,वह यह कि वोट डालने के दौरान शांति रहे। आखिर दान देने वाला भी कभी लड़ाई - झगडा और खून खराबा करेगा?या दान को हथियाने वाला ही यह सब करेगा? अफ़सोस की बात है की भरता में अभी तक यही स्पष्ट नहीं है।

देश के प्रत्येक  नागरिक के लिए  वोट डालने की अनिवार्यता तो उसी समय से हो जानी चाहिए थी ,जबसे यह संकल्प लिया गया कि भारत एक लोकतांत्रिक देश रहेगा। अनिवार्य मतदान के बिना स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना कैसे की जा सकती है? जिस देश में बच्चे के पैदा होते ही उसका जन्म और किसी के मरते ही उसकी मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य हो। वहाँ मतदान का गैर जरुरी होना एक ऎसी सोची समझी साजिश लगती है ,जिसके लिए पृथक  विचारधारा का भी भेद नहीं है। आखिर क्या वजह है कि जब चुनाव प्रचार के लिए सभी उम्मीदवारों को 40 दिन का समय मिलता  है और वोट डालने के लिए सिर्फ एक दिन?यह कैसे संभव है कि सवा अरब की आबादी वाले देश के करीब 70 -80करोड़ से ज्यादा मतदाता एक ही दिन में वोट दाल दें? आखिर दलों और प्रत्याशियों को चालीस दिन और मतदाता को 40 घंटे भी नहीं? एक दिन में मतदान और एक दिन में गिनती ,सिवाय इस सर्वाधिक जरुरुई काम के इस देश बाकि सभी काम बड़े आराम से और तसल्ली से होते हैं।आखिर संसद के लिए चुनाव लोकतंत्र का महायज्ञ है,इसे जितनी भी निष्ठा और सुविधानुसार संपन्न किया जाये कम है।

सा तो नहीं है कि हर बात पर नुक्ताचीनी करने वाले और इस बात को नहीं जानते हैं और उन्होंने  कभी सोचा नहीं है? हाँ यह जरुर हो सकता है कि कोई भी इस बारे में ना सोचे। ऐसा जरुर सबकी मिलिभागत से तय हो सकता है ,यही वजह है इस दिशा में आज तक कोई कुछ बोला ही नहीं।संसद में बहुमत साबित करने के लिए जब पचास फीसदी समर्थन जरुरी है तब जनता का प्रतिनिधि चुने जाने के लिए यह अनिवार्यता क्यों नहीं ?हाँ यह व्ययवस्था जरुर है की अगर कहीं 90 प्रतिशात वोट पड़ गए तो दोबारा वोट डलवाने की प्रक्रिया हो सकती है !मगर ऐसा नहीं है कि कुल मतदाताओं की एक निश्चित संख्या जो कम से कम पचास प्रतिशत से अधिक हो ,निर्वाचन के लिए प्राप्त होना अनिवार्य है।

ब जब भारत के निर्माण और पुनर्निर्माण की बात हो रही है, तब यह सवाल भी इससे पहले हल होना चाहिए की इस देश के नागरिकों की उसके निर्माण और चलाने में क्या हैसियत है। अब देश को और ज्यादा धोखे में नहीं रखा जा सकता। तकनीक और विकास के इस दौर में आज वह साधन और संसाधन  मौजूद हैं जिसके जरिये नागरिकों को अपने देश औरअपनी  सरकार के प्रति उन्हें अपनी जिम्मेदारी से साफ़ नियत से अवगत  कराया जाए और वह जिम्मेदारी उन्हें इमानदारी से सौपी जाए। इसका एक मात्र तरीका यही है देश में सरकार बनाने के लिए मतदान की अवधारणा को समाप्त करके उनसे अपना मत सौंपने की बात की जाए। उन्हें यह भूल जाने को कहा जाए कि उन्होंने अपना मत दान किया है। सोचने वाली बात है कि जहां हम आज विदेशों से हर मामले में तकनीक और तौर तरीके ले रहे हैं, हमारे अफसर और नेता मंत्री रोजाना विदेश में कुछ नया सीखने  और करने ही जाते हैं। मगर हमने आज तक अपने देश की चुनाव प्रणाली को अत्याधुनिक और अनिवार्य बनाने की नहीं सोची। सत्ता और विपक्ष में से किसी ने नहीं सोचा ,आखिर इस सोच में फायदा तो किसी का नहीं है।आखिर जब सत्ता का बंदरबांट सिर्फ कल्पनिक तौर पर किया जाना है तो यह मुद्दे अपने आप ही गौंड हो जाते हैं।

संविधान के मुताबिक़  लोकसभा भंग होते ही और चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही सारी व्यवस्थाएं केंद्रीय चुनाव आयोग के आधीन हो जाती हैं ,आयोग ही सारी व्यवस्थाएं तय करता है। उसमे सरकार का दखल  नहीं होता है। अब आयोग की जिम्मेदारी है कि वह सोचेकी अब तक उसकी देखरेख में की निष्पक्ष चुनाव हुए हैं? चुनाव में आखिर किसी गृहयुद्ध से निपटने  जैसी व्यवस्थाएं क्यों की जाती हैं?क्यों आम नागरिक जो देश के लिए अपना मर दान करने को खडा है ,वह उस महायज्ञ से ही  भयभीत होकर घर से नहिन निकालता है जिसमे सिर्फ उसके द्वारा डाली गयी आहुति से ही यज्ञ में पूर्णाहुति होनी है।

आज चुनाव आयोग से ये अपेक्षाएं अनुचित हैं ?
१- क्या प्रचार का समय कम करके या न भी किया जाए तो मतदान  का समय न्यूनतम  एक सप्ताह नहीं किया जा सकता? इससे हर नागरिक को अपनी सुविधा से वोट डालने का उपयुक्त अवसर मिलेगा। मतदान का प्रतिशत बढेगा।
- एक ऐसी  व्यवस्था भी कायम  की जा सकती है जिसके जरिये किसी के भी मतदान न करने का कारण पूछा जा सकता है। बिना किसी कारण के मतदान न करने का मतलब यह नहीं हो सकता कि  एक नागरिक  का इस देश की व्यवस्था में यकीन ही नहीं है !आखिर राईट टू रिजेक्ट इसके अलावा क्या है? इसकी पड़ताल के लिए  व्यवस्था या तो चुनाव आयोग के हवाले की जाए या फिर इसके लिए अलग से एक तंत्र का गठन किया जाना चाहिए। यह आज इस दौर में जन लोकपाल कानून से भी बड़ी आवश्यकता है। हाल में जोड़ा गया राईट टू रिजेक्ट से कुछ नहीं होना ,जरूरत है की पचास प्रतिशत से अधिक वोट पाने वाले को जनप्रतिनिधि बनने का अवसर दिया जाये उसमे यह देख लिया जाये कि किसको ज्यादा वोट मिले हैं।
३-देश में बैंकिंग को घर-घर तक ले जाने के लिए आज मोबाइल ए टी एम् की व्यवस्था है। आखिर मोबाइल वोटिंग मशीन की व्यवस्था चुनाव में नहीं की जा सकती?यह मशीन घर या मोहल्लों मे जाकर एक-एक नागरिक का वोट ले सकती हैं। यु आई डी वाली तकनीक से दोहरे वोट का भी ख़तरा नहीं रहेगा।
४- कम से कम एक सप्ताह का समय भी मतदान के लिए पर्याप्त नहीं कहा जा सकेगा। एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत मतदान का अभियान चलाया जाये ,जैसे की यू आई डी और जरुरी बातों के लिए होता आया है।और नुय्नतम  एक माह तक लोगों को वोट डालने का अवसर दिया जाए ,आखिर सरकार पांच साल के लिए बन रही है ,और वह भी देश के लिए। यह कहीं से भी गैर जरुरी नहीं है। 
 फिलहाल आम चुनाव के मुहाने पर खड़े देश में चुनाव की घोषणा होने से पहले ही जहां दो साल से सभी दल और उम्मीदवार चुनाव की तयारी में लगें हैं। अमेरिका और जापान के लोग भारत में चुनाव प्रचार के ठेके लिए हुए हैं ,चुनाव का संचालन लगभग कार्पोरेट सिस्टम में चलने लगा है,जहां आदमी को आदमी की शकल तभी दिखाई देगी जब "ऊपर" वाला चाहेगा। अब पार्टियों के लिए काम करने वाले उनके कार्यकर्ता बेमानी होते जा रहे हैं ,सारा का सारा काम वेतनभोगी लोग कर रहे हैं जिन्हें एक पहले से तय व्यवस्था के तहत अपनी जगह बनानी है। यहाँ तक कि  उम्मीदवार का चयन भी अब जन स्वीकारोक्ति पर नहीं खुफिया तौर से निगहबानी करके किया जाने लगा है,तब तो यह और भी जरुरी हो जता है कि हमारी मतदान की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए  जिसमे आखिरी  आदमी की भागीदारी सुनिश्चित  की जा सके और इसके लिए भी आज के दौर में  मुकम्मल इंतज़ाम  करना केवल मौजूदा शासन और केंद्रीय चुनाव आयोग को अपनी इच्छाशक्ति का ही प्रदर्शन करना है। साधन संसाधन की  कमी नहीं है। 
जी हाँ !आने वाल समय वह है जिसमे नौकरियों में  भरती की ही तरह उन लोगों का भी चुनाव होना है जो राजनीति में आने वाले हैं ,हालत के यही संकेत हैं, जिसमे नेतृत्व उभरेगा नहीं, भरती होगा। 
-आशीष अग्रवाल  








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